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CJP Protest: युवाओं के हाथ लगा सरकारों को झुकाने का मंतर!

Sat, 22 Aug 2026 02:21 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Sat, 22 Aug 2026 02:21 PM IST
सार

जंतर मंतर पर जेन जी आंदोलन के दौरान खतरनाक पैलेट गन के कथित इस्तेमाल की इजाजत तथा उससे घायल युवक का मामला भी कुछ ऐसा ही है। सरकार और पुलिस शुरू से कहती आ रही है कि आंदोलन के दौरान पैलेट गन चली ही नहीं।

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CJP Protest: The youth have found the mantra to make the government bow
जंतर-मंतर पर अभिजीत दीपके और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक - फोटो : एएनआई

विस्तार

दिल्ली के जंतर मंतर आंदोलन के पीछे कौन था, कॉकरोच जनता पार्टी किसके इशारे पर काम कर रही है, उसका राजनीतिक लक्ष्य क्या है या फिर झारखंड का ‘जवाबी’ छात्र आंदोलन  अपने मकसद में कितना कामयाब रहा, इन सवालों से इतर अहम बात यह है कि युवाओं ने जंतर मंतर से उपजे इस मंतर को गहराई से आत्मसात कर लिया है कि अब सरकारों को झुकाने का एक ही तरीका है, सड़कों पर उतरो और वो भी बिना किसी भय अथवा सौदेबाजी की नीयत के।

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ऐसे में खुद को ‘सख्त’ जताने वाली सरकारें भी भीतर से हिली हुई हैं तथा जेन ज़ी और जेन अल्फा के इस तेवर के आगे बेबस दिख रही हैं। युवाओं के लिहाज से यह फार्मूला कारगर होता भी दिख रहा है, भले ही इसे  ‘अराजकता’, गुंडागर्दी अथवा ‘प्रायोजित’ कहा जाए।
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इसके जवाब में खड़े किए जा रहे आंदोलनों की कोशिशों में वो दम दिखाई नहीं पड़ रहा है, जो इसका जवाबी नरेटिव तैयार कर सके। युवा अपने इन स्वत:स्फूर्त आंदोलनो से राजनीतिक दलों एवं उनसे जुड़े संगठनों को दूर रख रहे हैं। अलबत्ता कुछ मामलों में विपक्षी पार्टियां खुलकर युवाओं के पक्ष में आ गई हैं।
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मसलन दिल्ली में पैलेट गन मामले में पुलिस थाने में  एफआईआर दर्ज करने को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पांच घंटे चले धरने के बाद पुलिस द्वारा अज्ञात के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग मान लिया जाना भी नीट पेपर लीक के खिलाफ चले उस  सीजेपी आंदोलन की सफलता की अगली कड़ी मानी जानी चाहिए, जिसमें अंतत: केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था। 

जंतर मंतर पर जेन जी आंदोलन के दौरान खतरनाक पैलेट गन के कथित इस्तेमाल की इजाजत तथा उससे घायल युवक का मामला भी कुछ ऐसा ही है। सरकार और पुलिस शुरू से कहती आ रही है कि आंदोलन के दौरान पैलेट गन चली ही नहीं। दिल्ली पुलिस ने साफ कहा कि हमने तो नहीं चलाई। लेकिन राहुल गांधी ने उस युवक को पेश कर दिया, जिसे पैलेट गन के कई छर्रे लगे हैं।

दिल्ली एम्स की रिपोर्ट में भी यह बात साबित हुई है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर किसी ने पैलेट गन नहीं चलाई तो युवक को उसके छर्रे लगे कैसे? उधर जंतर मंतर आंदोलन के दौरान कार्रवाई को लेकर पुलिस के हलफनामे से असंतुष्ट सुप्रीम कोर्ट ने अलग से जांच कमेटी बनाने की बात कही है। शुरू में पुलिस इसी आधार पर एफआईआर दर्ज करने से बचती रही।

