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Union Budget: निम्न वर्ग की क्रयशक्ति बढ़ानी होगी, बेरोजगारी इसमें बड़ी चुनौती
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बजट से क्या हैं उम्मीदें
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
कल केंद्रीय बजट की घोषणा की जाएगी, जिसके बारे में उद्योगों से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और आम आदमी की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। बृहस्पतिवार को संसद में वित्त मंत्री ने जो आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया, उसमें सरकार की सोच में कुछ विरोधाभास दिखा। एक तरफ हम स्वदेशी की बात करते हैं, दूसरी तरफ विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ा रहे हैं और उत्पादों पर शुल्कों में कटौती भी कर रहे हैं। जैसे कि शिक्षा के क्षेत्र में हम कह रहे हैं कि हमें भारतीय प्रतिभा को गैर-औपनिवेशिक (डी-कॉलोनाइज) बनाना है, दूसरी तरफ हम विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित कर रहे हैं। लेकिन यदि विदेशी विश्वविद्यालय आएंगे, तो वह भारतीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा तो नहीं देंगे। इसलिए मेरा मानना है कि सरकार को बजट में अपनी आर्थिक नीति बिल्कुल स्पष्ट करनी चाहिए।सरकार बार-बार यह दावा कर रही है कि हमारी अर्थव्यवस्था के लिए यह स्वर्णिम अवसर है। मुद्रास्फीति भी नियंत्रण में है, जीडीपी विकास दर भी बेहतर है और राजकोषीय घाटे की स्थिति भी अच्छी है। सरकार का यह भी दावा है कि जो थोड़ी-सी मुश्किलें हैं, वे वैश्विक अनिश्चितता और ट्रंप के टैरिफ की वजह से हैं, अन्यथा हम तेजी से विकास के पथ पर अग्रसर हैं। पर मेरा मानना है कि हमारी अर्थव्यवस्था के समक्ष जो सबसे बड़ी चुनौती है, वह है बेरोजगारी। हमारे देश के युवाओं में और महिलाओं में बेरोजगारी की समस्या विकराल है। इससे निपटना बेहद जरूरी है, अन्यथा अर्थव्यवस्था पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि बेरोजगारी से ही गरीबी पैदा होती है।
इसलिए हमें अपने बजट की दिशा को बदलना होगा। अब तक हम ज्यादा से ज्यादा पूंजी गहन क्षेत्र (कैपिटल इंटेंसिव सेक्टर) को बढ़ावा देते रहे हैं, जिसमें पूंजी का इस्तेमाल ज्यादा होता है, जबकि हमें श्रम गहन क्षेत्रों (लेबर इंटेंसिव सेक्टर) को बढ़ावा देना चाहिए। इससे रोजगार सृजन होगा और बेरोजगारी से निपटने में मदद मिलेगी। रोजगार बढ़ने से गरीबी कम होगी और मांग बढ़ेगी, जिससे उत्पादन भी बढ़ेगा। सरकार बार-बार शिकायत कर रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश तो बढ़ रहा है, लेकिन निजी क्षेत्र का निवेश नहीं बढ़ रहा है, जबकि निजी क्षेत्र का कहना है कि मांग कम है, इसलिए हम निवेश नहीं कर पा रहे हैं।
मगर मांग तो तभी बढ़ेगी, जब निम्न आय वर्ग के लोगों के हाथ में पैसा होगा। यदि हम मध्य आय वर्ग या उच्च आय वर्ग की आय में बढ़ोतरी करेंगे, तो उससे मांग नहीं बढ़ेगी, क्योंकि उसको जो खर्च करना है, वह तो पहले से कर ही रहा है, वह अतिरिक्त खर्च नहीं करेगा। लेकिन निम्न आय वर्ग की आय बढ़ेगी, तो वह अतिरिक्त खर्च करेगा, जिससे मांग बढ़ेगी। मांग बढ़ाने का सबसे उत्तम तरीका है कि निम्न आय वर्ग की क्रयशक्ति को बढ़ावा दें। इसका मतलब है कि आय असमानता को कम करना हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।
