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सत्ता संघर्ष: मुनष्य का जीवन किसी भी राजनीति से बड़ा है, मगर शक्ति की खींचतान करती रही है चोटिल
तस्लीमा नसरीन, जानी-मानी लेखिका
Published by: Pavan
Updated Fri, 27 Mar 2026 08:23 AM IST
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सत्ता संघर्ष: मुनष्य का जीवन किसी भी राजनीति से बड़ा है
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विस्तार
ईरान को केंद्र में रखकर जो युद्ध चल रहा है, वह कोई तात्कालिक घटना नहीं है। ईरान में इस उथल-पुथल की जड़ें वर्षों के राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक संघर्ष में निहित हैं। वर्ष 1979 की क्रांति के बाद ईरान एक कट्टर धार्मिक देश बन गया, जहां सर्वोच्च शक्ति धार्मिक नेता में निहित हो गई। साधारण अर्थ में इसे ही ‘मुल्लातंत्र’ कहते हैं। इस प्रणाली में आंशिक लोकतांत्रिक ढांचे के बावजूद वास्तविक क्षमता निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास नहीं, बल्कि धार्मिक नेताओं के पास होती है। नतीजतन, राष्ट्रीय नीति निर्धारण में जनता की इच्छा के बजाय धार्मिक मतवाद को महत्व मिलता है। इस ढांचे के कारण ही ईरान में पिछले काफी वर्षों से आम जनता का असंतोष बढ़ रहा था। खासकर स्त्री स्वाधीनता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी आदि के मामलों में सत्ता के कठोर नियंत्रण से लोगों में क्षोभ था।अनिवार्य हिजाब कानून इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। यह कानून सिर्फ महिलाओं के पोशाक तक सीमित नहीं है, यह राष्ट्र की नियंत्रण शक्ति का प्रतीक बन चुका है। वर्ष 2022 में वहां एक किशोरी महसा अमिनी की मौत के बाद पूरे ईरान में आंदोलन फैल गया था। तब महिलाओं ने अपना हिजाब उतारकर आक्रोश जताया था, तो नई पीढ़ी भी सड़कों पर उतर आई थी। तब ‘वुमैन, लाइफ, फ्रीडम’ जैसे नारे ईरान की गलियों में गूंजने लगे थे। वर्ष 2022 का वह आंदोलन सिर्फ हिजाब-विरोधी आंदोलन नहीं था। वह समूची मुल्लातांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह था। उस आंदोलन ने जता दिया था कि ईरान के समाज का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक नियंत्रण की नीति को मानने के लिए राजी नहीं है। ईरान में व्याप्त इस अंदरूनी असंतोष को अंतरराष्ट्रीय राजनीति से और हवा मिली।
अमेरिका और इस्राइल की ईरान से शत्रुता पुरानी है। खासकर, ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम, पश्चिम एशिया में उसके बढ़ते असर और आसपास के विभिन्न आतंकवादी समूहों को समर्थन देने के आरोप से तनाव लगातार बढ़ता जा रहा था। हालांकि, ऐसे में अमेरिका और इस्राइल द्वारा लंबे समय तक ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने की नीति गलत ही साबित हुई। इसका उद्देश्य ईरान की सरकार को कमजोर करना था, लेकिन इसका सबसे अधिक नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ा। लंबे समय तक जारी प्रतिबंध से ईरान में मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, दवाओं का संकट जैसी समस्याएं बढ़ीं। इससे वहां के आम लोगों का जीवन कठिन हो गया। लोगों के जीवन में परेशानियां बढ़ीं, लेकिन कई बार बाहरी शक्तियों के खिलाफ प्रतिरोध के भाव से ईरान की सत्ता को और ताकत ही हासिल हुई।
