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अरावली से एवरेस्ट तक : मनस्वी की कहानी, जो बेटियों को अपने सपने जीना सिखाती है

Mon, 19 Oct 2026 12:03 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 19 Oct 2026 12:03 PM IST
सार

मनस्वी की कहानी परिवारों को भी अपने नजरिए पर विचार करने का अवसर देती है। माता-पिता बच्चों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। बेटियों के मामले में यह चिंता कई बार उनकी पसंद और स्वतंत्रता पर अतिरिक्त सीमाएं लगा देती है। 

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Dr. Manasvi Agarwal first civilian woman from rajasthan to successfully summit Mount Everest in May 2026
डॉ. मनस्वी अग्रवाल - फोटो : विनोद पाठक

विस्तार

मनस्वी का अर्थ है दृढ़निश्चयी। उदयपुर की डॉ. मनस्वी अग्रवाल ने अपने नाम को जिस तरह सार्थक किया, वह केवल पर्वतारोहण की उपलब्धि नहीं, अपितु उन लड़कियों के लिए प्रेरणा है, जो अपने भीतर किसी बड़े सपने को संजोए हुए हैं, लेकिन उसे पूरा करने की राह को लेकर आशंकित रहती हैं। बचपन में अरावली की पहाड़ियों को देखकर माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने का सपना संजोने वाली मनस्वी ने अगस्त 2025 से मई 2026 के बीच महज नौ महीनों में पांच महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियों पर तिरंगा फहराया।

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एवरेस्ट के साथ यूरोप की माउंट एल्ब्रुस, अफ्रीका की किलिमंजारो, दक्षिण अमेरिका की अकोंकागुआ और अंटार्कटिका की विन्सन मैसिफ तक पहुंचने का उनका सफर असाधारण है, लेकिन उनकी कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष चोटियों की संख्या नहीं, बल्कि उस संकल्प की ताकत है, जिसने उन्हें एक बड़े लक्ष्य की ओर लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
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इस कहानी में उपलब्धि का उत्साह है, लेकिन उसके साथ ऐसी पीड़ा भी जुड़ी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एवरेस्ट अभियान में मनस्वी ने अपने दो साथियों को खोया और फ्रॉस्टबाइट के कारण पैरों की छह उंगलियां गंवा दीं। जिस शिखर तक पहुंचने के लिए उन्होंने लंबी तैयारी की थी, वहां पहुंचने की कीमत उन्हें अपने शरीर को गंभीर क्षति के रूप में चुकानी पड़ी। इसके बावजूद उनका हौसला बरकरार है और अब उनकी नजर उत्तरी अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया की सर्वोच्च चोटियों पर है।
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मनस्वी की कहानी को केवल साहस की मिसाल मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। इससे यह समझने की जरूरत है कि किसी लड़की के सपनों को आकार देने में उसकी इच्छाशक्ति के साथ परिवार, शिक्षा, प्रशिक्षण और आर्थिक संसाधनों की भी भूमिका होती है। मनस्वी ने अपने हिस्से की मेहनत की, कठिन प्रशिक्षण लिया और जोखिमों से भरे रास्ते पर कदम बढ़ाए। उनकी यात्रा दूसरी लड़कियों के सामने एक सवाल भी रखती है, क्या वे अपनी आकांक्षाओं को केवल इसलिए छोड़ दें कि उनकी राह आसान नहीं है?

मनस्वी का परिवार मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आता है। उनके पिता सरकारी सेवा में थे। परिवार में पर्वतारोहण की कोई परंपरा नहीं थी। न ही उनके सामने इस क्षेत्र में आगे बढ़ने का कोई तैयार रास्ता था। उनके माता-पिता शिक्षा को प्राथमिकता देते थे। मनस्वी ने भी इसे अपनी जिम्मेदारी के रूप में लिया।
 

  • गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से विधि की पढ़ाई की, पर्यावरणीय कानून के क्षेत्र में शोध किया और यूजीसी-नेट परीक्षा में 99.2 पर्सेंटाइल हासिल किए।
  • आज वह सहायक प्रोफेसर के रूप में भी कार्यरत हैं।
  • परिवार ने उनके शैक्षणिक लक्ष्य पूरे होने तक पर्वतारोहण के सपने को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी।
  • हालांकि, बचपन में उन्हें खेलों में भाग लेने से नहीं रोका गया और भाइयों के बराबर अवसर मिले। इस अनुभव से एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है।


जीवन में अपनी पसंद के क्षेत्र को चुनने का अर्थ जरूरी नहीं कि दूसरी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया जाए। मनस्वी ने पढ़ाई और पर्वतारोहण को एक-दूसरे का विकल्प बनाने के बजाय दोनों के लिए जगह बनाई।

आज अनेक लड़कियां इसी सवाल से जूझती हैं। परिवार चाहता है कि वे पढ़ाई पूरी करें, अच्छा करियर बनाएं और भविष्य सुरक्षित रखें। वहीं, उनके अपने सपने होते हैं, जो कभी खेल, कभी कला, कभी शोध और कभी किसी नए पेशे से जुड़े होते हैं। कई बार उन्हें लगता है कि एक रास्ता चुनने का अर्थ दूसरे को छोड़ देना है।

मनस्वी का उदाहरण बताता है कि हर परिस्थिति में ऐसा होना जरूरी नहीं। स्पष्ट प्राथमिकताओं, समय के बेहतर प्रबंधन और लगातार मेहनत से अलग-अलग लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। हां, इसके लिए योजना और धैर्य की जरूरत होती है।

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डॉ. मनस्वी अग्रवाल - फोटो : विनोद पाठक

मनस्वी की उपलब्धि को केवल इच्छाशक्ति का परिणाम मानना उनकी मेहनत को कम करके आंकना होगा। वह शूटिंग और घुड़सवारी जैसे खेलों से जुड़ी रहीं। बाद में उन्होंने पर्वतारोहण का औपचारिक प्रशिक्षण लिया। दार्जिलिंग के हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट और अरुणाचल प्रदेश के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड एडवेंचर स्पोर्ट्स सहित विभिन्न संस्थानों में प्रशिक्षण प्राप्त किया। रॉक क्लाइंबिंग, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अभ्यास और हिमालय में विशेष प्रशिक्षण ने उन्हें एवरेस्ट अभियान के लिए तैयार किया।

एवरेस्ट तक पहुंचने के पीछे का संघर्ष

एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने की तस्वीर में उपलब्धि का एक क्षण दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे की तैयारी नजर नहीं आती। वहां तक पहुंचने के लिए शारीरिक क्षमता, तकनीकी ज्ञान, मानसिक स्थिरता और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता जरूरी होती है। यही बात जीवन के दूसरे क्षेत्रों पर भी लागू होती है। प्रतियोगी परीक्षा में सफलता चाहिए तो नियमित अध्ययन करना होगा। खेल में आगे बढ़ना है तो अभ्यास और प्रशिक्षण से गुजरना होगा।

अपना कारोबार शुरू करना है तो उसके कामकाज, पूंजी और जोखिमों को समझना होगा। सपना दिशा देता है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। केवल यह सोच लेना कि एक दिन कुछ बड़ा करना है, पर्याप्त नहीं। उस दिन के लिए आज क्या किया जा रहा है, असल फर्क इससे पड़ता है। मनस्वी की यात्रा का यह पक्ष खास तौर पर उन लड़कियों के लिए महत्त्वपूर्ण है, जो अपने लक्ष्य को लेकर गंभीर हैं, लेकिन शुरुआत कहां से करें, यह तय नहीं कर पा रही हैं।

मनस्वी की कहानी परिवारों को भी अपने नजरिए पर विचार करने का अवसर देती है। माता-पिता बच्चों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। बेटियों के मामले में यह चिंता कई बार उनकी पसंद और स्वतंत्रता पर अतिरिक्त सीमाएं लगा देती है। परिवार की चिंता को पूरी तरह अनुचित नहीं कहा जा सकता, लेकिन सुरक्षा के नाम पर हर नए रास्ते को बंद कर देना भी समाधान नहीं है। बेटियों को अवसर देने का अर्थ उन्हें बिना तैयारी किसी जोखिम में धकेलना नहीं है।

