फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Who is behind the CJP protests foreign hand involvement and conspiracy

आंदोलन और विदेशी हाथ: बड़े आंदोलनों पर लगे आरोपों का सिलसिलेवार इतिहास

सार

जेपी आंदोलन और आपातकाल से लेकर अन्ना आंदोलन, परमाणु परियोजनाओं के विरोध, एंटी-जीएम अभियान, सीएए विरोध, शाहीन बाग और किसान आंदोलन तक-हर बड़े आंदोलन पर विदेशी हाथ के आरोप क्यों लगते रहे हैं? खालिस्तान, पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों और माओवादी संघर्षों में बाहरी संपर्कों की चर्चा कितनी प्रमाणित है?

हाल में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को लेकर उठे विदेशी फंडिंग के आरोपों के पीछे ठोस सबूत हैं या यह राजनीतिक आरोप भर है? आखिर विदेशी फंडिंग, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और विदेशी साजिश में क्या अंतर है?
 

विज्ञापन
Who is behind the CJP protests foreign hand involvement and conspiracy
सीजेपी और विपक्ष का प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

लोकतंत्र में आंदोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ असहमति जताने का माध्यम हैं। कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठती है, कभी महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ, तो कभी किसी कानून या विकास परियोजना के विरोध में लोग सड़कों पर उतरते हैं। लेकिन जब आंदोलन सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बनता है, तो उसके पीछे बाहरी ताकतों की भूमिका का सवाल भी उठने लगता है।

विज्ञापन


यह सिलसिला किसी एक राजनीतिक दल या सरकार तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग दौर में सत्ता में रहे नेताओं ने विदेशी हस्तक्षेप की आशंका जताई है। दूसरी ओर, आंदोलनकारी और विपक्षी दल कई बार इन आरोपों को जनता की वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने का प्रयास बताते रहे हैं।
विज्ञापन


यहां तीन बातों में अंतर समझना जरूरी है। विदेशी धन प्राप्त करना, किसी विदेशी व्यक्ति या संगठन से समर्थन मिलना और किसी विदेशी देश द्वारा आंदोलन संचालित किया जाना अलग-अलग स्थितियां हैं। पहली दो बातें अपने आप तीसरी बात का प्रमाण नहीं बनतीं।
विज्ञापन
विज्ञापन


जेपी आंदोलन और आपातकाल: विदेशी साजिश की पुरानी बहस

वर्ष 1974 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन भ्रष्टाचार, महंगाई और शासन व्यवस्था के खिलाफ व्यापक असंतोष का प्रतीक बन गया। बिहार से शुरू हुई यह मुहिम धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंच गई। जेपी ने इसे संपूर्ण क्रांति का नाम दिया और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई।

25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया गया। उस दौर में विदेशी साजिश और बाहरी ताकतों की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक आरोप लगाए गए। इंदिरा गांधी के समय विदेशी हाथ, विशेषकर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की कथित भूमिका, राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही।

लेकिन जेपी आंदोलन को किसी विदेशी देश द्वारा संचालित किए जाने की निर्णायक पुष्टि का आधार अलग से प्रस्तुत करना होगा। आंदोलन का व्यापक होना या सरकार को चुनौती देना अपने आप विदेशी हस्तक्षेप साबित नहीं करता।

इस दौर से एक सवाल निकलता है-क्या विदेशी साजिश का तर्क कभी-कभी राजनीतिक विरोध को कमजोर करने के लिए भी इस्तेमाल होता है? इस सवाल का उत्तर प्रत्येक घटना के तथ्यों के आधार पर ही दिया जा सकता है।

अन्ना हजारे आंदोलन: अमेरिका का नाम क्यों आया?

वर्ष 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देशव्यापी समर्थन हासिल किया। जन लोकपाल की मांग को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान और जंतर-मंतर से उठी आवाज ने तत्कालीन यूपीए सरकार को राजनीतिक दबाव में ला दिया।

17 अगस्त 2011 को कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आंदोलन के पीछे विदेशी हाथ होने की आशंका जताई। अमेरिकी विदेश विभाग ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर टिप्पणी की थी। कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया कि अमेरिका को भारतीय आंदोलन पर बयान देने की जरूरत क्यों पड़ी। 

लेकिन अमेरिकी बयान और आंदोलन के संचालन के बीच कोई स्वतः सिद्ध संबंध नहीं था। अन्ना आंदोलन के मामले में विदेशी हाथ का आरोप राजनीतिक बहस का हिस्सा बना, पर इसे अमेरिका द्वारा संचालित आंदोलन कहने के लिए अलग प्रमाण चाहिए।

कुडनकुलम: विदेशी फंडिंग और विरोध का विवाद

तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना के खिलाफ 2011-12 में बड़े प्रदर्शन हुए। स्थानीय लोगों और मछुआरों ने संयंत्र की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। नवंबर 2011 में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने आंदोलन में भू-राजनीतिक और बाजार संबंधी ताकतों की भूमिका की आशंका जताई। 

