दूसरा पहलू: उदमीराम की जांबाजी और अंग्रेजों का खूनी कोल्हू, 1857 में दिल्ली में कत्लेआम से दहशतजदा थी हुकूमत
अंग्रेजों ने चौधरी सहजराम समेत 22 क्रांतिकारियों को जीटी रोड पर कोड़ों से पीटा। फिर सड़क कूटने वाले कोल्हू के पत्थरों से कुचल दिया। लेखक डॉ. महेंद्र सिंह बताते हैं कि संयुक्त पंजाब प्रांत में सबसे पहले उदमीराम ने ही अंग्रेजों को लगान देने से मना किया था। उन्होंने गांव के युवाओं का क्रांतिकारी संगठन बनाया।
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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मई-1857 में दिल्ली में कत्लेआम से दहशतजदा अंग्रेजों को अंबाला की ओर भागने का रास्ता तक नहीं मिला था। इधर जो आया, मारा गया। इस रास्ते पर काबिज सोनीपत के गांव लिवासपुर के लंबरदार चौधरी उदमीराम और उनके युवा क्रांतिकारी साथियों ने जून तक दिल्ली का अंबाला से संपर्क नहीं होने दिया था।
इतिहासवेत्ता सीबी श्योराण ने ब्रिटिश कमांडरों की रिपोर्ट, द लंदन गजट अखबार व सरकारी अभिलेखों के जरिये लिखी पुस्तक-गैलेंट हरियाणाः द फर्स्ट एंड क्रूशियल बैटलफील्ड ऑफ 1857 में इनकी जांबाजी बयां की है। लिखा है, सोनीपत-अंबाला राष्ट्रीय राजमार्ग-44 से गुजरने वाले अंग्रेज अफसरों को उदमीराम की अगुआई में युवा क्रांतिकारी मौत के घाट उतारकर खाई में फेंक देते थे। ऐसे ही एक अंग्रेज अफसर को मारकर इन्होंने उसकी पत्नी को पड़ोसी गांव भालगढ़ भेज दिया। उसकी देखरेख के लिए एक बाई भी लगा दी थी। यह बाई मुंह-मांगे इनाम के लालच में अंग्रेज महिला को पानीपत के अंग्रेजी कैंप तक पहुंचा आई। कुछ वक्त बाद अंग्रेजी फौज ने लिवासपुर गांव को घेर लिया।
- 1857 में दिल्ली में कत्लेआम से दहशतजदा अंग्रेजों को अंबाला की ओर भागने का रास्ता तक नहीं मिला था। इधर जो आया, मारा गया।
उदमीराम व उनके 22 क्रांतिकारी साथी गिरफ्तार कर लिए गए। राई कस्बे में एक पीपल के पेड़ से उदमीराम और उनकी पत्नी रत्नी देवी को हाथ-पांव में मोटी कीलें ठोककर लटका दिया गया। पत्नी इसे बर्दाश्त न कर सकीं और दम तोड़ दिया। पत्नी की मौत के 35 दिन बाद यह महान योद्धा भी 27 जून 1858 को चिरनिद्रा में सो गया। अंग्रेजों ने गिरफ्तार चौधरी सहजराम समेत 22 क्रांतिकारियों को जीटी रोड पर कोड़ों से पीटा। फिर सड़क कूटने वाले कोल्हू के पत्थरों से कुचल दिया।
हरियाणा में 1857 : जन-विद्रोह, दमन व लोक चेतना पुस्तक के लेखक डॉ. महेंद्र सिंह बताते हैं कि संयुक्त पंजाब प्रांत में सबसे पहले उदमीराम ने ही अंग्रेजों को लगान देने से मना किया था। उन्होंने गांव के युवाओं का क्रांतिकारी संगठन बनाया, जो हमेशा पारंपरिक हथियारों से लैस रहता था। वे गुरिल्ला शैली में अंग्रेजों पर हमले करते थे।
अंग्रेजों ने लिवासपुर की पूरी 2,700 बीघा जमीन जब्त करके ब्रिटिश हुकूमत के वफादार रहे सीताराम को 200 रुपये के मामूली लगान पर इनाम में दे दी। क्रांतिकारी सहजराम सिंह के वंशज व अधिवक्ता राजेश सरोहा कहते हैं, आजादी के बाद भी हमें पुरखों की जमीन नहीं मिली। यह खरीदनी पड़ी। कुछ लोग अब भी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। शहादत का भला यह कैसा सिला है?