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Delhi High Court: लक्ष्मीबाई कॉलेज की प्रोफेसर के खिलाफ SC/ST एक्ट की FIR रद्द, जानें कोर्ट ने क्या कहा

आईएएनएस, नई दिल्ली Published by: अनुज कुमार Updated Fri, 10 Apr 2026 07:04 PM IST
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सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने लक्ष्मीबाई कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर रंजीत कौर के खिलाफ दर्ज एससी/एसटी एक्ट की एफआईआर खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि घटना वाले दिन की शिकायतों में जाति आधारित अपमान का जिक्र नहीं था।

Delhi HC quashed FIR registered SC/ST Act against Associate Professor at Lakshmibai College
दिल्ली हाईकोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने लक्ष्मीबाई कॉलेज की एक एसोसिएट प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी है। यह एफआईआर मारपीट और जाति-आधारित दुर्व्यवहार के आरोपों से संबंधित थी। अदालत ने कहा कि जाति-आधारित अपमान के आरोप बाद में सोचे गए थे।

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न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने रंजीत कौर द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार किया। पीठ ने भारत नगर पुलिस थाना में 2021 में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। यह एफआईआर आईपीसी की धारा 323, 504 और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा तीन के तहत थी। मामला 16 अगस्त, 2021 की एक विभागीय बैठक से जुड़ा है। 
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इसमें याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता नीलम के बीच कथित तौर पर झगड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसे सहकर्मियों की उपस्थिति में थप्पड़ मारा गया और अपमानित किया गया। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता की प्रारंभिक शिकायतों में जाति-आधारित टिप्पणी का कोई आरोप नहीं था। जातिगत तत्व पहली बार 17 अगस्त, 2021 की शिकायत में सामने आया।

दिल्ली कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध के लिए स्पष्ट आरोप होना चाहिए। आरोपी ने जानबूझकर पीड़ित को उसकी जातिगत पहचान के कारण अपमानित किया हो। केवल अनुसूचित जाति से संबंधित होना और दुर्व्यवहार पर्याप्त नहीं है। कथित कृत्य और पीड़ित की जातिगत पहचान के बीच संबंध स्पष्ट होना चाहिए। अदालत ने यह भी पाया कि बाद की शिकायतों में भी जातिवादी टिप्पणियों के आरोप अस्पष्ट और सामान्य थे।

कोर्ट ने आगे पाया कि केवल एक गवाह ने याचिकाकर्ता पर विशिष्ट जातिवादी टिप्पणी का आरोप लगाया था। इस बयान की अन्य गवाहों ने पुष्टि नहीं की। कोर्ट ने यह भी कहा कि एक अकेले गवाह का बयान एससी/एसटी अधिनियम के तहत आरोप का आधार नहीं बन सकता। आईपीसी की धारा 323 और 504 गैर-संज्ञेय अपराध हैं। मजिस्ट्रेट की पूर्व स्वीकृति के बिना इन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती थी।

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