इसका अर्थ है उनकी रुचियों को गंभीरता से सुनना, उनकी क्षमता को समझना और उन्हें अपने लक्ष्य के लिए जरूरी प्रशिक्षण तथा मार्गदर्शन हासिल करने में सहयोग देना। यदि कोई लड़की पर्वतारोहण करना चाहती है तो उसे इस क्षेत्र की कठिनाइयों और सुरक्षा संबंधी जरूरतों से परिचित कराया जाना चाहिए। यदि वह किसी दूसरे क्षेत्र में जाना चाहती है तो उसकी राह की जरूरतें अलग होंगी। हर सपने के लिए रास्ता एक जैसा नहीं होता, लेकिन अपने भविष्य के बारे में सोचने और उसे आकार देने का अवसर हर लड़की को मिलना चाहिए।

राजस्थान जैसे राज्य में, जहां पारिवारिक परंपराओं का सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है, बेटियों की बदलती आकांक्षाओं को समझना विशेष रूप से जरूरी है। लड़कियां शिक्षा और पेशेवर जीवन में आगे बढ़ रही हैं। अब उनके सामने अपनी रुचियों और क्षमताओं को विकसित करने की चुनौती भी है। मनस्वी जैसी उपलब्धियां यह दिखाती हैं कि लड़कियों की महत्वाकांक्षाओं को केवल प्रचलित धारणाओं के आधार पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

पर्वतारोहण जैसे अभियानों में आर्थिक संसाधनों की भूमिका भी बड़ी है। एवरेस्ट अभियान का शुरुआती खर्च 35 लाख रुपए तक हो सकता है। उपकरणों, परमिट, ऑक्सीजन, शेरपा सहायता और अन्य व्यवस्थाओं के अनुसार वास्तविक लागत बदलती है। इतनी बड़ी राशि जुटाना अनेक प्रतिभाशाली युवाओं के लिए मुश्किल है।

किसी लड़की में क्षमता हो, वह प्रशिक्षण हासिल कर ले और अभियान के लिए तैयार भी हो, लेकिन पर्याप्त धन न होने के कारण आगे न बढ़ सके, तो उसकी प्रतिभा को अवसर नहीं मिल पाता। यह चुनौती दूसरे खेलों और पेशों में भी दिखाई देती है। प्रशिक्षण, उपकरण, प्रतियोगिताओं में भागीदारी और आगे की पढ़ाई के लिए संसाधनों की जरूरत होती है।

हर परिवार इन्हें जुटाने में सक्षम नहीं होता। इसलिए बेटियों को प्रेरित करने के साथ ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करना भी जरूरी है, जिनसे प्रतिभाशाली युवाओं को आर्थिक सहायता और आगे बढ़ने के अवसर मिल सकें। केवल यह कहना कि मेहनत करो और सफलता हासिल करो, पर्याप्त नहीं है। मेहनत करने वालों के लिए अवसर उपलब्ध होना भी जरूरी है।

हालांकि, हर लड़की को एवरेस्ट तक पहुंचने की जरूरत नहीं। किसी के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना, किसी के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना और किसी के लिए अपने पसंदीदा क्षेत्र में पहचान बनाना सबसे बड़ा सपना हो सकता है। सपनों की ऊंचाई को दूसरों की उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। जरूरी यह है कि लड़की अपने लक्ष्य को पहचाने, उसकी दिशा में तैयारी करे और कठिनाइयों के कारण खुद को पहले ही अयोग्य न मान ले।

फ्रॉस्टबाइट के कारण पैरों की छह उंगलियां गंवाने के बावजूद मनस्वी आगे की चोटियों की ओर देख रही हैं। उनकी कहानी देश की बेटियों को यह भरोसा दे सकती है कि शुरुआत चाहे छोटी हो, सपने को गंभीरता से लेने और उसके लिए लगातार काम करने का अधिकार हर लड़की को है। मनस्वी से हौसला लेने का सबसे अच्छा तरीका उनकी उपलब्धियों की नकल करना नहीं, बल्कि अपने जीवन में उस दृढ़ता को उतारना है, जिसने उन्हें आगे बढ़ाया।

अपने सपने को पहचानना, उसके लिए जरूरी योग्यता हासिल करना, परिवार से संवाद करना, अवसर तलाशना और बाधाओं के सामने रास्ते खोजते रहना, यही वह सीख है, जो उनकी कहानी को प्रेरक बनाती है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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