भाजपा ने भी राहुल पर यह कहकर हमला किया कि वो वंदे मातरम् से ध्यान हटाने के लिए यह सब कर रहे हैं। लेकिन जब राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे तो शाम को कथित ‘ऊपर के आदेश’ के बाद अज्ञात के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। लेकिन यह काम तो पुलिस 14 अगस्त को भी कर सकती थी, जब पैलेट गन पीडि़त युवक साहिल  थाने में रिपोर्ट कराने गया था।

अज्ञात का अर्थ यही है कि इसमे साफ तौर पर कोई भी आरोपी नहीं होता। जांच के बाद आरोपी तय होता है। अगर उसी वक्त  एफआईआर हो जाती तो यह मामला संसद में हंगामे का कारण भी नहीं बनता। सरकार कह सकती थी कि चूंकि जांच जारी है कि पैलेट गन किसने चलाई, कैसे चलाई आदि।

उसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है। तो फिर राहुल गांधी को भी 21 अगस्त को मीडिया पर इतनी देर तक कवरेज नहीं मिलता, जैसा कि मिला। हालांकि शुक्रवार की घटना से यही संदेश गया कि अगर लोग सड़क पर उतरें तो सरकार के पास उनकी मांग मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। 

मध्यप्रदेश की ही बात करें तो जंतर मंतर आंदोलन का साफ असर जेन ज़ी- जेन अल्फा की सोच और तेवर पर दिखाई दे रहा है। प्रदेश में बीते 10 दिनों में राज्य में ऐसे 6 बड़े प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें बच्चे बेखौफ सड़कों पर उतरे  और अपनी मांगें मनवा कर माने। प्रशासन को झुकने पर विवश किया।  जेन जी़-जेन अल्फा के इस निर्भीक व्यवहार से प्रशासन भी हक्का बक्का है। क्योंकि ये बच्चे अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे हैं और सरकार उनके आगे नतमस्तक होती दिख रही है।

उदाहरण के लिए इंदौर में शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में एक दिव्यांग छात्रा से मेस फीस की जबरन ज्यादा वसूली, छिंदवाड़ा के दूरस्थ गांव बीच बहरी में शिक्षकों द्वारा नियत समय तक अध्यापन न करने, विदिशा जिले के सिरोंज में बस का किराया घटाने, भोपाल के डीएमएस स्कूल के केन्द्रीय विद्यालय में मर्जर पर रोक लगाने, धार जिले के निसरपुर में माता शबरी बोर्डिंग स्कूल की लड़कियां खराब खाने को लेकर आधी रात थाना घेरने जा पहुंचना शामिल है।

इससे प्रशासन में हड़कंप मच गया और तुरंत होस्टल अधीक्षिका को निलंबित करना पड़ा। उधर उज्जैन में लड़कियों के स्कूल को सांदीपनि स्कूल के नाम पर 12 किमी दूर ले जाने का निर्णय पलटना जैसे मामले शामिल हैं। यही स्थिति हमे उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में भी दिखाई दे रही है और यह ट्रेंड तेज होता दीख रहा है।   

झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं में भारी भ्रष्टाचार  के खिलाफ छात्रों और अभ्यर्थियों का 25 दिनों तक चला आंदोलन आंशिक रूप से सफल रहा, क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ज्यादा चतुर सुजान निकले। उन्होंने शुरू से ‘संवेदनशीलता’ दिखाते हुए पहले आंदोलनकारियों को कई गुटों में बांटा। एक बार लाठियां भी चलवाईं। अंत में राज्य में 2014 से 2025 के बीच हुई सरकारी भर्ती परीक्षाअो को रदद् करने की मांग स्वीकार कर ली, क्योंकि उन्हें पता था कि मामला यह कोर्ट में नहीं टिकेगा। हुआ भी वही।