बड़ा सवाल यह है कि ईरान में मुल्लातंत्र का खात्मा जरूरी क्यों है। उसका कारण यह है कि जिस राष्ट्र में कानून के शासन की जगह धार्मिक व्याख्या को प्रमुखता मिलती है, वहां नागरिक स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं है। वैसे में, स्त्री स्वाधीनता, अल्पसंख्यकों के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सब कुछ सीमित हो जाती है। जबकि एक आधुनिक राष्ट्र के लिए जवाबदेही की व्यवस्था, शक्ति संतुलन और जनता की भागीदारी आवश्यक है। मुल्लातांत्रिक व्यवस्था में इन तीनों का अभाव है। हालांकि, यह भी सही है कि बाहरी शक्ति के जरिये किसी देश में किया जाने वाला सत्ता परिवर्तन स्थायी नहीं होता। इराक युद्ध ने हमें दिखाया है कि बाहर से किसी देश में लोकतंत्र स्थापित करने की कोशिश उस देश को और ज्यादा बर्बाद कर देती है।
सच यह है कि ईरान का भविष्य ईरान की जनता तय करेगी। बाहरी शक्ति उसमें मददगार तो हो सकती है, लेकिन उसे नियंत्रित नहीं कर सकती। इसलिए ईरान का वर्तमान संघर्ष सिर्फ एक भू-राजनीतिक समस्या नहीं है, यह एक समाज का अंदरूनी संघर्ष भी है। यह संघर्ष आजादी और अंकुश, आधुनिकता और धार्मिक नियंत्रण के बीच है। इसलिए इस संघर्ष का समाधान सिर्फ सामरिक रास्ते से नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय रास्ते से होगा। ईरान के युद्ध पर बात करते हुए हमें उसके भूगोल, उसकी कूटनीति या सामरिक शक्ति के बजाय ईरान के आम लोगों के बारे में बात करनी चाहिए। ईरान की जमीन पर बरसते बम से सबसे ज्यादा आम लोगों का जीवन ही प्रभावित हो रहा है। युद्ध देशों को आर्थिक दृष्टि से बर्बाद कर देता है। ईरान जैसे उथल-पुथल वाले देश में युद्ध का मतलब है रोजगार का संकट, भोजन की कमी और चिकित्सा प्रणाली पर बढ़ता दबाव। युद्ध होने पर आम आदमी रोज जीवित रहने के लिए संघर्ष करता है। ऐसा व्यक्ति जब अपने परिवार को एक वक्त का भोजन उपलब्ध नहीं करा पाता, तब उसके लिए युद्ध का राजनीतिक कारण बेमतलब और औचित्यहीन हो जाता है। उसके लिए जीवित रह पाना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती है।
समृद्ध प्राचीन सभ्यता के देश ईरान में युद्ध का मतलब केवल वर्तमान का ध्वंस नहीं है, वहां युद्ध का अर्थ स्मृतियों का विलाप भी है। ईरान के जो शहर हजारों वर्षों की स्मृतियां समेटे हैं, ईरान की जो संस्कृति वहां के लोगों के जीवन का हिस्सा है, युद्ध उन सब को खत्म कर सकता है। प्राचीन स्मृतियों से भरे किसी शहर पर जब बम से हमला होता है, तो सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं टूटते, मानवीय अस्तित्व भी ध्वस्त होता है।
किसी भी युद्ध का असर सबसे ज्यादा महिलाएं झेलती हैं। महिलाएं सिर्फ परिवार की जिम्मेदारी ही नहीं संभालतीं, अनेक बार युद्ध की हिंसा में नारी शरीर को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो मानवाधिकार हनन का निकृष्टतम उदाहरण है। जबकि युद्ध के पश्चात समाज के पुनर्गठन में इन महिलाओं की भूमिका ही सबसे महत्वपूर्ण होती है। नारी शक्ति, सहनशीलता और मानवता का एक अनुपम उदाहरण है। शरणार्थी संकट युद्ध की एक और निर्मम सच्चाई है। अपना देश, अपना घर छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने के लिए विवश होना एक बड़ी मानवीय त्रासदी है। ये शरणार्थी सिर्फ अपना भूगोल ही नहीं खोते, अपना परिचय, अपनी जड़ भी खो देते हैं। ऐसे असहाय लोगों का अपने पुरखों की जमीन पर सुरक्षित न रह पाना मानवता की पराजय ही है।
युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। इसके विपरीत, युद्ध नई समस्याएं ही पैदा करता है, नए तरीके से घृणा फैलाता है। इसलिए हमें युद्ध के बदले शांति का रास्ता खोजना चाहिए। कूटनीति, संवाद और सहानुभूति के रास्ते से ही ईरान में शांति और स्थिरता संभव है। ईरान का युद्ध इस सत्य से हमारा साक्षात्कार कराता है कि मनुष्य का जीवन किसी भी राजनीति से बड़ा है। एक बच्चे की मुस्कान, एक मां के जीवन में शांति, एक परिवार की सुरक्षा-यही असल चीज है। युद्ध ये सब कुछ छीन लेता है। इसलिए युद्ध के खिलाफ बोलने और खड़े होने का अर्थ मानवता के पक्ष में खड़ा होना है। -edit@amarujala.com