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मुद्दा: आखिर इस मर्ज की दवा क्या है, सामूहिक प्रयास से ही निकलेगी राह

विजय त्रिपाठी Published by: पवन पांडेय Updated Wed, 28 Jan 2026 07:26 AM IST
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सार
आवारा कुत्तों की समस्या अब गली-मोहल्ले से निकलकर संसद व सुप्रीम कोर्ट तक आ पहुंची है। सरकार और समाज के सामूहिक प्रयासों से ही सड़कों पर आक्रामक आवारा कुत्तों की गंभीर समस्या से निपटा जा सकता है।
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What is the cure for this disease? Only collective efforts will provide a solution
आखिर इस मर्ज की दवा क्या है? - फोटो : अमर उजाला

विस्तार
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पुराने लखनऊ निवासी रामचरन घर से निकलकर चौराहे के मोड़ तक पहुंचे ही थे कि कुत्तों का झुंड उनके पीछे लपका। रामचरन आज असमंजस में थे। पीढ़ियों से उनका परिवार कुकुर, गैया, चिरैया के भरण-पोषण की चिंता करते आ रहा है, अब सुप्रीम कोर्ट का यह दो टूक फरमान उनकी आंखों के सामने तैर गया कि अगर कुत्तों से ज्यादा मोहब्बत है, तो अपने घर में रखो, खबरदार जो सड़क या चौराहे पर खाना-पीना दिया तो। अब उन्हें फिक्र हो रही है कि आगे से कहीं गाय-कुत्ता को रोटी (अग्राशन) खिलाने उन्हें कांजी हाउस या कुत्तों की जेल न जाना पड़े।


वहीं, तेलंगाना के याचाराम गांव में करीब सौ कुत्तों को जहर देकर मार दिया गया। एक पखवाड़े के भीतर राज्य में करीब 500 आवारा कुत्तों को मारा जा चुका है। स्ट्रे एनिमल फाउंडेशन ऑफ इंडिया से जुड़े एक कार्यकर्ता ने थाने में रिपोर्ट लिखाई है। इससे पहले हनमकोंडा व कामारेड्डी जिले में सैकड़ों बेजुबानों को मार दिया गया था। पांच सरपंचों पर पुलिस ने मामला दर्ज किया है।


भारतीय संस्कृति प्राणिमात्र के कल्याण की बात करती है, पर अब मनुष्य-श्वान के सह अस्तित्व पर संकट है। जन सुरक्षा (अनुच्छेद 21) और जीव कल्याण के बीच बना संतुलन डगमगा रहा है। आवारा कुत्तों की समस्या अब गली-मोहल्ले से निकलकर संसद व सुप्रीम कोर्ट तक आ पहुंची है। यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों से कटखने कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आक्रामक आवारा कुत्तों को आश्रय स्थलों में रखने का निर्देश दिया था। साथ ही, गली-मोहल्लों में कुत्तों को सड़क पर भोजन देने पर रोक की हिदायत दी थी, मगर पशु प्रेमियों को यह फैसला रास न आया और फिर यह मसला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। आवारा कुत्तों के खिलाफ एकजुट संगठनों की दलील है कि घर-दफ्तर-दुकान से बाहर कुत्तों से कोई भी सुरक्षित नहीं है। पशु कल्याण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि देश में रोज करीब दस हजार लोगों को लावारिस कुत्ते काट लेते हैं। अपने देश में रेबीज की दर दुनिया भर में सबसे ज्यादा है। केंद्रीय पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की तरफ से पिछले साल जारी आंकड़ों पर गौर करें, तो वर्ष 2022 में कुत्तों के काटने के करीब 22 लाख मामले, 2023 में 27.5 लाख, 2024 में 37 लाख मामले दर्ज हुए।

केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर कुत्तों के आबादी नियंत्रण के कार्यक्रम बेकार साबित हुए हैं। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट को राज्यों को भारी मुआवजा के लिए कहना पड़ा। एक पक्ष की जिद है कि सारे आवारा कुत्तों को पकड़कर बाड़े में बंद कर दिया जाए, जबकि दूसरे पक्ष की दलील है कि यह अमानवीय है। ऐसे में, इस पर पूरी संजीदगी और संवेदनशीलता से विचार की जरूरत है कि सरकार व समाज से सामूहिक प्रयासों से ही इस समस्या से निपटा जा सकता है। कमी एक ऐसी नीति की है, जिसमें दोनों की सुरक्षा की व्यवस्था हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निजात पाने का सरल व प्रभावी उपाय आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करना है। इसके लिए विभिन्न राज्यों में टीकाकरण के जरिये कुत्तों का बंध्याकरण करने का कार्यक्रम शुरू किया गया था, पर प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही और इच्छाशक्ति के अभाव में यह मुहिम कागजों पर ही दम तोड़ती नजर आ रही है। अपर्याप्त पशु कल्याण बुनियादी ढांचा इस समस्या का मूल कारण है। यही वजह है कि आवारा कुत्तों की संख्या और इन्सानों को काटने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। अदालत ने सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे महत्वपूर्ण स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाकर, पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियम, 2023 के तहत नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें निर्दिष्ट आश्रय स्थल भेजें। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है।

बड़े पैमाने पर नसबंदी का अभियान नगर निकायों, पशु अस्पतालों और पशुप्रेमी संगठनों की सक्रिय भूमिका के बगैर संभव नहीं है। कुछ लोग व्यावहारिक समाधान सुझाते हैं कि आवारा कुत्तों की नसबंदी-टीकाकरण के बाद उन्हें उनके पुराने ठिकाने पर छोड़ दिया जाए। इसमें मानवीय दृष्टि रखने वाले पशुप्रेमी संगठनों का भी यह दायित्व है कि वे ऐसे आवारा कुत्तों को गोद लें। इसे बढ़ावा देने के लिए सरकार विदेशी नस्ल के कुत्तों की आमद पर रोक लगाए या सीमित छूट दे।

नियमन-नियंत्रण का विरोध कर रहे पशु अधिकारों के पैरवीकारों का तर्क है कि कुत्तों को जंगलों से अपने स्वार्थ के लिए लाया कौन-आदमी, उनसे चौकीदारी कराया कौन-आदमी, उनसे अपनी भेड़-बकरियां चरवाया कौन-आदमी...अब वे हमारे लिए अवांछित हो गए हैं (नस्ल आधारित) और उन्हें अब जंगल या बाड़े का रास्ता दिखाया जा रहा है। क्या यही रास्ता है, क्या मौजूदा जंगल या बाड़े काफी होंगे उन्हें संभालने के लिए...शायद नहीं, हमें तो यह गिनती तक नहीं पता कि देश भर में ऐसे आवारा कुत्ते हैं कितने। फिर रास्ता क्या है...यही रास्ता हमें तलाशना है। इस पंचायत में पुराने लखनऊ के रामचरन की बात भी सुनी जाएगी और तेलंगाना के याचाराम गांव के लोगों की भी। फॉर्मूला इसी रास्ते से निकलेगा।
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