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झीरम घाटी हमला: 10 दोषियों की फांसी की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट पहुंचा मामला

Fri, 25 Sep 2026 03:24 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Fri, 25 Sep 2026 03:24 PM IST
सार

बहुचर्चित झीरम घाटी नक्सली हमले में जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत द्वारा 10 दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा की पुष्टि के लिए मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय पहुंच गया है।

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Jhiram Ghati attack: Case reaches High Court to confirm death sentence of 10 convicts
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बहुचर्चित झीरम घाटी नक्सली हमले में जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत द्वारा 10 दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा की पुष्टि के लिए मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय पहुंच गया है। लगभग 13 साल पुराने इस भीषण नरसंहार मामले में विशेष अदालत ने मृत्युदंड की पुष्टि प्रक्रिया के तहत उच्च न्यायालय में डेथ रेफरेंस दर्ज कराया है। अब उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच विशेष अदालत के इस फैसले और दोषसिद्धि की विस्तृत न्यायिक समीक्षा करेगी। 25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर नक्सलियों ने घातक हमला किया था। इस हमले में वरिष्ठ नेताओं सहित कुल 29 लोगों की मौत हो गई थी।
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उच्च न्यायालय की मुहर अनिवार्य
कानून के अनुसार ट्रायल कोर्ट से मौत की सजा सुनाए जाने के बाद मामला स्वतः उच्च न्यायालय भेजा जाता है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 366 के तहत सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा तब तक लागू नहीं की जा सकती, जब तक उच्च न्यायालय उस सजा की पुष्टि न कर दे। वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में भी इसी तरह का प्रावधान धारा 407 के अंतर्गत रखा गया है। विशेष एनआईए अदालत के फैसले के बाद अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण कानूनी चरण उच्च न्यायालय में ही संपन्न होगा। उच्च न्यायालय केवल मौत की सजा की औपचारिक पुष्टि नहीं करेगा, बल्कि मामले के पूरे रिकॉर्ड और दोषसिद्धि के आधारों की भी गहराई से न्यायिक समीक्षा करेगा।
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समीक्षा और अधिकारों का दायरा
डेथ रेफरेंस पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय के सामने ट्रायल कोर्ट का पूरा रिकॉर्ड रहेगा। इसमें अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत किए गए साक्ष्य, गवाहों के बयान, दस्तावेजी सबूत और विशेष अदालत द्वारा दोषसिद्धि तथा सजा के लिए दिए गए कारण शामिल हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 368 के अंतर्गत उच्च न्यायालय के पास मौत की सजा की पुष्टि करने के साथ-साथ कानून के अनुसार दूसरी सजा देने, दोषसिद्धि में बदलाव करने या उसे पूरी तरह खत्म करने, नए सिरे से ट्रायल का आदेश देने अथवा आरोपी को बरी करने तक की सभी शक्तियां मौजूद हैं। उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान विशेष अदालत के फैसले की पूरी तरह से कानूनी कसौटी पर जांच होगी।
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13 साल तक चली सुनवाई
बस्तर के झीरम घाटी मामले में विशेष एनआईए अदालत ने लगभग 13 साल तक चली सुनवाई के बाद 5 सितंबर 2026 को 10 आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 16 सितंबर को अदालत ने सुनवाई का सामना कर रहे सभी 10 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई। इस मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ अदालत में ट्रायल शुरू हुआ था, लेकिन एक आरोपी की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई थी। मामले की अदालती सुनवाई के दौरान कुल 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे। एनआईए अदालत ने पहले दोषसिद्धि का निर्णय सुनाया और उसके बाद सजा पर अलग से सुनवाई करके अपना फैसला दिया था।


दो महिला नक्सली भी शामिल
विशेष एनआईए अदालत ने जिन 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है, उनमें दो महिला नक्सली भी शामिल हैं। सजा पाए दोषियों के नाम प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम, सुमित्रा पुनेम मोडियाम, मुक्का मंडावी, कोसा कवासी, आयता मरकाम, मडकामी देवा, जोगा मडकामी, बंजामी सन्ना और महादेव नाग हैं। इस मामले में दोषियों की ओर से उच्च न्यायालय में अपील भी दायर की जा सकती है। कानून में स्पष्ट व्यवस्था है कि फांसी की सजा की पुष्टि तब तक नहीं की जा सकती, जब तक अपील की निर्धारित अवधि समाप्त न हो जाए या दायर अपील का पूरी तरह निपटारा न हो जाए। इसलिए फिलहाल 10 दोषियों की सजा पर अंतिम निर्णय उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही प्रभावी होगा।
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