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Gurugram News: करार किया डुप्लेक्स का सौंपा सिंगल फ्लोर, मामला दर्ज करने का आदेश
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कोर्ट ने इसे तथ्यों को जानबूझकर छिपाना और धोखाधड़ी का प्रथम दृष्टया मामला माना
विराट त्यागी
गुरुग्राम। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीश कुमार की अदालत ने सुशांत लोक थाना पुलिस को सिद्धार्थ बिल्ड होम बिल्डर के खिलाफ धोखाधड़ी की संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज करने का स्पष्ट निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी को होगी।
यह आदेश कंपनी के निदेशक धर्म चंद यादव और प्रबंध निदेशक सिद्धार्थ चौहान के खिलाफ कार्रवाई के लिए दिया गया है। शिकायतकर्ता दिनेश सूरी ने आरोप लगाया कि सेक्टर-95 में बनाई जा रही एनसीआर वन (ग्रीन्स) परियोजना में ई-1605 फ्लैट फरवरी 2012 में बुक किया था। 20 अक्तूबर 2011 के स्वीकृत प्लान में फ्लैट डुप्लेक्स (3686 वर्ग फीट) था, लेकिन बिल्डर-बायर एग्रीमेंट में उसे सिंगल फ्लोर के रूप में दर्ज किया गया।
कंपनी की ओर से तीन नवंबर 2023 को शिकायतकर्ता को दिए गए जवाब में कहा गया कि मार्केटिंग-सीआरएम टीम की गलती को स्वीकार किया है लेकिन यह नहीं बताया कि स्वीकृत योजना अक्तूबर 2011 में थी उसको आवंटन प्रक्रिया में क्यों नहीं दिखाया गया।
कोर्ट ने इसे तथ्यों को जानबूझकर छिपाना और धोखाधड़ी का प्रथम दृष्टया मामला माना है। पुलिस ने पहले इस मामले को केवल दीवानी विवाद मानकर बंद कर दिया था, लेकिन अदालत ने इसे संज्ञेय अपराध मानते हुए अपनी शक्तियों का प्रयोग किया ताकि जांच सुनिश्चित की जा सके।
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गुरुग्राम। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीश कुमार की अदालत ने सुशांत लोक थाना पुलिस को सिद्धार्थ बिल्ड होम बिल्डर के खिलाफ धोखाधड़ी की संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज करने का स्पष्ट निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी को होगी।
यह आदेश कंपनी के निदेशक धर्म चंद यादव और प्रबंध निदेशक सिद्धार्थ चौहान के खिलाफ कार्रवाई के लिए दिया गया है। शिकायतकर्ता दिनेश सूरी ने आरोप लगाया कि सेक्टर-95 में बनाई जा रही एनसीआर वन (ग्रीन्स) परियोजना में ई-1605 फ्लैट फरवरी 2012 में बुक किया था। 20 अक्तूबर 2011 के स्वीकृत प्लान में फ्लैट डुप्लेक्स (3686 वर्ग फीट) था, लेकिन बिल्डर-बायर एग्रीमेंट में उसे सिंगल फ्लोर के रूप में दर्ज किया गया।
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कंपनी की ओर से तीन नवंबर 2023 को शिकायतकर्ता को दिए गए जवाब में कहा गया कि मार्केटिंग-सीआरएम टीम की गलती को स्वीकार किया है लेकिन यह नहीं बताया कि स्वीकृत योजना अक्तूबर 2011 में थी उसको आवंटन प्रक्रिया में क्यों नहीं दिखाया गया।
कोर्ट ने इसे तथ्यों को जानबूझकर छिपाना और धोखाधड़ी का प्रथम दृष्टया मामला माना है। पुलिस ने पहले इस मामले को केवल दीवानी विवाद मानकर बंद कर दिया था, लेकिन अदालत ने इसे संज्ञेय अपराध मानते हुए अपनी शक्तियों का प्रयोग किया ताकि जांच सुनिश्चित की जा सके।