फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Ensure degrees actually serve purpose dignified livelihood to number of people should be development yardstick

ताकि डिग्री काम तो आए: कितने युवाओं को सम्मानजनक आजीविका मिली, विकास की यही कसौटी होनी चाहिए

Fri, 28 Aug 2026 08:34 AM IST
न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: न्यूज डेस्क Updated Fri, 28 Aug 2026 08:34 AM IST
विज्ञापन
Ensure degrees actually serve purpose dignified livelihood to number of people should be development yardstick
युवाओं की शिक्षा उनकी आजीविका से जुड़े (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Freepik

देश में कौशल विकास की तमाम पहलों के बीच नीति आयोग की रिपोर्ट का यह खुलासा कि देश में 90 फीसदी से अधिक स्नातक ऐसी नौकरियों में हैं, जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप नहीं हैं, चिंताजनक तो खैर है ही, शिक्षा व रोजगार के बीच गहराते असंतुलन का भी प्रमाण है। यह दुर्भाग्य ही है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी डिग्री हासिल करने को सफलता का पर्याय मानती है, जबकि वर्तमान रोजगार बाजार अब व्यावहारिक दक्षता, तकनीकी ज्ञान, संचार क्षमता, समस्या समाधान और अनुभव की मांग करता है।

विज्ञापन


नीति आयोग ने इस विरोधाभास की एक बड़ी वजह पाठ्यक्रम को माना है, जो ज्यादातर संस्थानों में काफी पुराने हैं और इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से नहीं हैं। नतीजतन, ऐसी डिग्रियां, डिप्लोमा और प्रमाण-पत्र मिलते हैं, जिनसे अक्सर सीधे नौकरी नहीं मिलती।
विज्ञापन


अगर कोई युवा तीन या चार वर्ष किसी विषय को पढ़ने में लगाता है, पर डिग्री हासिल करने के बाद उसे ऐसा काम करना पड़ता है, जिसका उसकी पढ़ाई से कोई सीधा संबंध नहीं है, तो इसे शिक्षा व्यवस्था, कौशल प्रशिक्षण और अर्थव्यवस्था, तीनों के बीच तालमेल की कमी का नतीजा ही समझा जाना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन


रिपोर्ट यह भी कहती है कि देश में सभी ग्रेजुएट लोगों में बेरोजगारी दर 13 फीसदी और ग्रेजुएट महिलाओं में 20.4 फीसदी है, जो देश की औसत बेरोजगारी दर से कहीं अधिक है। यानी, उच्च शिक्षा हासिल करना अब बेहतर रोजगार की गारंटी नहीं रह गया है। कई मामलों में तो यह अपेक्षाओं और वास्तविक अवसरों के बीच की दूरी को और बढ़ा रहा है।

दरअसल, देश में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाई का बड़ा हिस्सा कक्षा व परीक्षा तक ही सीमित रहता है। छात्रों को वास्तविक कार्यस्थल, अप्रेंटिसशिप, परियोजना-आधारित शिक्षा तथा उद्योग विशेषज्ञों से सीखने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते हैं। यहां समझना जरूरी है कि सामान्य डिग्रियां अपने आप में निरर्थक नहीं हैं। अगर बीए करने वाला विद्यार्थी डाटा विश्लेषण, डिजिटल संचार, शोध, वित्तीय साक्षरता या किसी अन्य रोजगारोन्मुख कौशल से भी परिचित हो, तो उसकी संभावनाएं कई गुना बढ़ सकती हैं।


लिहाजा, समाधान डिग्रियों को बदलती हुई अर्थव्यवस्था से जोड़ने में हो सकता है। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादियों में से एक है। पर, यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक शक्ति में बदलेगा, जब युवाओं की शिक्षा उनकी आजीविका से जुड़ेगी। ऐसे में, नीति आयोग की रिपोर्ट एक आईना है। कितने युवाओं को डिग्री मिली के बजाय उन डिग्रियों ने कितने युवाओं को सम्मानजनक आजीविका तक पहुंचाया, विकास की यही कसौटी होनी चाहिए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed