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पीजी-हॉस्टलों की सुरक्षा पर हाईकोर्ट सख्त: एक सप्ताह में सेफ्टी ऑडिट के आदेश, डीयू-एमसीडी को ठहराया जिम्मेदार

Mon, 07 Sep 2026 04:32 PM IST
विकास कुमार पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: विकास कुमार Updated Mon, 07 Sep 2026 04:32 PM IST
सार

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि यदि संबंधित अधिकारियों ने अपने वैधानिक कर्तव्यों का ठीक से पालन किया होता, तो ऐसे हादसों को टाला जा सकता था। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ पीजी मालिक बेखौफ होकर अवैध निर्माण करते हैं। यह हैरान करने वाला है कि जिन इमारतों का नक्शा सिर्फ दो मंजिलों के लिए पास होता है, उन्हें पुरानी नींव पर ही छह मंजिला तक खड़ा कर दिया जाता है।

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High Court gets tough on PG hostel safety Orders safety audit within a week
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में हुए दर्दनाक इमारत हादसे पर दिल्ली हाई कोर्ट ने गहरी नाराजगी और दुख जताया है। अदालत ने सोमवार को इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि इसके लिए केवल इमारत के मालिक ही नहीं, बल्कि दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) और दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। गौरतलब है कि रविवार को हुए इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई है और कई अन्य घायल हुए हैं।

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डीयू और एमसीडी की जवाबदेही पर कोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि डीयू दूसरे राज्यों से आने वाले छात्रों को पर्याप्त हॉस्टल सुविधा मुहैया कराने में पूरी तरह विफल रहा है। इसी कमी और मजबूरी के चलते छात्रों को असुरक्षित प्राइवेट पेइंग गेस्ट (पीजी) में शरण लेनी पड़ती है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के हादसों के लिए संबंधित एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकतीं।

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बचाव कार्य तेज करने के निर्देश
हाई कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि रेस्क्यू ऑपरेशन में अपनी पूरी ताकत झोंक दें ताकि मलबे में दबी जिंदगियों को बचाया जा सके। केंद्र, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और एमसीडी का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि मलबे में फंसे लोगों को निकालने के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार स्थिति की सक्रिय रूप से निगरानी कर रही है और जनहित में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

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10 दिन में मांगा जवाब
एक जनहित याचिका पर तत्काल सुनवाई करते हुए अदालत ने सभी संबंधित अथॉरिटीज को 10 दिन के भीतर अपना अलग-अलग जवाब (हलफनामा) दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी।

 

हादसों के लिए भवन मालिक ही नहीं, अफसर भी जिम्मेदार
अदालत ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को एक सप्ताह के भीतर सभी पीजी और हॉस्टलों का सेफ्टी ऑडिट करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि असुरक्षित इमारतों से जुड़े हादसों के लिए सिर्फ भवन मालिक ही नहीं, बल्कि संबंधित सरकारी विभाग भी बराबर के जिम्मेदार हैं।
 

अथॉरिटी की लापरवाही पर कोर्ट की फटकार
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि यदि संबंधित अधिकारियों ने अपने वैधानिक कर्तव्यों का ठीक से पालन किया होता, तो ऐसे हादसों को टाला जा सकता था। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ पीजी मालिक बेखौफ होकर अवैध निर्माण करते हैं। यह हैरान करने वाला है कि जिन इमारतों का नक्शा सिर्फ दो मंजिलों के लिए पास होता है, उन्हें पुरानी नींव पर ही छह मंजिला तक खड़ा कर दिया जाता है। इसके लिए एक उचित नियामक व्यवस्था होना बेहद जरूरी है।

एमसीडी और दिल्ली पुलिस ने दिया आश्वासन
अदालत ने सुनवाई के दौरान एमसीडी और दिल्ली पुलिस के उस आश्वासन पर भी गौर किया, जिसमें कहा गया है कि बचाव अभियान जारी है और स्थिति से निपटने के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं।

अदालत के प्रमुख निर्देश और सवाल
10 दिन में हलफनामा: हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों (एमसीडी और अन्य) को 10 दिन के भीतर हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा है कि पीजी को रेगुलेट करने के लिए क्या नियम मौजूद हैं।

अधिकारियों की जवाबदेही
कोर्ट ने वैध बिल्डिंग परमिशन की डिटेल और संबंधित अधिकारियों की तरफ से बरती गई किसी भी तरह की लापरवाही का पूरा ब्योरा तलब किया है। अदालत ने इस बात का संज्ञान लिया कि दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में हॉस्टल की पर्याप्त सुविधा न होने के कारण दूसरे राज्यों से आने वाले छात्रों को मजबूरन पीजी में रहना पड़ता है। कोर्ट ने डीयू से बाहरी छात्रों की संख्या और उपलब्ध हॉस्टल सुविधाओं की विस्तृत जानकारी मांगी है।

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