जब पूर्व परीक्षाओं में चयनित और नियुक्तियां पा चुके दो हजार से अधिक कर्मचारी इसके खिलाफ अदालत पहुंचे तो हाई कोर्ट ने इस पर अंतरिम रोक यह कहकर लगा दी कि परीक्षाओं को बैक डेट से रद्द कैसे किया जा सकता है। यह मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है। इस बीच  आंदोलनकारियों ने अपना आंदोलन समाप्त करते हुए कहा कि इसे फिलहाल ‘स्थगित’ किया जा रहा है।

अगर सोरेन सरकार ने दो माह में पूर्व की सभी भर्ती परीक्षाओं को रद्द नहीं किया तो आंदोलन फिर से शुरू किया जाएगा। खास बात यह है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पूर्व की 22 परीक्षाओं को रद्द करने तथा 6 नई परीक्षाओं को स्थगित करने की मांग स्वीकार भले ही कर ली हो, लेकिन आंदोलनकारियों की मुख्य मांग कि सारी जांच सीबीआई द्वारा कराई जाए को ठुकरा दिया। यानी सारी जांचें सीआईडी ही करेगी। जिस पर परोक्ष रूप से नियंत्रण राज्य सरकार का ही रहेगा। 

झारखंड में इस आंदोलन को भाजपा खुलकर समर्थन दे रही है। लेकिन जिन परीक्षाओं को रद्द करने की मांग छात्र कर रहे हैं, उनमें  2014 से 2019 के बीच हुई भर्ती परीक्षाएं तो राज्य में भाजपा शासन काल की हैं, तब पार्टी ने एक गैर आदिवासी रघुबर दास को मुख्यमंत्री बनाकर एक आत्मघाती राजनीतिक प्रयोग किया था।

उनके कार्यकाल में पांच साल में जेपीएससी, जेएसएससी और कर्मचारी चयन आयोग ने कुल 33 हजार 184 सरकारी पदों पर भर्तियां की गईं थीं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या भाजपा समर्थित आंदोलनकारियों को भाजपा शासनकाल में हुई नियुक्तियों की निष्पक्षता पर भी भरोसा नहीं था?

दूसरे, पुरानी सभी परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय दूरगामी होता। क्योंकि ऐसी मांग मानने  के लिए दूसरे राज्यों और यहां तक कि केन्द्र सरकार पर भी दबाव बनाया जा सकता है। ऐसे में देश में नई अराजकता की स्थिति बन सकती है। क्योंकि सारी नियुक्तियां भ्रष्टाचार से ही हुई हैं, यह तो कोई भी नहीं कह सकता।

इस स्थिति में मरण उन लोगों का है, जो मेहनत से परीक्षाएं पास करके नौकरी पाएं हैं। अब कल को कोई सभी पुरानी यूपीएसी परीक्षा रद्द करने की मांग करने को लेकर सड़कों पर उतरे तो क्या सरकार उसे मानेगी अथवा मानना चाहिए? क्या बगैर किसी गहन जांच के ऐसी मांग मानना उचित है? 

दूसरे, सरकारों के लिए चिंता का विषय यह है कि ऐसे आंदोलन फिलहाल भले ही व्यवस्था के विरोध में दिखाई दे रहे हों, लेकिन व्यवस्था के प्रति यही आक्रोश भविष्य में राजनीतिक विरोध में तब्दील हो गया तो कई सरकारों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। क्योंकि आगामी चुनावों में करीब 30 फीसदी वोटर इसी जेन ज़ी और जेन अल्फा के होंगे।

उन्हें केवल कॉस्मेटिक तरीकों से बहला कर अपने पाले में नहीं लाया जा सकता। इसके लिए इस युवा पीढ़ी के  मनोविज्ञान, सोच और समस्याओं को पूरी संवेदनशीलता और गहराई  समझना होगा। उनसे उस शैली और भाषा में संवाद करना होगा, जिसे वो समझते और जिस पर भरोसा करते हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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