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आतंकवाद पर सख्त: भारत का रूख कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण, अब वैश्विक समुदाय के रवैये में भी बदलाव जरूरी

Wed, 02 Sep 2026 10:06 AM IST
न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: न्यूज डेस्क Updated Wed, 02 Sep 2026 10:06 AM IST
सार

शंघाई सहयोग संगठन के मंच से शहबाज शरीफ की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आतंकवाद के मामले को सख्ती से उठाना कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। क्षेत्रीय शांति और एससीओ की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आतंकवाद को लेकर अब वैश्विक समुदाय के रवैये में भी बदलाव आए।

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Tough on terrorism stance of India diplomatically significant now shift in global community attitude essential
एससीओ शिखर सम्मेलन में चीन-रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ पीएम मोदी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि आतंकवाद के मामले में दोहरे मानदंड की कोई जगह नहीं हो सकती, महज एक कड़ा राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के सामने रखी गई स्पष्ट कसौटी भी है। इसकी अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है कि यह बात उस मंच पर कही गई, जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी मौजूद थे।

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आतंकवाद की फंडिंग, आतंकियों की भर्ती, कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाली विचारधारा और उन्हें सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क-ये सभी उस इकोसिस्टम का हिस्सा हैं, जिसके बिना आतंकवादी हिंसा लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद को केवल किसी संगठन की हिंसक गतिविधियों तक सीमित करके देखने के बजाय उसके पूरे तंत्र को ध्वस्त करने की जरूरत बताई। यही प्रधानमंत्री के वक्तव्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
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लंबे समय से वैश्विक समुदाय आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता की बातें करता रहा है, पर व्यवहार में इसे लेकर देशों के रवैये में अंतर दिखाई देता है। यही दोहरापन आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को कमजोर करता है। प्रधानमंत्री का संदेश स्पष्ट है कि जो देश आतंकवाद को नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करते हैं या आतंकियों को पनाह व समर्थन देते हैं, उन्हें भी जवाबदेही के दायरे में लाना होगा। पाकिस्तान के संदर्भ में इस संदेश की स्वाभाविक रूप से अलग गूंज है।
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भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का सामना करता रहा है और वैश्विक मंचों पर इसके प्रायोजकों तथा नेटवर्क को बेनकाब करने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में, बिना किसी देश का नाम लिए आतंकवाद को अपने रणनीतिक हितों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत बताना कूटनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह सवाल एससीओ के लिए भी अहम है, जिसके सदस्य देशों का बड़ा हिस्सा ऐसे क्षेत्र में स्थित है, जहां आतंकवाद, कट्टरपंथ, अलगाववाद, मादक पदार्थों की तस्करी और अस्थिरता की चुनौतियां मंडरा रही हैं।


किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिए गए वक्तव्य की असल परीक्षा उसके बाद होने वाली सामूहिक कार्रवाई में होती है। ऐसे में, जरूरी है कि एससीओ सिर्फ औपचारिक घोषणाओं का मंच न बना रहे, बल्कि आतंकवाद के मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच सहयोग भी बढ़ाए। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में चुनौती उन देशों को कटघरे में खड़ा करने की है, जो राजनीतिक व रणनीतिक हितों के नाम पर इसे संरक्षण देते हैं। एससीओ को इससे ईमानदारी से निपटना होगा। यही एससीओ की विश्वसनीयता और क्षेत्र की स्थायी शांति की पहली शर्त भी है।

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