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AIIMS Rishikesh Study: दून के गांवों में नहीं मिल रही सुकून की नींद, महिलाओं में बढ़ा हाई ब्लड प्रेशर का खतरा

Mon, 24 Aug 2026 07:36 AM IST
Renu Saklani आफताब अजमत,अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
आफताब अजमत,अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Mon, 24 Aug 2026 07:36 AM IST
सार

गांवों की शांत फिजा और खुला वातावरण भी अब लोगों को चैन की नींद नहीं दे पा रहा है। एम्स ऋषिकेश के एक अध्ययन में ग्रामीण आबादी में नींद से जुड़ी समस्या और हाई ब्लड प्रेशर के बीच चिंताजनक संबंध सामने आया है। खासतौर पर महिलाओं में इसका असर अधिक देखा गया है।

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Sleep Problems Increase High Blood Pressure Risk Among Women in Rural Dehradun AIIMS Rishikesh Study
एम्स ऋषिकेश - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड के गांवों अब सुकून की नींद नहीं मिल रही। एम्स ऋषिकेश के चिकित्सकों के शोध में यह चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में नींद न आने के कारण महिलाओं में विशेषकर हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) का खतरा बढ़ रहा है।

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एम्स ऋषिकेश के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की डॉ. वर्तिका सक्सेना, डॉ. रोहित कत्रे और डॉ. पल्लवी सिंह का यह शोध पत्र हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल डिस्कवर पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। देहरादून के डोईवाला ब्लॉक के 30 गांवों में किए गए इस व्यापक क्रॉस-सेक्शनल सर्वे में 1,946 प्रतिभागियों को शामिल किया गया।

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अध्ययन में सामने आया कि ग्रामीण इलाकों में कुल 38.5 प्रतिशत लोग हाइपरटेंशन से पीड़ित हैं, जो राष्ट्रीय ग्रामीण औसत से काफी अधिक है। जेंडर-आधारित विश्लेषण से पता चला कि हाई बीपी से पीड़ित महिलाओं में खराब नींद की गुणवत्ता का शिकार होने की दर सबसे अधिक 55.1 प्रतिशत दर्ज की गई। जबकि पीड़ित पुरुषों में यह आंकड़ा 39.2 प्रतिशत था। विभिन्न स्तर पर विश्लेषण के बाद यह साबित हुआ कि अन्य जोखिम कारकों (जैसे उम्र, वजन, खानपान) को हटाने के बाद भी खराब नींद महिलाओं में हाइपरटेंशन का एक स्वतंत्र कारक है।

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महिलाओं पर क्यों पड़ रहा है ज्यादा असर

विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं में नींद और ब्लड प्रेशर के बीच के इस गहरे संबंध के पीछे कई जैविक और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं। महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का रक्त वाहिकाओं पर सुरक्षात्मक असर होता है लेकिन मेनोपॉज (मासिक धर्म बंद होने) के बाद नींद में खलल पड़ने पर यह सुरक्षा कवच कमजोर हो जाता है और ऑटोनॉमिक डिस्ग्यूलेशन का खतरा बढ़ जाता है। नींद की कमी के कारण महिलाओं का शरीर हाइपोथैलेमिक-पिट्यूटरी-एड्रेनल (एचपीए) एक्सिस के जरिये ज्यादा मात्रा में कोर्टिसोल हॉर्मोन रिलीज करता है, जिससे दिल की धड़कन और रक्तचाप दोनों में तेजी से वृद्धि होती है। पारिवारिक जिम्मेदारियों और अन्य कारणों से महिलाओं में एंजाइटी (चिंता) से जुड़ी नींद की समस्याएं अधिक होती हैं, जो सीधे तौर पर रात में ब्लड प्रेशर को सामान्य नहीं होने देती।

ग्रामीण जीवन का आम हिस्सा बना तनाव

अध्ययन में यह भी गौर करने वाली बात सामने आई कि पर्सीव्ड स्ट्रेस स्केल (पीएसएस-10) के जरिये मापे गए मानसिक तनाव का सीधे तौर पर हाइपरटेंशन से कोई अलग प्रभाव नहीं दिखा क्योंकि ग्रामीण समुदाय के लगभग 79.7 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में मध्यम से उच्च तनाव का सामना कर रहे हैं। यानी तनाव ग्रामीण जीवन का एक आम हिस्सा बन चुका है लेकिन नींद की गुणवत्ता में गिरावट सीधे तौर पर दिल की सेहत को भारी नुकसान पहुंचा रही है। इसके अलावा, अधिक वजन या मोटापा, बढ़ती उम्र, शराब का सेवन और ब्लड शुगर का असंतुलन भी हाई बीपी के बड़े कारण पाए गए।

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नींद की गुणवत्ता की जांच भी हो अनिवार्य

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-संचारी रोगों की स्क्रीनिंग के दौरान अब डॉक्टरों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर के साथ-साथ नींद की गुणवत्ता की जांच को भी अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए। जीवनशैली में सुधार, समय पर सोने की आदत, उत्तेजक पदार्थों से परहेज और महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देकर इस साइलेंट किलर(हाइपरटेंशन) के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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