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दुनिया: पश्चिमी गठबंधन के दरकते तटबंध, ट्रंप की कथनी और करनी से उठे कई सवाल
रहीस सिंह, वैदेशिक मामलों के जानकार
Published by: पवन पांडेय
Updated Wed, 28 Jan 2026 07:17 AM IST
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पश्चिमी गठबंधन के दरकते तटबंध
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विस्तार
दावोस में वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) के मंच पर भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी परंपरागत शैली में ही दिखे। उन्होंने जो कहा, अब वह ‘वेनेजुएला एक्शन’ के बाद पूरी तरह से हास्यास्पद नहीं रह गया। अगर दुनिया इस पर नासमझी दिखाए, तो यह इतिहास का दोष है। इसके साथ ही वह इतिहास में अमेरिका को देखते और यह कहते हुए आगे बढ़े कि अमेरिका कितना मूर्ख था, जो ग्रीनलैंड जीतकर डेनमार्क को सौंप दिया था। फिर उन्होंने चेतावनी दी और कहा कि ‘ग्रीनलैंड हमें दे दो।’ अब अगर यूरोप ‘ना’ कहता है, तो अमेरिका इसे याद रखेगा। इस याद रखने का अर्थ क्या है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।ट्रंप यह कहते हुए भी दिखे कि अगर मैं चाहूं, तो बहुत ज्यादा ताकत और सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर सकता हूं, तब हमें कोई रोक नहीं पाएगा। पर मैं बल प्रयोग नहीं करूंगा। तो क्या डोनाल्ड ट्रंप ‘नियम आधारित व्यवस्था’ के समाप्त हो जाने का संकेत दे रहे हैं? क्या अब भी यूरोप सहित पूरी दुनिया अमेरिकी नीतियों को ‘शांति’ का सारथी मानते हुए प्रशंसा करती रहेगी? एक प्रश्न और। क्या हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि आर्कटिक क्षेत्र अब वैज्ञानिक से भू-रणनीतिक क्षेत्र और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का नया थिएटर बन चुका है? यदि हां, तो इस भू-रणनीतिक बिंदु, जो कि उत्तरी अटलांटिक, उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच का सेतु है, से ही नए युद्ध अथवा विश्वयुद्ध की राह बनेगी?
ट्रंप की धमकियां संभवतः सोए हुए यूरोप को जगाने का काम करने लगी हैं। वह नींद से बाहर आएगा या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन अगर यूरोपीय देश अभी भी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहे हैं कि अमेरिका नियम आधारित व्यवस्था को ध्वंस कर रहा है, तो शायद इतिहास उन्हें कभी क्षमा न कर पाए। हाल के उदाहरण ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि व्हाइट हाउस के सामने डटे रहने वाले देशों के सामने ट्रंप की सनक घुटने टेकने पर विवश हुई। चीन और ब्राजील इसके उदाहरण हैं। वहीं, जो देश ट्रंप के सामने झुक गए, उन्हें और झुकाने व अपमानित करने का कोई अवसर वह नहीं छोड़ रहे।
इसलिए, न केवल यूरोप को, बल्कि पूरी दुनिया को इस विषय पर गंभीर होना चाहिए कि ग्रीनलैंड का प्रश्न केवल डेनमार्क के एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न क्षेत्रीय अखंडता व आत्मनिर्णय के अधिकार का है। यह प्रश्न अंतरराष्ट्रीय कानूनों की आत्मा में बसे सिद्धांतों का भी है। यूरोप को तो इसलिए गंभीर और संवेदनशील होने की जरूरत है, क्योंकि ट्रंप की सनक अब यूरोपीय संघ, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन के बचे-खुचे ढांचे को ध्वस्त करने की दिशा में बढ़ रही है। यूरोप को समझना होगा कि पूरी दुनिया इस घटनाक्रम को देख रही है, इसलिए वह एक दिन यह निष्कर्ष अवश्य निकालेगी कि इस नए और क्रूर वैश्विक परिवेश में यूरोपीय संघ जीवित रहने में सक्षम है या नहीं?
