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प्रक्रिया ही नहीं, सोच भी बदली: गति शक्ति और प्रगति से कैसे बदल रहा देश में बुनियादी ढांचे के विकास का तरीका?
Mon, 26 Oct 2026 06:49 AM IST
शिवम गर्ग
राजीव गॉबा, सदस्य, नीति आयोग, पूर्व कैबिनेट सचिव
राजीव गॉबा, सदस्य, नीति आयोग, पूर्व कैबिनेट सचिव
Published by: शिवम गर्ग
Updated Mon, 26 Oct 2026 06:49 AM IST
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प्रगति पोर्टल से परियोजनाओं की निगरानी
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अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
विस्तार
देश के रेल, सड़क, हवाई संपर्क समेत बुनियादी ढांचे में आए बड़े बदलावों को तो हाल में सभी ने महसूस किया है, लेकिन जो एक बड़ा मौलिक परिवर्तन है, वह है बुनियादी ढांचे की अवधारणा, योजना और वितरण के तरीके में आमूल-चूल बदलाव। काम पर जा रहा एक युवा व्यक्ति, मंडी में फसलों को ले जा रहा एक किसान, या आपूर्ति शृंखला का प्रबंधन करने वाला विनिर्माता, समग्र रूप में सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों, पानी और बिजली पर भरोसा करता है। जब इस शृंखला की एक कड़ी भी निर्बल या लुप्त होती है, तो हर दूसरे निवेश पर रिटर्न और जीवन की सुगमता प्रभावित होती है।
मेरा अनुभव है कि इंफ्रास्ट्रक्चर या अवसंरचना के क्षेत्र में व्यक्तिगत रूप से उचित निर्णयों के बिना इच्छित और अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे पहले ही लगभग सहज रूप से समझ लिया था। उन्होंने विभागीय दृष्टिकोण के बजाय उस बड़े परिणाम पर ध्यान केंद्रित किया, जिसे अर्जित किया जाना है। यह परिणाम-उन्मुख, नागरिक-केंद्रित परिप्रेक्ष्य ही प्रशासन के प्रति नया दृष्टिकोण है। हम गुजरात में उनके मुख्यमंत्रित्व के कार्यकाल में इस दृष्टिकोण की शुरुआत देख सकते हैं। वहां उनकी बुनियादी ढांचे की योजना ने धीरे-धीरे विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं और उनके द्वारा समर्थित आर्थिक कार्यकलापों के अनुरूप कार्य करने की कोशिश की। प्रगति पथ, प्रवासी पथ, विकास पथ और किसान पथ जैसी पहलों को अलग-अलग कनेक्टिविटी के अनुरूप जरूरतों के आसपास डिजाइन किया गया था। धोलेरा सहित अन्य विशेष निवेश क्षेत्रों के विकास से भूमि, बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी एकसाथ आए, जिसका उद्देश्य बड़े आर्थिक नोड्स बनाना था।
इस विजन का एक महत्वपूर्ण आयाम प्रौद्योगिकी का उपयोग था। गुजरात में, बीआईएसएजी ने उपग्रह अनुप्रयोगों, भौगोलिक सूचना प्रणाली और स्थानिक योजना में क्षमताओं का विकास किया। भू-स्थानिक जानकारी ने राज्य के वास्तविक भूगोल के माध्यम से विकास को देखना संभव बना दिया, जिससे भूमि, सड़कों, जल संसाधनों, बस्तियों, उद्योगों और अन्य बुनियादी ढांचे पर जानकारी एकसाथ आ गई। इसने इस बात की अधिक एकीकृत समझ प्रदान की कि विकास के विभिन्न तत्व एक-दूसरे से कैसे संबंधित हैं। इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्तर पर गति शक्ति का शुभारंभ संभव हो सका। गति शक्ति ने बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की एकीकृत योजना और समन्वित निष्पादन सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एकसाथ लाने के लिए एक संपूर्ण सरकारी दृष्टिकोण को सक्षम बनाया।
यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उठ सकता है कि क्या गति शक्ति से पहले सरकारी विभाग एक-दूसरे के साथ समन्वय नहीं करते थे? बेशक, वे करते थे। लेकिन, सरकारों ने पारंपरिक रूप से जो समन्वय किया है और गति शक्ति जिस दृष्टिकोण को संस्थागत बनाना चाहती है, उसमें एक बुनियादी अंतर है। परंपरागत रूप से, समन्वय अक्सर तब शुरू होता था, जब एक-दूसरे पर निर्भरता के कारण कोई समस्या उत्पन्न हो जाती थी। एक अंतर-विभागीय बैठक बुलाई जाती थी और समस्या के निदान की कोशिश की जाती थी। गति शक्ति यह समन्वय योजना बनाने के चरण में ही संभव बना देती है।
जमीन पर कार्य आरंभ करते समय एक-दूसरे पर निर्भरता की खोज करने के बजाय योजनाकार उसकी पहचान तभी कर लेते हैं, जब परियोजनाएं ड्राइंग बोर्ड के, यानी कागजी स्तर पर ही होती हैं। गति शक्ति के तहत बनाया गया नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप इस दृष्टिकोण के लिए एक संस्थागत तंत्र प्रदान करता है। पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान में 3,291 से अधिक डाटा परतों का उपयोग करके 58 मंत्रालयों और विभागों में बुनियादी ढांचा योजना को एकीकृत किया गया है। अगस्त 2026 तक, नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप तंत्र के माध्यम से 18 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कुल अनुमानित लागत वाली 396 बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का मूल्यांकन किया गया है। अब, गतिशक्ति सामाजिक बुनियादी ढांचे की योजना बनाने के तरीके को भी बदल रहा है। जैसे दस लाख से अधिक आंगनवाड़ी केंद्रों की मैपिंग की गई है और कुछ राज्य प्लेटफॉर्मों का उपयोग उन वंचित क्षेत्रों की पहचान करने के लिए कर रहे हैं, जहां नए स्कूलों की आवश्यकता है।
सिर्फ बुनियादी ढांचे में सुधार ही नहीं, सार्वजनिक निवेश के बारे में सरकार के सोचने के तरीके में इससे बदलाव आ गया है। न केवल प्रक्रिया को बदल दिया गया है, बल्कि सार्वजनिक निवेश कैसे किया जाता है, इससे जुड़ी मानसिकता में भी बदलाव आ गया है। जब भारत नए व्यापारिक समझौतों में प्रवेश कर रहा है और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी भागीदारी बढ़ा रहा है, कच्चे माल और तैयार वस्तुओं को कुशलतापूर्वक स्थानांतरित करने की क्षमता प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। इसलिए, लॉजिस्टिक की लागत को कम करने को सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों, जलमार्गों, गोदामों और औद्योगिक स्थानों को एकसाथ योजना बनाने के तरीके से अलग नहीं किया जा सकता है।
अवसंरचना परियोजनाओं को लागू करते समय भूमि अधिग्रहण, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और विभिन्न मंत्रालयों के साथ-साथ केंद्र व राज्य सरकारों के बीच समन्वय जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए पहले सरकार में उच्चतम स्तर पर, यानी देश के प्रधानमंत्री के रूप में इस स्तर पर अलग-अलग परियोजनाओं की ऐसी कोई निगरानी नहीं होती थी। मंत्रालयों द्वारा परियोजनाओं की समीक्षा आम तौर पर अधिकारियों के स्तर पर या कभी-कभी मंत्री स्तर पर की जाती थी, लेकिन देशभर के मंत्रालयों में सभी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की समीक्षा एक पोर्टल पर नहीं की जाती थी। ‘प्रगति’ के तहत प्रधानमंत्री हर महीने करीब 25-30 परियोजनाओं की समीक्षा करते हैं। इन बैठकों में केंद्र सरकार के सचिव और राज्यों के मुख्य सचिव भी शामिल होते हैं। नियमित समीक्षा से परियोजनाओं का काम समय पर पूरा करने और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर जोर बढ़ा है।
एकसाथ मिलकर, ‘गति शक्ति’ और ‘प्रगति’ प्रशासन के प्रति एक निर्णायक विशेषता को दर्शाते हैं, जिसका नतीजा है किसी विशिष्ट परियोजना को रोकने वाली विशिष्ट बाधाओं के प्रति चौकस रहते हुए बड़ी प्रणाली को देख सकने की क्षमता। इस प्रणालीगत बदलाव से समग्र परिदृश्य बदल गया है।