फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   anthropic jacob coxson resignation ai humanity risk open ai google deepmind

एआई से कितना डरें: खतरे हैं तो कंपनियां रुकती क्यों नहीं? और सरकारें रोकती क्यों नहीं?

Thu, 17 Sep 2026 03:31 PM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Thu, 17 Sep 2026 03:31 PM IST
सार

जैकब कॉक्सन के बयान की गंभीर भी मानें तो सवाल यह उठता है कि क्या यह खतरे पहले से मौजूद नहीं थे? ऐसी क्या वजह रही है कि कॉक्सन के बयान से बवाल ही मच रहा है। दुनियाभर में यह बात सामने है कि बीते एक दशक से भी ज्यादा समय से अमेरिका, चाइना ओर यहां तक कि पूरा यूरोप ही एआई को लेकर बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। यही नहीं ओपनएआई के एआई मॉडल जीपीटी के बाद जारी हुए एक चेतावनी पत्र Pause Giant AI Experiments  ने तो राष्ट्रों को चिंता में डाल दिया था।

विज्ञापन
anthropic jacob coxson resignation ai humanity risk open ai google deepmind
जैकब कॉक्सन के बयान की गंभीर भी मानें तो सवाल यह उठता है कि क्या यह खतरे पहले से मौजूद नहीं थे? - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

एंथ्रोपिक के रिसर्चर जैकब कॉक्सन के इस्तीफे और मानवता पर खतरे के बयान ने सोशल मीडिया पर एक तूफान सा खड़ा कर दिया। हालांकि एआई लैब में हो रहे प्रयोगों को लेकर समय-समय पर खतरे की बातें सामने आती रही हैं. विशेषज्ञ नियंत्रण और सरकारी निगरानी की बात उठाते रहे हैं।

विज्ञापन


महत्वपूर्ण यह है कि बयान ऐसे समय आया है जब कॉक्सन जैसे युवा और तेजतर्रार रिसर्चर ने सीधे ही कंपनी पर इस बात के आरोप लगाए हैं कि कंपनियां होड़ में हैं और एक दूसरे से आगे निकल जाने के चक्कर में ऐसे प्रयोग कर रही हैं जो निकट भविष्य में मनुष्य सभ्यता को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती हैं। बता दें कि कॉक्सन ओपनएआई और एंथ्रोपिक दोनों में काम कर चुके हैं।
विज्ञापन

 

बहरहाल, जैकब कॉक्सन के बयान की गंभीर भी मानें तो सवाल यह उठता है कि क्या यह खतरे पहले से मौजूद नहीं थे? ऐसी क्या वजह रही है कि कॉक्सन के बयान से बवाल ही मच रहा है। दुनियाभर में यह बात सामने है कि बीते एक दशक से भी ज्यादा समय से अमेरिका, चाइना ओर यहां तक कि पूरा यूरोप ही एआई को लेकर बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। यही नहीं ओपनएआई के एआई मॉडल जीपीटी के बाद जारी हुए एक चेतावनी पत्र Pause Giant AI Experiments  ने तो राष्ट्रों को चिंता में डाल दिया था।

विज्ञापन
विज्ञापन

बता दें कि यह एक ऐसा चेतावनी पत्र रहा है जिसमें एआई को लेकर भविष्य की चिंताएं साफ कही गई थी। यही वह पत्र था जिसमें हजारों बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उन एलन मस्क के भी हस्ताक्षर थे जिनका खुदका पैसा ओपनएआई में लगा हुआ था।

पत्र में तो एआई प्रयोगों पर लगाम लगाने की तत्कालीन राष्ट्रपति जो. बाइडन से अपील तक की गई थी लेकिन प्रतिबंध तो दूर की बात हुआ उल्टा और साल 2023 के अंत तक आते-आते बाइडन प्रशासन ने मस्क के ही न्यूरॉलिंक जैसे प्रोजेक्ट को मंंजूरी दे डाली जो अपने आप में सबसे बड़ा रिस्क था। यही वही कदम था जिसे लेकर युआल नोआ जैसे लेखक और इतिहासकार चिंता जताते रहे हैं कि एआई जब मनुष्य की जैविक संरचना में प्रवेश करेगा तो कदम आत्मघाती हो सकते हैं। 

इधर कॉक्सन पर लौटें और उनके इस्तीफे पर ही विचार करें तो फिर जेफ्री हिंटन जैसे दिग्गजों के इस्तीफे को लेकर क्या कहा जाएगा जो कि गॉड फादर ऑफ एआई कहे जाते हैं और जिनके एआई के बारे में न्यूरल नेटवर्क और डीपलर्निंग में किए गए काम को योगदान के बारे में पूछना ही बेईमानी है, जबकि दूसरे छोर पर कॉक्सन के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि वे उस टीम का हिस्सा रहे हैं जहां एआई मॉडल्स को डेटा पर प्रशिक्षित किया जाता है, वे रिसर्चर हो सकते हैं लेकिन वैसे नहीं जैसे हिंटन या रसेल अथवा दूसरे एआई विशेषज्ञ।

दूर क्यों जाया जाए कॉक्सन की तुलना में ही गूगल की एथिक्स टीम में शामिल टिमनिट गेबरु जैसी एआई रिसर्चर और एथिक्स को लेकर काम कर रहीं अध्येता के इस्तीफे और स्टडीज को लेकर क्या कहा जाए जो कि वास्तविक जोखिमों को लेकर काम करती रहीं, जिन्होंने एआई जेंडर, फेस रिकगनिशन और पर्यावरण को लेकर भी गंभीर कार्य किया है। यहीं नहीं स्टुअर्ट रसेल, येशुआ बेंगियो, निक बॉस्ट्रम जैसे दिग्गजों की आशंकाओं को आखिर गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया? 

विरोधाभास तो यह है कि कॉक्सन के बयान से एक ओर एंथ्रोपिक किनारा कर रही है तो वहीं दूसरी ओर कंपनी के मुख्य कर्ता-धर्ता डारियो अमादोई मंद मुस्कान और हौले से यह भी कह रहे हैं कि एआई कंपनियों को इसकी रफ्तार पर ब्रेक लगाने की जरूरत है जबकि कमाल तो यह है कि उनकी हां में हां ओपनएआई यानी की ऑल्टमैन, मस्क और डीप माइंड यानी की डेमिस हसाबिस भी मिला रहे हैं।

हसाबिस के बारे में तो क्या ही कहा जाए वे तो स्वयं ही नैतिक और जिम्मेदार एआई के लिए जाने जाते हैं तो फिर इस बयान पर उनका साथ क्या अलग तरह की पैंतरेबाजी नहीं है? आखिर यह विरोधाभास क्यों है कि एक ओर मानवता के विकास की बात करना है तो दूसरी ओर खतरों का शोर भी मचाया जाए। 

दरअसल, एआई  से मानवता के संकट को लेकर एंथ्रोपिक के बयान की टाइमिंग को अमेरिका में अलग-अलग तरह से देखा गया है। आलोचक मानते हैं कि कंपनी का आईपीओ आ रहा है और यह एक तरह का पब्लिसिटी स्टंट है। दिग्गज विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि जिम्मेदार, सुरक्षित और नैतिक एआई कंपनी के रूप में स्थापित करने के लिए डारियो अमादोई ने अच्छा इवेंट प्लान किया है।

खास बात यह है कि कॉक्सन के बयान के साथ ही सबसे चौंकाने वाला बयान आया था। व्हाइट हाउस के पूर्व एआई सलाहकार डेविड सैक्स ने भी तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि कंपनी एआई विकास  धीमा करने का ड्रामा बंद करे। वे तो चेतावनी के लहजे में यहां तक कह गए कि यदि आपके एआई मॉडल्स से भविष्य में कोई विनाशकारी साइबर हमला होता है, तो फिर जिम्मेदारी कंपनी की ही होगी। बता दें कि एंथ्रोपिक अपना आईपीओ अक्टूबर मध्य तक लाने जा रही है 

बहरहाल, सवाल यह है कि इतना ही डर है और अब विकास को धीमा करने की बात कहकर क्या ओपनएआई, एंथ्रोपिक और डीप माइंड सहित मस्क एआई मॉडल्स की आड़ में क्या निवेश की ही रफ्तार को इसलिए धीमा तो नहीं करना चाह रहे हैं कि लगाए गए पैसे का कुछ तो वसूल हो? देखा जाए एआई लैब में चल रहे उल्टे सीधे प्रयोग से डर आज का नहीं बल्कि बहुत पहले का ही है लेकिन उन पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कंपनियां आगे बढ़ती रहीं और पैसा झोंकती रही और दिग्गज चिल्लाते रहे कि इसे रोको नहीं तो खतरे पैदा होना तय है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका और सिलकॉन वैली में जो हो रहा है उसमें असली खेल चाइना से पिछड़ जाने का भी है। यह वैसा ही ही है जैसे दशकों पहले अंतरिक्ष की होड़ में रूस से पिछड़ जाने का था। हालांकि दो राय नहीं कि अमेरिका आज भी सुपरपावर है लेकिन तकनीक में चाइना जिस तेजी से आगे निकल रहा है वह पहले जो बाइडन भी देख रहे थे और ट्रंप तो ज्यादा करीब से देख रहे हैं, ऐसे में सवाल यह है कि एआई की विकास की रफ्तार को धीमा करने का नहीं है बल्कि ग्लोबल पॉलिटिक्स में डेटा और एआई तकनीक से कब्जा जमाने का है।

जाहिर है कि एआई कंपनियों पर निगरानी के मॉडल पहले से हैं और कंपनियां अंधी नहीं है यदि नहीं होती तो ब्रिटेन का एआई इंस्टीट्यूट अगस्त में ही ओपनएआई और एंथ्रोपिक को लताड़ चुका था और बवाल उस पर होना था लेकिन सवाल अब उठाए जा रहे हैं. 


फिलहाल ना दुनिया अभी खत्म हो रही है और आगे खत्म होगी। बहुत पैसा लगा है गणित उसी का दिखाई देता है। 
_______________________________________
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed