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मुद्दा: बदल रही बंगाल की हवा? तस्लीमा नसरीन के कार्यक्रम से बदले माहौल के संकेत, खत्म हो रही टकराव की राजनीति
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तस्लीमा नसरीन, लेखिका
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
बंगाल में लगभग पांच दशकों तक दो-दो सरकारों के दौर में वोट बैंक की राजनीति का बोलबाला रहा, पर अब यहां नई सरकार बनने से हवा काफी बदली हुई लग रही है। इस बार के विधानसभा चुनाव में एक भी लाश नहीं गिरने से राज्य राजनीतिक हिंसा के कलंक से मुक्त हुआ ही, स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव होने से लोकतंत्र की जड़ें भी मजबूत होती दिखीं। भाजपा सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार तो हुआ ही, यहां के अल्पसंख्यक समाज में भी संदेश गया है कि अब वे उकसावे में नहीं आने वाले।कोलकाता में तस्लीमा नसरीन के कार्यक्रम में व्यवधान नहीं आना भी एक अच्छा संकेत है। उन्हें ‘काफी दुखी मन से’ कोलकाता छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था, जिसे वह अपने घर जैसा मानती रही हैं। बांग्ला में तो एक कहावत है, ‘ए पार बांग्ला, ओ पार बांग्ला’। भाषा और संस्कृति में समानता के कारण यह कथन सत्य है। हालांकि, इस वजह से पलायन और घुसपैठ का दंश बंगाल को ही नहीं, पूरे भारत को झेलना पड़ा है।
कोलकाता के कार्यक्रम में भी तस्लीमा ने कड़े शब्दों में इस्लामी कट्टरपंथियों की निंदा की। उनका कहना था कि बांग्लादेश में आज कट्टरपंथ पूरी तरह हावी हो चुका है। उन्होंने वहां उन लोगों की हत्याओं की चर्चा की, जो सच बोलने के कारण मार दिए गए। उन्होंने कहा, ‘जो अपने लिए आधुनिकता चाहते हैं, पर मुस्लिम समाज के लिए मध्ययुगीन व्यवस्था बरकरार रखना चाहते हैं, वे मुसलमानों के सबसे बड़े शत्रु हैं। जो अपनी बेटियों की आजादी को हक कहते हैं और मुस्लिम लड़कियों की गुलामी को उनकी संस्कृति का हिस्सा मानते हैं, उन्हें प्रगतिशील नहीं माना जा सकता।’ उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी, मुस्लिम समाज में वैज्ञानिक सोच पैदा करने, महिला-पुरुष के समान अधिकारों की चर्चा करते हुए यह भी कहा कि धर्मों के हिसाब से कानून नहीं होना चाहिए। यह कहकर उन्होंने एक तरह से यूसीसी का समर्थन किया, जिसे शुभेंदु सरकार लागू करने वाली है।
बंगाल में कड़ा गुंडा दमन कानून लाकर सरकार ने हिंसा भड़काने वाले लोगों के मन में भय पैदा किया है। यही वजह है कि पर्व-त्योहारों पर पथराव व आगजनी पर पूरी तरह लगाम लगी है। हाल में, बांकड़ा मस्जिद का मामला लें। नेताजी सुभाष अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के भीतर 160 साल पुरानी मस्जिद हटाने की शुभेंदु सरकार की पहल के आगे भी कट्टरपंथी पस्त नजर आ रहे हैं। 11 जुलाई से सुरक्षा और मरम्मत के नाम पर मस्जिद में बाहरी लोगों के प्रवेश और नमाज पर पाबंदी लगा दी गई। इसके पहले ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य और ममता बनर्जी ने वोट बैंक का ख्याल रखते हुए मस्जिद हटाने के संबंध में किए गए प्रयासों को विफल कर दिया था। विरोध में बयानबाजी के बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के बंगाल अध्यक्ष व तृणमूल नेता सिद्दीकुल्ला चौधरी ने 17 जुलाई को वहां एक करोड़ मुसलमानों को काली पट्टी बांधकर नमाज पढ़ने के लिए हवाईअड्डे के सात नंबर गेट पर जुटने का आह्वान किया था, पर भारी सुरक्षा इंतजाम और धारा 163 लगने के कारण 10 लोग भी नहीं पहुंचे। नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो के मुताबिक, यह मस्जिद रनवे से केवल 165 मीटर की दूरी पर है, जो नियमों (न्यूनतम 240 मीटर की दूरी) का उल्लंघन है। अधिकारियों का कहना है कि मस्जिद की स्थिति के कारण दूसरे रनवे का पूरा उपयोग हो ही नहीं रहा है, आधुनिक इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएसएस) भी नहीं लग पा रहा है।
जहां तक तस्लीमा की बात है, कलम को हथियार बनाकर औरतों पर हो रहे जुल्म, मजहबी कट्टरता व समाज में फैले भेदभाव के खिलाफ तनी रहकर वह अपनी बात साफ-साफ लहजे में कहती रही हैं, जो कट्टरपंथियों के गले नहीं उतरती। तस्लीमा ने हिंदू धर्म ग्रंथों का भी गहन अध्ययन किया है और वह हिंदू समाज की कुरीतियों पर भी चोट करती रही हैं। हालांकि, बांग्लादेश या भारत में कभी हिंदू समाज ने उनका विरोध नहीं किया। इसे हिंदू धर्म की प्रकृत उदारता कह सकते हैं। निर्वाचित कलाम के एक लेख में उन्होंने लिखा, ‘अनेक लोगों का विचार है कि वैदिक युग में महिलाओं को यथायोग्य मर्यादा मिली थी, इस्लाम के आने के बाद ही उस मर्यादा का लोप हो गया। मैं ऐसा नहीं मानती।’
हमने दलाई लामा को शरण दी है, पर एमएफ हुसैन को अपने देश वापस नहीं बुला पाए, उन्हें कतर की नागरिकता लेनी पड़ी। हिंदू समाज को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या उसने धार्मिक कट्टरता से पूरी तरह मुक्ति पा ली है? edit@amarujala.com