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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Narendra Modi 25-Year Political Journey: From Gujarat CM to India’s Most Powerful Leader

मोदी के 25 साल: 25 साल से सत्ता के केंद्र में नरेंद्र मोदी और हताश विपक्ष के सवाल

Wed, 07 Oct 2026 12:54 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Wed, 07 Oct 2026 12:54 PM IST
सार

Narendra Modi 25-Year Journey: पिछले 12 वर्षों में सत्ता का बहुत ज्यादा केंद्रीकरण हुआ है। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार और पार्टी के फैसलों में प्रधानमंत्री कार्यालय और खुद नरेंद्र मोदी की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है। विपक्ष इसे स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय मानता है।

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Narendra Modi 25-Year Political Journey: From Gujarat CM to India’s Most Powerful Leader
पीएम नरेंद्र मोदी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

25 Years of Narendra Modi in Politics: 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। आज 25 साल बाद पीछे मुड़कर देखें तो यह सफर भारतीय राजनीति की सबसे असाधारण यात्राओं में दिखाई देता है। एक संगठन कार्यकर्ता से गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर देश के प्रधानमंत्री तक का सफर। प्रधानमंत्री के रूप में भी मोदी 12 साल पूरे कर चुके हैं।

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इन 25 वर्षों में उन्होंने बहुत चुनाव जीते, बहुत विरोध झेले और कई बड़े फैसले लिए, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में बने रहे। समर्थक हों या विरोधी, दोनों की राजनीति में नरेंद्र मोदी की मौजूदगी साफ दिखाई देती है, लेकिन मोदी की कहानी को केवल उनकी उपलब्धियों और चुनावी जीत के जरिए समझना अधूरा होगा। उनकी राजनीति का दूसरा पक्ष भी है, वह पक्ष, जिसे विपक्ष लगातार सामने रखता रहा है।
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विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप है कि पिछले 12 वर्षों में सत्ता का बहुत ज्यादा केंद्रीकरण हुआ है। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार और पार्टी के फैसलों में प्रधानमंत्री कार्यालय और खुद नरेंद्र मोदी की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है। विपक्ष इसे स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय मानता है।
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विपक्षी दल यह भी कहते रहे हैं कि संसद में सरकार और विपक्ष के बीच संवाद कम हुआ है। महत्वपूर्ण विधेयकों को जल्दी पारित कराने, विपक्षी सांसदों के निलंबन और संसदीय बहस के समय को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। 

जनता का स्पष्ट जनादेश

सरकार इन आरोपों को राजनीतिक आरोप बताती है और उसका तर्क है कि जनता ने उसे स्पष्ट जनादेश दिया है, लेकिन विपक्ष के लिए सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं है। उसका कहना है कि लोकतंत्र में चुनाव जीतना सरकार बनाने का अधिकार देता है, लेकिन विपक्ष को सवाल पूछने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही टकराव आज चुनावी व्यवस्था के सवाल पर भी दिखाई दे रहा है।

विपक्ष मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर सड़क पर उतर चुका है। विपक्ष का कहना है कि चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं है। मतदाता सूची से लेकर वोटों की गिनती तक पूरी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा होना चाहिए।

सरकार और चुनाव आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि चुनाव प्रक्रिया नियमों और कानून के अनुसार चलती है, लेकिन विपक्ष का सवाल अपनी जगह है, अगर सब कुछ ठीक है तो इन सवालों का जवाब विस्तार से और पारदर्शी तरीके से क्यों न दिया जाए?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि नरेंद्र मोदी की पूरी राजनीति चुनावी जनादेश पर टिकी है। उनकी सबसे बड़ी ताकत ही जनता से मिलने वाला वोट है। इसलिए चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों को हल्के में लेना किसी भी सरकार के लिए ठीक नहीं होगा।

केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल

विपक्ष की दूसरी बड़ी शिकायत संस्थाओं को लेकर है। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है। ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की कार्रवाई को लेकर विपक्ष कई बार सरकार पर निशाना साध चुका है।

सरकार का जवाब है कि जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से अपना काम करती हैं और भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई राजनीति देखकर नहीं की जा सकती। सच यह है कि इन आरोपों और जवाबों के बीच जनता के मन में सवाल जरूर पैदा हुए हैं। लोकतंत्र में संस्थाओं की ताकत जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि उन पर पक्षपात का संदेह न हो।

मोदी की राजनीति का एक और बड़ा मुद्दा सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण है। भाजपा और मोदी के समर्थक इसे सांस्कृतिक आत्मविश्वास और लंबे समय से उपेक्षित भावनाओं की अभिव्यक्ति मानते हैं। विपक्ष का आरोप है कि धर्म और राष्ट्रवाद का राजनीतिक इस्तेमाल समाज में विभाजन बढ़ाता है।

नागरिक संहिता, जनसंख्या और हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे

राम मंदिर से लेकर समान नागरिक संहिता, जनसंख्या और हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों तक भाजपा ने अपनी विचारधारा को खुलकर राजनीति के केंद्र में रखा है। भाजपा के लिए यह उसके मूल विचारों की राजनीति है। विपक्ष के लिए चिंता यह है कि भारत जैसे विविध देश में सरकार को सभी समुदायों के बीच बराबरी और भरोसे की भावना बनाए रखने की अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है।

यहीं मोदी की राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती भी दिखाई देती है, जो लोग उन्हें पसंद करते हैं, वे उनके काम को देखते हैं। जो विरोध करते हैं, वे उनके दौर में बदलती राजनीतिक भाषा और सामाजिक माहौल को लेकर चिंतित हैं। यह विरोध सिर्फ विपक्षी नेताओं तक सीमित नहीं है।

कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार

किसान आंदोलन इसका उदाहरण है। तीन कृषि कानूनों को सरकार ने कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार के रूप में पेश किया था। किसान संगठनों ने इसका विरोध किया और लंबे समय तक आंदोलन चलाया। आखिरकार प्रधानमंत्री ने तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की। विपक्ष ने इसे सरकार की राजनीतिक हार बताया। सरकार और भाजपा ने इसे किसानों के हित में लिया गया फैसला कहा।

यहां नरेंद्र मोदी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। वे हर विरोध के आगे नहीं झुकते, लेकिन जब किसी फैसले की राजनीतिक और सामाजिक कीमत बहुत बड़ी हो जाती है तो पीछे हटने का फैसला भी कर सकते हैं।

आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

इसी साल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा छात्रों के आंदोलन के बीच हुआ। इस घटना को भी विपक्ष ने सरकार पर बढ़ते दबाव के रूप में देखा, यानी यह कहना ठीक नहीं होगा कि मोदी कभी विरोध के आगे नहीं झुके, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उन्होंने किसी एक राजनीतिक झटके को अपनी पूरी राजनीति पर हावी नहीं होने दिया। यही शायद उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

विपक्ष की एक और बड़ी चुनौती यह है कि वह मोदी के सामने अपना वैकल्पिक चेहरा और स्पष्ट राजनीतिक कहानी अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं कर पाया है। मोदी की राजनीति बहुत हद तक व्यक्ति-केंद्रित है, लेकिन विपक्ष का जवाब भी कई बार व्यक्ति-केंद्रित विरोध तक सीमित दिखाई देता है, ‘मोदी हटाओ’।

मोदी को सबसे बड़ी राजनीतिक बढ़त

जनता के सामने सवाल यह है कि मोदी के बाद क्या? देश किस दिशा में जाएगा? अर्थव्यवस्था, रोजगार, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, संघीय ढांचा और सामाजिक सद्भाव को लेकर विपक्ष की अपनी योजना क्या है? यही वह जगह है, जहां मोदी को सबसे बड़ी राजनीतिक बढ़त मिलती है। उनके खिलाफ नाराजगी हो सकती है, लेकिन नाराजगी अपने आप में वैकल्पिक राजनीति नहीं बनती। विपक्ष के सामने असली चुनौती मोदी का विरोध करना नहीं, अपितु मोदी के मुकाबले एक भरोसेमंद विकल्प खड़ा करना है।

आज जब विपक्ष सड़क पर है, उसी समय नरेंद्र मोदी दिल्ली के श्री विनायक मंदिर में पूजा-अर्चना कर रहे हैं। यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है। विपक्ष आंदोलन की भाषा में जनता से बात करना चाहता है। मोदी इस समय आस्था और अपने परिचित राजनीतिक प्रतीकों के जरिए अपने समर्थकों के बीच दिखाई दे रहे हैं। दोनों तस्वीरें लोकतंत्र की तस्वीरें हैं, लेकिन लोकतंत्र में सड़क पर उतरना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि जनता यह महसूस करे कि विरोध के पास कोई ठोस विकल्प भी है।

नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत शायद यही है कि उन्होंने अपने समर्थकों के बीच एक मजबूत भरोसा बनाया है। विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह उस भरोसे को अभी तक पूरी तरह तोड़ने वाली कोई दूसरी कहानी नहीं बना पाया है। इसका मतलब यह नहीं कि मोदी की राजनीति के सामने कोई चुनौती नहीं है।

2024 का लोकसभा चुनाव

25 साल की सत्ता अपने साथ थकान भी लाती है। लंबे समय तक एक ही नेतृत्व रहने पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक तनाव जैसे मुद्दे आने वाले वर्षों में सरकार की परीक्षा लेते रहेंगे। इसके अलावा, वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव एक संकेत दे चुका है।

नरेंद्र मोदी की 25 साल की यात्रा

भाजपा को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। इसका मतलब यह नहीं कि मोदी की राजनीति खत्म हो गई, लेकिन यह जरूर बताता है कि मतदाता हमेशा एक ही तरीके से मतदान नहीं करता। गठबंधन की राजनीति की वापसी भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। इसलिए नरेंद्र मोदी की 25 साल की यात्रा को केवल विजय की कहानी मानना भी ठीक नहीं होगा। इसमें जीत है तो वापसी भी है, लोकप्रियता है तो विरोध भी है, मजबूत नेतृत्व है तो सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर चिंता भी है। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।

जीत के बाद मोदी भारतीय राजनीति का केंद्र

मोदी के समर्थक उनकी उपलब्धियां गिनाएंगे। विपक्ष उनकी कमियां गिनाएगा। इतिहास दोनों को साथ रखकर फैसला करेगा, लेकिन आज की तारीख में एक बात साफ है, नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में हैं। उनके विरोधी लगातार चुनौती दे रहे हैं, लेकिन अभी तक उनके मुकाबले ऐसा विकल्प खड़ा नहीं कर पाए हैं, जो पूरे देश में उतना ही प्रभाव पैदा कर सके। शायद नरेंद्र मोदी की असली शक्ति यही है। उन्होंने सिर्फ चुनाव नहीं जीते, उन्होंने भारतीय राजनीति का केंद्र अपने आसपास बना दिया।

अब सवाल यह है कि अगले कुछ वर्षों में विपक्ष इस केंद्र को बदल पाता है या नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में किसी नेता की सबसे बड़ी परीक्षा उसके समर्थकों से नहीं, उसके विरोधियों से होती है। नरेंद्र मोदी के 25 साल पूरे होने पर भारतीय राजनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या विपक्ष नरेंद्र मोदी को हराने की राजनीति से आगे बढ़कर, नरेंद्र मोदी के बाद का भारत बनाने की राजनीति कर पाएगा? इतिहास इसका जवाब देगा।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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