Delhi : सीपीसीबी ने कहा- प्रदूषण को मौत की सबसे बड़ी वजह बताना ठीक नहीं, गलत है लैंसेट का अध्ययन
सीपीसीबी का कहना है कि इन शहरों में हो रही मौतों के लिए सिर्फ वायु प्रदूषण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है। इसके लिए कोई प्रमाणिक दस्तावेज नहीं हैं।
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केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उन रिपोर्ट्स काे खारिज किया है, जिसमें दिल्ली समेत देश के दस शहरों में वायु प्रदूषण को मौत की सबसे बड़ी वजह बताया गया है। सीपीसीबी का कहना है कि इन शहरों में हो रही मौतों के लिए सिर्फ वायु प्रदूषण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है। इसके लिए कोई प्रमाणिक दस्तावेज नहीं हैं। शहरी निकायों की ओर से जारी होने वाले मृत्यु प्रमाण पत्र से भी इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती। सीपीसीबी ने इससे जुड़ी एक रिपोर्ट राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को सौंपी है।
एनजीटी ने ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाले मेडिकल जनरल द लैंसेट की रिपोर्ट के आधार पर मीडिया में प्रकाशित खबरों पर स्वत: संज्ञान लिया था। रिपोर्ट में दिल्ली, अहमदाबाद, बंगलूरू, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई, पुणे, शिमला और वाराणसी के अध्ययन के आधार पर तैयार की गई थी। इसमें कहा गया था कि खराब वायु गुणवत्ता से इन शहरों में मृत्यु दर पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। हर साल लगभग 33 हजार मौतें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के तयशुदा मानक से ज्यादा वायु प्रदूषण से होती हैं। प्रदूषण की बड़ी वजहें वाहनों, औद्योगिक गतिविधियों और निर्माण स्थलों पर उड़ने वाली धूल हैं।
इसी आधार पर एनजीटी ने 15 अक्तूबर को केंद्र समेत सभी नौ राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। सीपीसीबी ने इसका जवाब दाखिल कर दिया है। इसमें बताया गया है कि लैंसेट की रिपोर्ट में भारत में एक वर्ग किलोमीटर स्थानिक रिजोल्यूशन पर रोजाना औसतन पीएम 2.5 सांद्रता की गणना 2008 से 2020 तक की गई थी। वहीं, मृत्यु दर के आंकड़ों के लिए शहरों के प्रत्येक नगर निगम से मृत्यु दर रिकॉर्ड का उपयोग किया गया।
सीपीसीबी का कहना है कि विभिन्न राज्यों और शहरों में मृत्यु पंजीकरण अलग-अलग तरीकों से होता है। मृत्यु प्रमाण पत्र में मौत की वजह नहीं बताई जाती। इसके अलावा अधिकांश शहरों के लिए अंतरराष्ट्रीय रोग वर्गीकरण कोड भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में लैंसेट की रिपोर्ट किस आधार पर वायु प्रदूषण को मौत की बड़ी वजह बता सकती है।
सीपीसीबी ने रिपोर्ट में कहा कि पीएम 2.5 और अन्य प्रदूषकों के कारण श्वसन संबंधी और इससे जुड़ी बीमारियों को प्रभावित करने वाले कारकों में से एक है। स्वास्थ्य पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है।
अध्ययन में सामान्यीकृत मॉडल का उपयोग किया
सीपीसीबी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि लैंसेट ने अपने अध्ययन में पीएम 2.5 माप के लिए सामान्यीकृत मॉडल का उपयोग करते हुए ग्राउंड मॉनिटर आधारित डेटा और सेटेलाइट अध्ययन आधारित डेटा का उपयोग किया। रिपोर्ट में कहा गया कि जिन शहरों ने लगातार पांच वर्ष तक पीएम 10 सांद्रता 603 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के लिए राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस-2009) के वार्षिक मानकों को पार किया है, उन्हें गैर-प्राप्ति शहर (एनएसी) के रूप में नामित किया गया है।
पीएम 10 सांद्रता को 40 फीसदी तक कम करना मुख्य उद्देश्य
ऐसी स्थिति में सीपीसीबी ने अहमदाबाद, बंगलूरू, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई, पुणे और वाराणसी सहित 24 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में 130 गैर-प्राप्ति और मिलियन से अधिक आबादी वाले शहरों की पहचान की है। एनसीएपी का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2025-26 तक इन 130 शहरों में पीएम 10 सांद्रता को 40 फीसदी तक कम करना है। साल 2019-20 के पीएम 10 की तुलना में। सीपीसीबी ने अपनी रिपोर्ट में अधिकरण को एक अन्य जानकारी से अवगत कराया है। इसमें व्यापक एनसीएपी और विभिन्न नीतिगत हस्तक्षेपों के कार्यान्वयन के साथ 130 पहचाने गए शहरों में से 95 शहरों में 2017-18 के स्तर की तुलना में 2023-24 के दौरान पीएम 10 सांद्रता में कमी देखी गई है। इन 95 शहरों में ऊपर बताए गए नौ शहर यानी अहमदाबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई, पुणे और वाराणसी शामिल हैं। शिमला शहर में भी इसी तरह की कमी देखी गई।
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