यूरोप को यह सोचने की जरूरत है कि ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र का ऐसा भू-रणनीतिक क्षेत्र है, जिस पर अमेरिका की ही नहीं, बल्कि चीन की भी गिद्ध दृष्टि है। इसलिए, ग्रीनलैंड पर यूरोप का अमेरिका के सामने झुकना या न झुकना बीजिंग के लिए एक रणनीतिक प्रयोग की तरह होगा। यदि यूरोप पीछे हट जाता है, तो चीन यह निष्कर्ष निकालने में देरी नहीं करेगा कि क्षेत्रीय अखंडता व आत्मनिर्णय, अब एक औपचारिक शब्दावली भर हैं, कोई बाध्यकारी नियम नहीं। दूसरे शब्दों में कहें, तो ग्रीनलैंड पर यूरोप का रुख ही तय करेगा कि भविष्य में दुनिया नियमों से चलेगी या दबदबे से? यदि नियम टूटते हैं, तो आज वे आर्कटिक में टूटेंगे, कल दक्षिण चीन सागर में और फिर शायद हिंद महासागर में। वैसे चीन तो पहले ही ‘पोलर सिल्क रोड’ के जरिये अपने आपको ‘नियर आर्कटिक स्टेट’ तक बता चुका है। ऐसे में, यदि यूरोप कमजोर पड़ता है, तो चीन आर्कटिक में स्थायी आर्थिक रणनीतिक उपस्थिति बना सकता है।
उल्लेखनीय है कि चीनी ‘पोलर सिल्क रोड’ उसके ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) का आर्कटिक संस्करण है, जिसका उल्लेख उसने ‘चीनी आर्कटिक नीति श्वेत पत्र 2018’ में किया था। यहां यह प्रश्न भी उभरकर आता है कि कहीं इसी का भय दिखाकर तो ट्रंप यूरोप को दबाव में नहीं लेना चाहते हैं? या फिर वह अपनी धमकियों के जरिये चीन के लिए एक अवसर तो निर्मित नहीं कर रहे? वैसे ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन अब पतन के सबसे निचले बिंदु तक पहुंच चुका है, इतना कि किसी दिन बिखर भी सकता है। आज अमेरिका नाटो के सदस्य डेनमार्क से उसका एक भू-भाग छीनने का प्रयास कर रहा है और यूरोप अलर्ट मोड पर है। यूरोपीय देश ग्रीनलैंड में सेनाएं भेजकर आर्कटिक सुरक्षा के नाम पर अपनी प्रतिक्रिया भी दे चुके हैं।
ट्रंप भले ही इसे यूरोपीय देशों, विशेषकर फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन का ‘अत्यंत खतरनाक खेल’ बता रहे हों, पर यह ट्रांस-अटलांटिक में आती हुई दरार का दृश्यांकन है। शह और मात का जो खेल अभी तक झुकने और उठने तक ही सीमित था, अब परिणाम के निकट पहुंच चुका है। अब देखना है कि यूरोपीय देश इसे स्वीकार कर ‘प्रेज डिप्लोमेसी’ (प्रशंसा की कूटनीतिक) की परंपरा का अनुसरण करेंगे या फिर तन कर खड़े हो जाएंगे? या प्रतीक्षा करेंगे कि ट्रंप केवल धमकियों तक ही सीमित रहेंगे या फिर जवाबी कार्रवाई होगी? पश्चिमी गठबंधन, जिसमें नाटो भी शामिल है, पूरी तरह से विघटित होगा या पुनर्निर्मित? इस पर अभी कुछ कहना मुश्किल है। हालांकि, ट्रंप ग्रीनलैंड पर अपने दबाव को बढ़ा रहे हैं। वह कह रहे हैं कि अमेरिका अटलांटिक फाइव के सामूहिक सुरक्षा समझौते से बंधा नहीं है। फिर तो, पश्चिमी गठबंधन के बिखरने की आशंका ज्यादा है। तो क्या अमेरिकी व यूरोपीय सेनाएं ग्रीनलैंड पर आमने-सामने खड़ी हो सकती हैं? देखना होगा कि कौन पहले पीछे हटेगा या आगे बढ़ेगा?
दरअसल, पश्चिमी गठबंधन एक विचार भर नहीं, एक ढांचागत व्यवस्था है, जो सुरक्षा (यानी नाटो), राजनीतिक मूल्यों, आर्थिक साझेदारी और वैचारिक ढांचे (विशेषकर उदार लोकतंत्र) व नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जैसे स्तंभों पर खड़ी है। सुरक्षा पर एकजुटता इनकी विवशता है, पर वह ऊपरी सतहों पर भी अब पुख्ता नहीं दिख रही, अंदर से तो खोखली हो ही चुकी है। लोकतंत्र पश्चिमी जगत में भी उदारता का परिचय नहीं दे पा रहा, बल्कि वह संघर्षरत दिखाई दे रहा है और वैचारिक सहमति दरक चुकी है। असल समस्या यहीं से शुरू होती है। अब देखना यह है कि ईयू अपनी ताकत के भरोसे तन के खड़ा होगा या अभी भी व्हाइट हाउस या पेंटागन की ओर देखेगा? सब कुछ इसी पर निर्भर होगा। बहरहाल जो भी हो, दोनों ही स्थितियां एक इतिहास अवश्य लिखेंगी। -edit@amarujala.com
