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समाधान : दिल्ली को ओजोन के खतरे से निकालने की राह तलाशेगा सीपीसीबी, साल भर तक चलेगा अध्ययन

नितिन राजपूत, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 25 Dec 2024 03:14 AM IST
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सार

ओजोन प्रदूषण की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए बोर्ड एक साल तक अध्ययन करेगा। इसमें स्थानीय के साथ राजधानी के बाहर के स्रोतों का आकलन होगा। इससे ओजोन का स्तर बढ़ाने के कारकों का पता चल सकेगा।

CPCB will find a way to remove Delhi from the threat of ozone
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : एएनआई
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विस्तार

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने ओजोन के बढ़ते खतरे से दिल्ली वालों को बचाने के लिए पहल की है। ओजोन प्रदूषण की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए बोर्ड एक साल तक अध्ययन करेगा। इसमें स्थानीय के साथ राजधानी के बाहर के स्रोतों का आकलन होगा। इससे ओजोन का स्तर बढ़ाने के कारकों का पता चल सकेगा। सटीक जानकारी मिलने पर ओजोन प्रदूषण से बचाव के रास्ते खुलेंगे। सीपीसीबी ने इसकी जानकारी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को अपनी हालिया रिपोर्ट में दी है।

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सीपीसीबी ने अपनी रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों की नजीर पेश करते हुए एनजीटी को बताया है कि वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों और नाइट्रोजन ऑक्साइड (नॉक्स) के बीच होने वाली फोटोकैमिकल प्रतिक्रिया से धरती के नजदीक ओजोन पैदा होती है। नाइट्रोजन ऑक्साइड के स्रोत वाहनों के साथ औद्योगिक गतिविधियों और कोयले, गैसोलीन व तेल के दहन है। जबकि वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों गैसोलीन को जलाने के साथ उसके वितरण समेत जीवाश्म ईधनों के जलाने से बनते हैं। राजधानी में दोनों ही तरह की गतिविधियां ज्यादा हैं। इसके अलावा रिहायशी और कृषि क्षेत्रों से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड और मीथेन से भी ओजोन का निर्माण होता है। सीपीसीबी ने बताया है कि चूंकि ओजोन फोटोकैमिकल प्रतिक्रिया से बनती है। इसलिए गर्मियों में ओजोन प्रदूषण का खतरा ज्यादा है।
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दरअसल, कोर्ट राजधानी में ओजोन के बढ़ते स्तर के मामले की जांच कर रहा है। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी), सीपीसीबी और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को यह बताने का निर्देश दिया कि कुछ क्षेत्रों में ओजोन का स्तर निर्धारित मापदंडों से अधिक क्यों हो रहा है और इसके लिए कोई लक्षित समाधान सुझाने को कहा था। इसके जवाब में सीपीसीबी ने अदालत में रिपोर्ट दाखिल की है। साथ ही, बताया कि वह एक साल तक ओजोन का विस्तृत अध्ययन करेगा।

दिल्ली के ऊपर जम रही जहरीली गैसों की परत
रिपोर्ट में सीपीसीबी ने दिल्ली-एनसीआर के ओजोन प्रदूषण पर टेरी-एआरएआई (2018) के अध्ययन का हवाला दिया है। इसके अनुसार, एनसीआर में कुल नॉक्स में परिवहन क्षेत्र का 60, बिजली संयंत्र का 15 और उद्योग का 10 फीसदी योगदान है। यही नहीं, गैर-मीथेन वीओसी के संबंध में परिवहन क्षेत्र का 53, आवासीय क्षेत्र का 22 और कृषि जलाने का योगदान एनसीआर में कुल 13 फीसदी है। इसी कड़ी में दिल्ली के मामले में नॉक्स और एनएमवीओसी के लिए कुल 80 से 81 फीसदी परिवहन क्षेत्र को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यही नहीं, टेरी-एआरएआई की रिपोर्ट ने ओजोन के पूर्ववर्ती तत्वों की उत्पत्ति प्राकृतिक तरीके को भी बताया है। इसमें वीओसी का जैव जनित, नॉक्स का मृदा, सीओ का जंगल की आग और मीथेन का जैव मंडल उत्सर्जन शामिल है।

राजधानी के नो स्टेशन ओजोन का स्तर तय मानक से अधिक रहा
सीपीसीबी की रिपोर्ट बताती है कि मानसून से पहले 2023 (मार्च-मई) के दौरान राजधानी के नो स्टेशन ओजोन का स्तर राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (एनएएक्यूएस) से अधिक रहा। इनमें डीटीयू, मंदिर मार्ग, आरके पुरम, डॉ. करणी सिंह शूटिंग रेंज, नेहरू नगर, पटपड़गंज, मुंडका, श्री अरबिंदो मार्ग और अलीपुर शामिल हैं। दूसरे स्टेशन जैसे आया नगर (प्री-मानसून सीजन में 8 घंटे की अधिकता का 0 फीसदी) और नजफगढ़ (प्री-मानसून सीजन में 8 घंटे की अधिकता का 1.8 फीसदी) जो समान क्षेत्रों में स्थित हैं, इन नो स्टेशनों के विपरीत ओजोन सांद्रता में वृद्धि नहीं देखी गई। सीपीसीबी के पास इनके बीच सह संबंध स्थापित करने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। बोर्ड का अध्ययन इसका भी समाधान देगा।

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