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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   AIIMS initiates the use of Femto-Care technology to reshape the cornea a first.

Delhi NCR News: एम्स में पहली बार फेम्टो-केयर तकनीक से कॉर्निया का आकार सुधारने की पहल

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 21 Oct 2026 07:31 PM IST
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-केराटोकोनस के चुनिंदा मरीजों को मिल सकती है बेहतर नजर, लेजर से कॉर्निया को सही आकार देने में मिलेगी मदद
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। कॉर्निया के पतले होने और उसके आकार में बदलाव के कारण धुंधला दिखाई देने की समस्या से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत की उम्मीद जगी है। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पहली बार फेम्टो-केयर प्रक्रिया की मदद से कॉर्निया की बनावट में सुधार करने की पहल की गई है। इस तकनीक का इस्तेमाल केराटोकोनस से पीड़ित चुनिंदा मरीजों के इलाज में किया गया है।
इस पहल में डॉ. सूसन जैकब, डॉ. वनाथी मुरुगेसन, डॉ. हेमंत झाझरिया, डॉ. बृजेश कुमार, डॉ. राजन मिगलानी और उनकी टीम की अहम भूमिका रही। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रक्रिया उपयुक्त मरीजों में कॉर्निया के आकार को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। समय पर जांच और उचित उपचार से केराटोकोनस के मरीजों की दृष्टि को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
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क्या है केराटोकोनस?
कॉर्निया आंख के सामने मौजूद पारदर्शी परत है, जो रोशनी को आंख के भीतर पहुंचाने और स्पष्ट देखने में अहम भूमिका निभाती है। केराटोकोनस की स्थिति में कॉर्निया धीरे-धीरे पतला होने लगता है और शंकु जैसी आकृति ले लेता है। इससे नजर धुंधली हो सकती है, चीजें विकृत दिखाई दे सकती हैं और चश्मे का नंबर बार-बार बदल सकता है। समय के साथ यह समस्या देखने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
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लेजर से बनाई जाती है सटीक जगह
इस प्रक्रिया में फेम्टोसेकंड लेजर की मदद से कॉर्निया की परतों के बीच सटीक जगह बनाई जाती है। इसके बाद दान में मिले मानव कॉर्निया के ऊतक से तैयार विशेष रिंग सेगमेंट को इस जगह पर लगाया जाता है। इसका उद्देश्य कॉर्निया की असामान्य वक्रता को सुधारना और उसकी बनावट को बेहतर करना है। हालांकि, इससे मिलने वाला लाभ मरीज की आंखों की स्थिति और बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है।

जांच के बाद ही इलाज का फैसला
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है। इलाज से पहले कॉर्निया की मोटाई, आकार और आंखों की समग्र स्थिति की विस्तृत जांच जरूरी है। इसके बाद ही तय किया जाता है कि मरीज को इस तकनीक से लाभ मिल सकता है या नहीं।
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