फरवरी 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी विदेशी वित्तपोषित एनजीओ की भूमिका पर सवाल उठाए। कुछ संगठनों के विदेशी धन और उसके इस्तेमाल की जांच हुई तथा विदेशी अंशदान नियमन कानून के तहत कार्रवाई भी की गई।

यह मामला केवल राजनीतिक आरोप तक सीमित नहीं था, क्योंकि विदेशी धन और नियामकीय अनुपालन से जुड़े सवालों पर प्रशासनिक कार्रवाई हुई। लेकिन विदेशी धन मिलने या किसी नियम के उल्लंघन से यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि पूरा आंदोलन किसी विदेशी देश द्वारा संचालित था।

कुडनकुलम की घटना एक बुनियादी सवाल उठाती है-क्या विदेशी फंडिंग की जांच के साथ-साथ स्थानीय लोगों की परमाणु सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान भी उतनी ही गंभीरता से होना चाहिए?

जैतापुर और एंटी-जीएम आंदोलन: पर्यावरण से कृषि तक

महाराष्ट्र के जैतापुर में प्रस्तावित परमाणु बिजली परियोजना के खिलाफ भी स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं ने विरोध किया। विदेशी वित्तपोषित संगठनों की भूमिका को लेकर इस तरह की परियोजनाओं पर व्यापक राजनीतिक बहस हुई। हालांकि, जैतापुर आंदोलन के विदेशी नियंत्रण की निर्णायक पुष्टि का आधार अलग से सामने रखना जरूरी है।

इसी दौर में आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलों के व्यावसायीकरण को लेकर भी विवाद हुआ। वर्ष 2012 में मनमोहन सिंह ने विदेशी वित्तपोषित एनजीओ की भूमिका पर चिंता जताई और कहा कि ऐसे संगठन भारत में परमाणु ऊर्जा तथा जीएम तकनीक से जुड़ी परियोजनाओं को प्रभावित कर रहे हैं। 

लेकिन जीएम फसलों का विरोध करने वाले सभी किसान संगठनों और कार्यकर्ताओं को विदेशी एजेंडे से जोड़ना सही नहीं होगा। कृषि, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा से संबंधित असहमति का अपना घरेलू आधार भी हो सकता है। यहां भी आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

सीएए विरोध और शाहीन बाग: आंदोलन या वैश्विक साजिश?

दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन शुरू हुए। दिल्ली के शाहीन बाग में महिलाओं का धरना इस आंदोलन का प्रमुख प्रतीक बना। कानून को लेकर संवैधानिक अधिकारों, नागरिकता और भेदभाव की आशंकाओं पर देशव्यापी बहस हुई।

इसी दौरान कुछ राजनीतिक नेताओं ने आंदोलन को साजिश और वैश्विक नेटवर्क से जोड़ने वाले आरोप लगाए। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के बाद पुलिस ने कथित साजिश से संबंधित मामले दर्ज किए। लेकिन दंगों की जांच में लगाए गए आरोपों को पूरे सीएए विरोधी आंदोलन पर लागू नहीं किया जा सकता।

यहां भी सवाल यही है कि क्या किसी विशेष घटना में कथित साजिश का आरोप पूरे आंदोलन के विदेशी नियंत्रण का प्रमाण बन सकता है? इसका उत्तर नहीं है। किसी मामले में आरोप, जांच और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य अलग-अलग चरण हैं।

किसान आंदोलन: विदेशी हस्तियों की टिप्पणियों से बढ़ी बहस

वर्ष 2020-21 में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लंबा आंदोलन किया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित कई क्षेत्रों के किसान संगठनों ने इन कानूनों को लेकर आशंकाएं जताईं। आंदोलन के दबाव में केंद्र सरकार ने नवंबर 2021 में तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा की।

फरवरी 2021 में रिहाना और ग्रेटा थनबर्ग जैसी विदेशी हस्तियों ने किसान आंदोलन पर टिप्पणियां कीं। इसके बाद विदेशी हस्तियों की भूमिका और भारत के आंतरिक मामलों पर अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियों को लेकर विवाद बढ़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में ‘फॉरेन डिस्ट्रक्टिव आइडियोलॉजी’ यानी विदेशी विनाशकारी विचारधारा का उल्लेख किया। 

लेकिन विदेशी हस्तियों का समर्थन और किसी देश द्वारा आंदोलन का संचालन अलग बातें हैं। किसी आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय चर्चा मिलना अपने आप विदेशी साजिश साबित नहीं करता।

खालिस्तान, पूर्वोत्तर और माओवादी संघर्ष: सुरक्षा का अलग सवाल

विदेशी हाथ की बहस केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रही। खालिस्तान आंदोलन के संदर्भ में विदेशों में सक्रिय अलगाववादी संगठनों, पाकिस्तान से कथित समर्थन और सीमा पार नेटवर्क की भूमिका पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं।