हो यह रहा है कि हम जिस भी आर्थिक सुधार की बात करते हैं, वह आय असमानता बढ़ाने वाला है। उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष बजट में आयकर में रियायत की घोषणा की गई। हमारे देश में करीब नौ करोड़ लोग आयकर रिटर्न भरते हैं, उसमें से भी पांच करोड़ लोग शून्य कर रिटर्न भरते हैं, यानी तीन-चार करोड़ लोग ही हैं, जो प्रभावी कर रिटर्न भरते हैं। इस तरह से 150 करोड़ की आबादी में डेढ़ प्रतिशत लोग ही आयकर देते हैं। इसलिए हमारी जो आर्थिक नीतियां हैं, उनमें बदलाव लाना जरूरी है। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की आमदनी बढ़ाने से हमारी समस्या कम हो सकती है। अब जैसे कि हम मुक्त व्यापार समझौते कर रहे हैं, इसमें अगर हम कृषि क्षेत्र को भी शामिल कर देंगे, तो उससे कृषि क्षेत्र का संकट और बढ़ जाएगा, क्योंकि किसान पहले ही कह रहे हैं कि उन्हें उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिलता है। इसलिए हमें बजट में ऐसी नीतियों की घोषणा करनी चाहिए, जिससे निम्न आय वर्ग के लोगों की आमदनी बढ़े और रोजगार के अवसर पैदा हों। इसके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश बढ़ाना जरूरी है। हमारे देश में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बजट आवंटन अब भी अपेक्षाकृत काफी कम है। जीएसटी में सुधार करके असंगठित क्षेत्र की इनपुट क्रेडिट की समस्या को दूर भी करना होगा। ये सब करने से हमारी अर्थव्यवस्था सुचारू रूप से चलने लगेगी।
जहां तक घाटा कम करने की बात है, तो यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। इसे कम करने के दो तरीके होते हैं-या तो अपने संसाधन बढ़ा दें या अपने खर्च को घटा दें। लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि जिन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की संभावना है, उसमें खर्च न घटाएं, नहीं तो बेरोजगारी बढ़ेगी। हमें अपने बजट की प्राथमिकता तय करनी पड़ेगी और पूंजी गहन क्षेत्रों के बजाय रोजगार गहन क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी होगी। पहले बड़े-बड़े हाईवे, रेल प्रोजेक्ट में बहुत-से लोगों को रोजगार मिलता था, लेकिन अब वहां ज्यादा पूंजी का इस्तेमाल होता है और मानव श्रम के बदले बड़ी-बड़ी मशीनों से ही काम अधिक होता है। इसलिए हमें ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि क्षेत्र की तरफ ज्यादा ध्यान देना होगा। एमएसएमई क्षेत्र भी रोजगार मुहैया कराता है, लेकिन इसमें हमें छोटे एवं सूक्ष्म उद्यमों को मंझोले उद्यमों से अलग करना चाहिए। छोटे एवं सूक्ष्म उद्यमों के लिए वित्त, प्रौद्योगिकी एवं बाजार उपलब्ध कराने के लिए हमें बजट में विशेष प्रावधान करने चाहिए, अन्यथा सारा लाभ मंझोले उद्यम उठा ले जाते हैं। छोटे और मंझोले किसानों की संख्या देश में करीब 85 फीसदी है। अगर बजट में उनकी तरफ ध्यान दिया जाएगा, तो उनकी आमदनी बढ़ेगी और नतीजतन मांग में भी वृद्धि होगी। इसके लिए कृषि क्षेत्र में अनुसंधान पर जोर देना जरूरी है, ताकि खेती को और ज्यादा लाभप्रद बनाया जा सके। उद्योग के क्षेत्र में भी हमें अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर जोर देना होगा। हम चीन पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गए हैं, जिससे निम्न तकनीक भी आयात करते हैं और उच्च तकनीक भी।
आरएंडडी में निवेश के लिए सार्वजनिक एवं निजी, दोनों क्षेत्रों को प्रोत्साहित करना होगा। बिना अनुसंधान एवं विकास के हम आत्मनिर्भर नहीं हो सकते। आयात करके आत्मनिर्भरता नहीं आ सकती। दूसरे देशों पर निर्भरता बढ़ने से सामरिक स्वायत्तता कमजोर होती है। आरएंडडी में निवेश नहीं करने के कारण प्रौद्योगिकी में हम पिछड़ गए हैं, जिसके चलते हमें चीन, रूस और अमेरिका से आयात करना पड़ता है।
