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Gurugram News: गर्मी में मटकों की घटती लोकप्रियता, संकट में प्रजापति समुदाय का पुश्तैनी काम

Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 22 Jun 2026 06:49 PM IST
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Declining popularity of earthen pots in summer puts the Prajapati community's ancestral trade in jeopardy.
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तकनीक आधारित बर्तन, फ्रिज और उच्च गुणवत्ता वाली मिट्टी का कम मिलना प्रमुख कारण

संवाद न्यूज एजेंसी
पटौदी। कभी घर-घर में उपयोग होने वाले मिट्टी के मटके, जिन्हें देशी फ्रिज भी कहा जाता था, आज लोगों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। आधुनिक दौर में फ्रिज और प्लास्टिक के वाटर जार ने न केवल मटकों की जगह ले ली है, बल्कि इससे मिट्टी के बर्तन बनाने वाले प्रजापति समुदाय का पुश्तैनी काम भी लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच गया है।


गांव मिल्कपुर निवासी बलजीत प्रजापति बताते हैं कि उनका परिवार पिछले 100 वर्षों से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करता आ रहा है। हालांकि, अब हालात बदल चुके हैं। लोगों की मिट्टी के बर्तनों में रुचि कम हो गई है, वहीं दूसरी ओर उच्च गुणवत्ता वाली मिट्टी मिलना भी कठिन हो गया है। जब बड़ी मेहनत से मटके और अन्य बर्तन बना भी लिए जाते हैं, तो उन्हें खरीदने वाले बहुत कम लोग मिलते हैं। उन्होंने बताया कि अतीत में कुछ दशकों पहले पटौदी क्षेत्र में लगभग दो दर्जन के आसपास कुम्हार समुदाय के लोग मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य करते थे परन्तु आधुनिक दौर में फ्रिज और प्लास्टिक के वाटर जार ने मिट्टी के बर्तनों पर मानो ग्रहण लगा दिया है।
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पटौदी निवासी रामकिशन नंबरदार प्रजापति का कहना है कि पहले की तुलना में अब मिट्टी के बर्तनों का उत्पादन बेहद कम हो गया है। फ्रिज और प्लास्टिक जग के बढ़ते प्रचलन के कारण मिट्टी के बर्तनों की मांग लगभग खत्म हो चुकी है। हालात ऐसे हैं कि कई कुम्हार परिवार इस पुश्तैनी काम को छोड़कर दूसरे व्यवसायों की ओर रुख कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में मिट्टी के बर्तनों का यह पारंपरिक शिल्प विलुप्त हो सकता है। ऐसे में सरकार और समाज को इस कला के संरक्षण के लिए कदम उठाने होंगे, ताकि प्रजापति समुदाय के लोग अपनी आजीविका को बचा सकें और इस परंपरा को जीवंत रख सकें।
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