उत्तराखंड में हिमनद झीलों की होगी निगरानी: भोटेकोशी की घटना के बाद अलर्ट, लगाए जाएंगे अर्ली वार्निंग सिस्टम
हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगने के बाद वे कितना सटीक और कारगर हैं, पता चल सकेगा। पर इसके साथ जरूरी है कि नदी के 200 मीटर तक फ्लड प्लेन एरिया में लोग न बसें।
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भोटेकोशी की घटना के बाद अर्ली वार्निंग सिस्टम को लेकर चर्चा तेज हो गई है। वैज्ञानिकों भी अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत बता रहे हैं, पर नदी के किनारे बसावट न हो, इस पर अधिक ध्यान देने की सलाह भी दे रहे हैं। इससे लोगों की सुरक्षा हो सकेगी। वहीं, केदारनाथ, चमोली, धराली और अब नेपाल के भोटेकोशी में आई आपदा के अलग-अलग कारण थे। पर इन घटनाओं में संकरी घाटी, तीव्र ढलान के साथ ही तेज बहाव के साथ पानी, मलबा बोल्डर आने की बात एक जैसी रही है, जिसने कुछ समय में ही भारी तबाही मचा दी।
उत्तराखंड में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की हो रही कवायद
राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) ने देश में 28043 हिमनद झीलों को चिह्नित किया है। इन झीलों की निगरानी का काम भी एनआरएससी करता है। इसके अलावा एनडीएमए और राज्य के विभाग भी हिमनद झीलों के जोखिम को कम करने के लिए कोशिश कर रहा है। वहीं, उत्तराखंड की बात करें तो यहां पर बेहद संवेदनशील चार झीलों का अध्ययन हो चुका है, अब यहां पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की बात हो रही है। यह कार्य वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान को सौंपा गया है। पर इसके लिए सबसे सबसे बड़ी चुनौती सैटेलाइट कम्युनिकेशन की है। संस्थान के निदेशक विनीत गहलौत बताते हैं कि इस पहलू पर विचार किया जा रहा है।
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ
वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ.मनीष मेहता बताते हैं कि हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगने के बाद वे कितना सटीक और कारगर हैं, पता चल सकेगा। पर इसके साथ जरूरी है कि नदी के 200 मीटर तक फ्लड प्लेन एरिया में लोग न बसें। इससे काफी हद तक जानमाल के नुकसान को कम किया जा सकता है। संस्थान के ही डॉ.पंकज चौहान कहते हैं कि प्राकृतिक आपदा में बचाव के लिए बहुत कम समय मिलता है। अर्ली वार्निंग सिस्टम को लगाया जाए पर उसके साथ ही नदी के किनारे लोगों को बसावट न हो। इसके लिए जागरूकता जरूरी है। एनडीएमए के सदस्य डॉ.दिनेश असवाल बताते हैं कि हिमनद झीलों की मॉनिटरिंग का काम सैटेलाइट के माध्यम से होता है।
घटनाओं में एक जैसा ही पैटर्न
वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ.पंकज चौहान बताते हैं कि हिमनद झील के टूटने से केदारनाथ (2013), ग्लेशियर और रॉक टूटने से चमोली (2021) में आपदा आई थी। पिछले वर्ष धराली (2025) में पानी मलबा ऊंचाई से आया था, जिससे तबाही मची थी। अब नेपाल में घटना हुई। अगर इन घटनाओं को देखें तो एक पैटर्न कॉमन रहा है। संकरी घाटी, तेज ढलान होने के कारण पानी के साथ मलबा-बोल्डर से तेजी से नीचे की तरफ आए। इसके साथ उन्होंने रास्ते में और चट्टानों को काटते गए। इसके साथ मलबा बढ़ता गया और उसने डाउन स्ट्रीम में भारी तबाही हुई।
तापमान में बढ़ोतरी, जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पिघल रहे
ग्लेशियर पिघल रहे, इससे हिमालयी क्षेत्र में नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलें बड़ी हो रही हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अनुसार 2016-2017 के दौरान पहचानी गई 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 झीलों में से 676 झीलें हैं, उनका आकार 1984 के बाद से बढ़ा है। इसमें 601 झीलों का आकार अपने मूल आकार से दोगुना से अधिक बढ़ा है। 10 झीलें डेढ़ से दो गुना बढ़ी और 65 झीलों का आकार डेढ़ गुना बढ़ा है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक मनीष मेहता बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन और न्यूनतम तापमान में बढ़ोतरी के चलते ग्लेशियर पिघलने के साथ पीछे की तरफ जा रहे हैं। इससे हिमनद झीलें बन रही हैं या जो हैं उनके आकार में बढ़ोतरी हो रही है। इसके अलावा अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश हो रही है।