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निष्पक्षता की नसीहत: दोहरे मानदंड छोड़ें, संप्रभुता का सम्मान करें
Thu, 15 Oct 2026 07:06 AM IST
नितिन गौतम
अमर उजाला डेस्क, नई दिल्ली
अमर उजाला डेस्क, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 15 Oct 2026 07:06 AM IST
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विस्तार
संयुक्त राष्ट्र के हालिया सत्रों की कुछ अनावश्यक बयानबाजी के मद्देनजर भारत ने आधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र एवं उससे जुड़ी संस्थाओं को निष्पक्षता बरतने, बिना किसी दोहरे मापदंड के काम करने और देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से बचने की जो सलाह दी है, वह समयानुकूल होने के साथ वैश्विक संस्थाओं के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़े मानवाधिकार संगठन का रुख चुनिंदा देशों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित नजर आया है।एक तरफ जहां गंभीर मानवाधिकारों के हनन, आतंकवाद को पनाह देने वाले मुल्कों और तानाशाही व्यवस्थाओं पर वैश्विक संस्थाएं अक्सर चुप्पी साध लेती हैं या बेहद नरम रुख अपनाती हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत जैसे जीवंत और विशाल लोकतंत्र के आंतरिक मामलों पर अनावश्यक और असंतुलित टिप्पणियां करती हैं। चाहे नागरिकता कानून हो, आंतरिक सुरक्षा के उपाय हों या न्यायपालिका के फैसले, अंतरराष्ट्रीय मंचों से अक्सर ऐसी टिप्पणियां आती हैं, जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर होती हैं। भारत ने इसी दोहरे मानदंड पर गहरी आपत्ति जताई है।
जब आतंकवाद की बात आती है, तो वैश्विक परिभाषाएं बदल जाती हैं और जब किसी संप्रभु राष्ट्र में कानून-व्यवस्था की बात आती है, तो ‘मानवाधिकारों’ का चश्मा पहन लिया जाता है। यह रवैया वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता को गंभीर चोट पहुंचाता है। कुछ दिनों पहले दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने चिंता जताई थी, जिसे तत्काल भारत ने ‘अनावश्यक’ और देश के आंतरिक मामलों में ‘अस्वीकार्य हस्तक्षेप’ बताया था।
गौरतलब है कि पिछले दिनों फ्रांस में व्यापक हिंसक प्रदर्शन हुए, लेकिन इस कार्यालय ने कोई टिप्पणी करने की जरूरत नहीं समझी। इसको ही लक्ष्य करते हुए भारत ने कहा है कि मानवाधिकार उच्चायुक्त और उनके कार्यालय को राजनीतिकरण, अपनी सुविधानुसार मुद्दों के चयन और दोहरे मानदंडों से बचना चाहिए। भारत का यह तर्क भी वाजिब है कि मानवाधिकार की व्याख्या सार्वभौमिक होनी चाहिए और इसे लागू करते समय हर देश की सामाजिक, सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
ट्रंपकालीन दुनिया में संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाएं वैसे भी अपना असर छोड़ती नहीं दिख रही हैं। दरअसल, इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता बनाए रखने की है। हालांकि, इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि युद्धों से त्रस्त दुनिया को इन संस्थाओं की जरूरत नहीं। लेकिन, जब ये संस्थाएं व्यवहार में वैश्विक राजनीति के प्रभाव से मुक्त नहीं दिख रही हों, तब यह उनकी नैतिक शक्ति और विश्वसनीयता को कमजोर ही करता है।