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नेपाल आपदा: हिमालय के संकटों के साझा संकेत है भोटेकोशी नेपाल की जलप्रलय
सार
हिमालय में पैदा होने वाला यह जल-संकट किसी एक देश की प्रशासनिक या राजनीतिक सीमाओं को नहीं स्वीकारता। तिब्बत (चीन) के पठार से निकलने वाली नदियां नेपाल, भारत, भूटान, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक के विशाल जनमानस को प्रभावित करती हैं।
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नेपाल में आपदा।
- फोटो : Amar ujala
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विस्तार
विश्व का 'तीसरा ध्रुव' कहा जाने वाला हिमालयी क्षेत्र आज अपनी प्राकृतिक भव्यता के साथ-साथ एक गंभीर और तेजी से बढ़ते जल-वैज्ञानिक संकट का सामना कर रहा है। हिमालय के ग्लेशियरों की तेजी से पिघलती बर्फ, ग्लोबल वार्मिंग से बदलता मानसूनी चक्र और संकीर्ण घाटियों में होता अविवेकपूर्ण निर्माण- इन सबने मिलकर पूरे हिमालयी क्षेत्र को आपदाओं के एक नए चक्रव्यूह में धकेल दिया है।
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उत्तराखंड की केदारनाथ त्रासदी (2013), उत्तरी सिक्किम में ल्होनक झील फटने से तीस्ता नदी में आई तबाही (2023), और नेपाल में भोटेकोशी व सुनकोशी नदियों का बार-बार होने वाला भीषण तांडव इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि हिमालयी नदियां अब केवल मौसमी जलधाराएं नहीं रहीं, बल्कि वे उच्च-पर्वतीय जलप्रलय का माध्यम बन चुकी हैं।
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हिमालय में पैदा होने वाला यह जल-संकट किसी एक देश की प्रशासनिक या राजनीतिक सीमाओं को नहीं स्वीकारता। तिब्बत (चीन) के पठार से निकलने वाली नदियां नेपाल, भारत, भूटान, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक के विशाल जनमानस को प्रभावित करती हैं।
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जब उच्च हिमालय में किसी ग्लेशियर झील का तटबंध टूटता है या भीषण भूस्खलन या हिमस्खलन से किसी नदी का मार्ग अवरुद्ध होता है, तो उसका असर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार सैकड़ों किलोमीटर दूर तक महसूस किया जाता है।
इसलिए, हिमालय को केवल एक राष्ट्रीय संपत्ति मानने के बजाय एक 'साझा अंतरराष्ट्रीय पर्वत श्रृंखला' के रूप में देखना और इसकी आपदाओं से निपटने के लिए बहुराष्ट्रीय कूटनीति तथा संयुक्त वैज्ञानिक रणनीति तैयार करना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।
हिमालयी बाढ़ों का मूल उद्गम: प्रमुख जल-वैज्ञानिक कारक
हिमालयी नदियों में आने वाली विनाशकारी बाढ़ें केवल अत्यधिक बारिश का परिणाम नहीं होतीं। उच्च-पर्वतीय भूगोल और जलवायु परिवर्तन के बीच होने वाली जटिल अंतःक्रिया से मुख्य रूप से तीन प्रमुख कारक उत्पन्न होते हैं।
पहला कारक 'ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड' है; वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालय के विशाल ग्लेशियर असामान्य गति से पिघल रहे हैं और उनके पीछे हटने से ढीली मिट्टी व पत्थरों के मलबे के पीछे प्राकृतिक झीलों का निर्माण हो रहा है। जब इन झीलों में हिमस्खलन, भारी बारिश या चट्टानें गिरती हैं, तो इनकी नाजुक दीवारें अचानक टूट जाती हैं और लाखों घनमीटर पानी अत्यधिक वेग के साथ नीचे की घाटियों को तबाहा कर देता है।
दूसरा कारक अत्यधिक स्थानीय बारिश और औरोग्राफिक क्लाउंडबर्स्ट है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब मानसूनी हवाएं उच्च हिमालयी अल्पाइन क्षेत्रों तक गहराई से प्रवेश कर रही हैं, जहां सीधी खड़ी पहाड़ी ढलानों से टकराकर ये संकीर्ण क्षेत्रों में अचानक मूसलाधार बारिश करती हैं, जिससे छोटी नदियां उफान पर आ जाती हैं। तीसरा कारक भूस्खलन से बनी अस्थायी झीलों का टूटना है।
भूकंपीय गतिविधियों और वर्षा से पहाड़ियों के बड़े हिस्से ढहकर नदियों का मार्ग रोक देते हैं, जिससे बनी अस्थायी झीलें जब दबाव के कारण अचानक धमाके के साथ टूटती हैं, तो निचले इलाकों में संभलने का मौका तक नहीं मिलता।
नेपाल-ऋषिगंगा का घटनाक्रम
हिमालयी क्षेत्र में पूर्व में आई आपदाओं का कालखंड यह स्पष्ट करता है कि अंतरराष्ट्रीय नदियाँ किस प्रकार सीमाओं के पार तबाही लाती रही हैं। तिब्बती पठार और ऊंचे हिमालय से निकलने वाली भोटेकोशी, सतलुज और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में हिमनद झील फटने अथवा भूस्खलन से बनी झीलों के टूटने की घटनाएं पहले भी सीमाओं के पार विनाश ला चुकी हैं।
तिब्बत में ‘पोइंकू चू’ नाम से उद्गम लेने वाली भोटेकोशी अत्यंत तीव्र ढाल वाली नदी है और उसका ऊपरी जलागम हिमनदीय खतरों के प्रति संवेदनशील है। जुलाई 2016 की बाढ़ ने नेपाल के तातोपानी क्षेत्र और अरनिको राजमार्ग को भारी क्षति पहुंचाई थी।
वर्ष 2000 में तिब्बत में यिगोंग भूस्खलन-झील टूटने से अरुणाचल की सियांग घाटी में विनाशकारी बाढ़ आई, जबकि 2005 में तिब्बत में बनी पारेचू झील के टूटने से हिमाचल प्रदेश की सतलुज घाटी प्रभावित हुई।
दूसरी ओर अत्यधिक गाद और नदी का मार्ग बदलना भी हिमालयी नदियों के खतरे को कई गुना बढ़ाता है; 2008 की कुसहा त्रासदी में कोशी ने तटबंध तोड़कर पुराना मार्ग पकड़ लिया और बिहार में व्यापक तबाही मचाई। ये घटनाएं बताती हैं कि हिमालय में पैदा हुआ जल-संकट राष्ट्रीय सीमाएं नहीं पहचानता।
नेपाल का ताजा घटनाक्रम उत्तराखंड की ऋषिगंगा त्रासदी से महत्वपूर्ण समानता रखता है। 7 फरवरी 2021 को चमोली जिले की जलप्रलय को प्रारंभ में हिमनद झील फटने का परिणाम माना गया था। बाद में वैज्ञानिक अध्ययनों ने अलग कहानी सामने रखी। रोंटी पर्वत की अत्यंत खड़ी ढाल से लगभग 2.7 करोड़ घनमीटर चट्टान और हिम का विशाल द्रव्यमान टूटकर नीचे गिरा था।
प्रचंड ऊर्जा ने उसे तेजी से बहते मलबे में बदल दिया, जो विशाल बोल्डर, मिट्टी और तलछट समेटता हुआ ऋषिगंगा से धौलीगंगा तक पहुंचा। इस आपदा में 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हुए। 13.2 मेगावाट की ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना लगभग समाप्त हो गई और 520 मेगावाट की निर्माणाधीन तपोवन-विष्णुगाड परियोजना को भारी क्षति पहुंची।
इसी तरह अक्टूबर 2023 में सिक्किम की ल्होनक झील फटने से तीस्ता-III बाँध ध्वस्त हो गया था। ये सभी ऐतिहासिक घटनाएँ प्रमाणित करती हैं कि पूरे हिमालयी बेल्ट में आपदाओं का पैटर्न एक समान और परस्पर जुड़ा हुआ है।
नेपाल और तराई क्षेत्रों पर बढ़ता खतरा
नेपाल भौगोलिक दृष्टि से हिमालयी आपदाओं के मुहाने पर बसा हुआ है। तिब्बत के ऊँचे पठारों से निकलने वाली भोटेकोशी, कर्णाली, गण्डकी और कोशी जैसी नदियाँ नेपाल के संकीर्ण पहाड़ी तंत्र से होकर गुजरती हैं, जिससे नेपाल ट्रांस-बाउंड्री GLOF का सबसे पहला शिकार बनता है।
नेपाल की सीमा के भीतर 2,000 से अधिक ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, जिनमें से दर्जनों झीलें अत्यधिक संवेदनशील हैं। इसके साथ ही, नेपाल के पहाड़ी इलाकों में अनियोजित सड़कों का निर्माण, नदियों के किनारों पर जलविद्युत परियोजनाओं की भरमार और पर्यावरण मानकों की अनदेखी ने पहाड़ों की प्राकृतिक स्थिरता को और कमजोर कर दिया है।
एक ऊपरी GLOF या भूस्खलन घटना पूरी नदी घाटी में स्थापित जलविद्युत ढांचे को ताश के पत्तों की तरह ध्वस्त कर देती है। सबसे गंभीर बात यह है कि नेपाल की संकरी घाटियों से बहकर आने वाला यह जलप्रलय और भारी मलबा सीधा भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाकों में प्रवेश करता है।
गाद का अत्यधिक जमाव नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को अवरुद्ध कर देता है, जिससे पूरे मैदानी भूभाग में स्थायी और व्यापक विनाशकारी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय साझी जिम्मेदारी: 'तीसरे ध्रुव' के लिए वैश्विक दृष्टिकोण
हिमालय केवल किसी एक देश का पर्वत नहीं है, बल्कि यह चीन, भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और म्यांमार—इन आठ देशों में फैली एक साझा जीवन-रेखा है। इस अंतरराष्ट्रीय पर्वत शृंखला के ग्लेशियरों और नदियों पर एशिया की लगभग 2 अरब आबादी अपने पेयजल, कृषि और ऊर्जा के लिए निर्भर है।
इसके बावजूद, इस क्षेत्र में आपदा प्रबंधन आज भी कूटनीतिक सीमाओं, द्विपक्षीय तनावों और डेटा की गोपनीयता के कारण बिखरा हुआ है। इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए तिब्बत, नेपाल, भारत और भूटान के बीच एक एकीकृत 'ट्रांस-बाउंड्री अर्ली वार्निंग सिस्टम' (TEWS) स्थापित करना अनिवार्य है, ताकि किसी भी झील के टूटने पर वास्तविक समय (Real-Time) में सैटेलाइट और सेंसर अलर्ट सीमाओं के पार तुरंत साझा किए जा सकें।
इसके अलावा, हाइड्रोलॉजिकल आँकड़ों को सैन्य या राजनीतिक गोपनीयता से मुक्त रखकर खुला वैज्ञानिक आदान-प्रदान होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय नदियों के बेसिन में बनने वाले बाँधों और राजमार्गों के लिए एक साझा पर्वतीय इंजीनियरिंग कोड लागू किया जाना चाहिए।
अंततः, वैश्विक मंचों के माध्यम से एक विशेष 'माउंटेन क्लाइमेट फंड' का गठन किया जाना अनिवार्य है, ताकि जलवायु परिवर्तन का दंश झेल रहे हिमालयी समुदायों के लिए आपदा-रोधी बुनियादी ढांचा तैयार किया जा सके।
हिमालय में प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनियाँ अब केवल कागजी चेतावनियाँ नहीं हैं; वे सतलुज, ब्रह्मपुत्र, भोटेकोशी, कोशी, तीस्ता और ऋषिगंगा के बहते मलबे के रूप में हमारे सामने हैं। भौतिक भूगोल कभी भी राजनीतिक सीमाओं का मोहताज नहीं होता।
यदि दुनिया के राष्ट्र हिमालय को केवल अपने-अपने राजनीतिक हितों के चश्मे से देखना बंद नहीं करते, तो 'तीसरे ध्रुव' का यह पिघलता और उफनता रूप पूरे दक्षिण एशिया के सामाजिक और आर्थिक ढाँचे को छिन्न-भिन्न कर देगा। समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय हिमालय को एक 'साझा वैश्विक धरोहर' स्वीकार करे और इसके संरक्षण व आपदा प्रबंधन के लिए सीमा पार सहकारिता की एक नई युग-गाथा लिखे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।