पूर्वोत्तर के कुछ उग्रवादी संगठनों के संबंध में भी पड़ोसी देशों में ठिकानों, प्रशिक्षण और सहायता के आरोप सामने आए हैं। नक्सल-माओवादी संघर्ष के मामले में संगठनात्मक संपर्कों तथा बाहरी समर्थन को लेकर समय-समय पर सवाल उठे हैं।

इन मामलों की प्रकृति आम लोकतांत्रिक आंदोलनों से अलग है। किसी उग्रवादी संगठन के सीमा पार संपर्कों के प्रमाण हों, तो वे उस संगठन और संबंधित गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य हो सकते हैं। लेकिन उनसे हर स्थानीय आंदोलन, सामाजिक विरोध या राजनीतिक असहमति को विदेशी साजिश कहना उचित नहीं होगा।

कॉकरोच जनता पार्टी: विदेशी फंडिंग के आरोप और बाहरी हस्तक्षेप का सवाल

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को लेकर विदेशी फंडिंग और बाहरी हस्तक्षेप के आरोपों को भी इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जा सकता है। जब किसी संगठन या आंदोलन की गतिविधियां राजनीतिक बहस का केंद्र बनती हैं, तो उसके वित्तीय स्रोतों और संभावित बाहरी संपर्कों पर सवाल उठने लगते हैं। लेकिन सवाल उठना और आरोप साबित होना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए यह देखना जरूरी है कि आरोप किसने लगाए, उनके समर्थन में क्या दस्तावेज या साक्ष्य पेश किए गए और जांच एजेंसियों की ओर से क्या आधिकारिक जानकारी सामने आई।

सीजेपी के मामले को दूसरे आंदोलनों से जोड़ते समय भी वही कसौटी लागू होनी चाहिए। क्या विदेशी धन मिलने का कोई प्रमाण है? क्या किसी विदेशी संगठन की सहायता के दस्तावेज सामने आए हैं? या मामला केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित है? जब तक ठोस प्रमाण सामने न आएं, विदेशी हाथ की बात को आरोप के रूप में ही प्रस्तुत करना चाहिए। यही इस ब्लॉग का मूल सवाल भी है-भारत में आंदोलनों के पीछे विदेशी साजिश के आरोप बार-बार क्यों लगते हैं, और उनमें से कितने आरोप प्रमाणों की कसौटी पर खरे उतरते हैं?

विदेशी हाथ के आरोप: राजनीति का पुराना सिलसिला

इन सभी उदाहरणों को साथ रखकर देखें तो एक समान राजनीतिक सवाल उभरता है। जेपी आंदोलन के दौर में विदेशी साजिश की चर्चा हुई। अन्ना हजारे आंदोलन में अमेरिका का नाम आया। कुडनकुलम और जीएम फसलों के मामले में विदेशी वित्तपोषित एनजीओ की भूमिका पर सवाल उठे। सीएए विरोध और किसान आंदोलन में भी बाहरी ताकतों का मुद्दा राजनीतिक विमर्श में शामिल हुआ।

हालांकि, इन सभी मामलों में विदेशी हाथ होने की पुष्टि का दावा नहीं किया जा सकता। कुछ मामलों में विदेशी वित्तपोषण की जांच हुई, कुछ में विदेशी हस्तियों ने समर्थन दिया और कुछ में राजनीतिक नेताओं ने आशंकाएं जताईं। इन सभी को एक ही श्रेणी में रखना तथ्यों के साथ न्याय नहीं होगा।

लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप की वास्तविक आशंकाओं की जांच जरूरी है। विदेशी धन से जुड़े कानूनों का उल्लंघन हो तो कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन सरकार की नीतियों का विरोध करना देश का विरोध करना नहीं है। आंदोलन की मांगों पर विचार करने के बजाय उसके पीछे विदेशी ताकत तलाशना भी मूल सवालों से ध्यान हटा सकता है।

अंततः सवाल यह नहीं है कि विदेशी हाथ का आरोप कितनी बार लगा। सवाल यह है कि आरोप के समर्थन में क्या प्रमाण सामने आए और क्या उन प्रमाणों की निष्पक्ष जांच हुई?

भारत के राजनीतिक इतिहास में विदेशी साजिश के आरोपों का यह सिलसिला बताता है कि सत्ता और आंदोलन के बीच संघर्ष में यह मुद्दा बार-बार लौटता रहा है। लेकिन किसी आंदोलन को विदेशी नियंत्रण में बताने के लिए राजनीतिक बयान नहीं, ठोस प्रमाण चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह विदेशी हस्तक्षेप की आशंकाओं की जांच करे और साथ ही असहमति के अधिकार की रक्षा भी करे।




--------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed