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मुद्दा: अदालत के फैसले के बाद महिला-पुरुष भेदभाव पर फिर से छिड़ी बहस, क्या जोखिम भरे काम महिलाओं के लिए नहीं?

Mon, 05 Oct 2026 08:07 AM IST
न्यूज डेस्क रवि शंकर शर्मा
रवि शंकर शर्मा Published by: न्यूज डेस्क Updated Mon, 05 Oct 2026 08:07 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय यह स्पष्ट करता है कि किसी काम की कठिनाई के आधार पर यह तय नहीं होना चाहिए कि उसे महिला कर सकती है या पुरुष।

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gender discrimination Debate after supreme court ruling whether high-risk jobs unsuitable for women
महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव नया नहीं (प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं के साथ होने वाले उस पुराने भेदभाव पर फिर से बहस छेड़ दी है, जो आज भी कई जगह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दिखाई देता है। मामला करीब चार दशक पुराना है। हरियाणा की सुमित्रा नामक महिला ने 1988 में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के करनाल स्थित एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में हेल्पर के पद के लिए आवेदन किया था। वह निर्धारित योग्यता पूरा करती थी और 49 उम्मीदवारों की सूची में शामिल थी, पर 43 लोगों को नियुक्त किए जाने के बावजूद उसे नौकरी नहीं मिली। बाद में यह सामने आया कि महिला होने के कारण उसे सिलेंडर उठाने जैसे काम के लिए अनुपयुक्त माना गया।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब घरों में महिलाएं स्वयं गैस सिलेंडर उठाती व बदलती हैं, तो केवल महिला होने के आधार पर किसी को ऐसे काम के योग्य न मानना उचित नहीं है। चूंकि लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब उसकी नियुक्ति की उम्र निकल चुकी थी, इसलिए अदालत ने इंडियन ऑयल को उन्हें 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।
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यह फैसला केवल एक महिला को मुआवजा देने का नहीं है। इसके पीछे उस मानसिकता पर भी गंभीर सवाल उठते हैं, जिसमें किसी व्यक्ति की क्षमता का आकलन उसके कौशल, प्रशिक्षण व शारीरिक योग्यता के बजाय उसके स्त्री या पुरुष होने से किया जाता है। महिलाएं आज उन क्षेत्रों में भी अपनी क्षमता साबित कर रही हैं, जिन्हें कभी पूरी तरह पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। वे लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, सेना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रही हैं। ऐसे में किसी महिला को किसी नौकरी के लिए इसलिए अनुपयुक्त मान लेना कि उसमें जोखिम हैं, पुराने लैंगिक पूर्वाग्रह को ही मजबूत करता है। महिलाओं को जोखिम से बचाने व महिलाओं को जोखिम के कारण अवसर से वंचित करने में बहुत फर्क है। किसी भी खतरनाक काम में सुरक्षा मानकों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए, चाहे कर्मचारी महिला हो या पुरुष। लेकिन सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को पूरे क्षेत्र से बाहर कर देना उचित नहीं माना जा सकता।
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सही तरीका यह है कि काम की वास्तविक  आवश्यकताओं व जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। कर्मचारियों को उचित प्रशिक्षण दिया जाए और चयन योग्यता के आधार पर हो। रिव्यू ऑफ इकनॉमिक स्टडीज में प्रकाशित डेनमार्क के अध्ययन में पाया गया कि छोटे व्यवसायों में पुरुष प्रबंधक की पहली संतान बेटी होने के बाद महिलाओं की सापेक्ष रोजगार स्थिति व कमाई में वृद्धि हुई। अध्ययन के अनुसार, महिलाओं की सापेक्ष कमाई में 4.4 प्रतिशत व रोजगार में 2.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। इस शोध को भारत की परिस्थितियों पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों देशों की सामाजिक और श्रम-बाजार स्थितियां अलग हैं। फिर भी यह अध्ययन इस बात की ओर संकेत करता है कि कार्यस्थल पर महिलाओं को लेकर बनी धारणाएं स्थायी नहीं होतीं और सामाजिक अनुभव उनमें बदलाव ला सकते हैं।  हमारे देश में असली चुनौती अब  यह होनी चाहिए कि हर काम के लिए समान अवसर और समान मूल्यांकन कैसे सुनिश्चित किया जाए। गर्भावस्था, मातृत्व, कार्यस्थल की सुरक्षा और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भेदभाव रहित व्यवस्थाएं जरूरी हैं। संरक्षण का उद्देश्य अवसर छीनना नहीं, बल्कि सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना होना चाहिए।

दरअसल, महिलाओं को जोखिम भरे काम से दूर रखने का प्रश्न पूछने से पहले हमें यह पूछना चाहिए कि क्या वह काम सुरक्षित बनाया जा सकता है और क्या उस काम के लिए महिला आवश्यक योग्यता रखती है ? यदि उत्तर हां है, तो केवल महिला होने के कारण दरवाजा बंद करने का कोई तार्किक आधार नहीं बचता। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय से यही बड़ा संदेश निकलता है कि रोजगार में समानता केवल नियुक्ति पत्र पाने का अधिकार नहीं है, यह उस मानसिकता को बदलने का भी प्रश्न है, जो पहले से तय कर लेती है कि कौन क्या काम कर सकता है और कौन नहीं। समाज को महिलाओं के लिए न तो कृत्रिम विशेषाधिकार चाहिए और न ही कृत्रिम सीमाएं। आवश्यकता है समान अवसर, समान कसौटी व सुरक्षित कार्यस्थल की।


आखिरकार किसी काम की कठिनाई के आधार पर यह तय नहीं होना चाहिए कि उसे महिला कर सकती है या पुरुष। काम की जरूरतें तय करें कि कर्मचारी में कौन-सी योग्यता होनी चाहिए और फिर उस कसौटी पर हर व्यक्ति को समान अवसर दिया जाए।

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