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Noida News: 26 साल पुराने भूमि विवाद में नोएडा प्राधिकरण की अपील खारिज
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(अदालत से)
-सत्र न्यायाधीश ने निचली अदालत के 2010 के फैसले की पुष्टि की
-अदालत ने कहा- वादी का कब्जा साबित, प्राधिकरण खसरा नंबर तक साबित नहीं कर सका
मोहम्मद बिलाल
ग्रेटर नोएडा। जिले की अदालत ने करीब 26 साल पुराने भूमि विवाद में नोएडा प्राधिकरण की अपील खारिज कर दिया। अदालत ने निचली अदालत के 17 सितंबर 2010 के उस निर्णय व डिक्री की पुष्टि की, जिसमें हंसराज के पक्ष में प्राधिकरण के विरुद्ध स्थायी निषेधाज्ञा जारी की गई थी।
हंसराज ने वर्ष 2000 में वाद दाखिल कर दावा किया था कि गांव हरौला स्थित 1558.33 वर्गगज भूमि व उस पर बने भवन का वह मालिक व काबिज है। यह संपत्ति उसे अपने बाबा रनुआ की 19 दिसंबर 1972 की वसीयत के माध्यम से प्राप्त हुई थी, जो पैतृक रूप से प्राप्त हुई थी और जमींदारी उन्मूलन अधिनियम की धारा-9 के तहत रनुआ में निहित हो गई थी। प्राधिकरण द्वारा उसे बेदखल करने की धमकी दिए जाने पर उसने निषेधाज्ञा का वाद दाखिल किया था। नोएडा प्राधिकरण ने अपील में दलील दी कि विवादित भूमि तालाब का हिस्सा है. जिसे उसने ग्राम समुदाय के उपयोग हेतु पार्क व बारात घर के रूप में विकसित किया है। प्राधिकरण ने वसीयत की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसका प्रोबेट नहीं कराया गया और वसीयतकर्ता बीमार अवस्था में इसे लिखा था।
अदालत ने पाया कि प्राधिकरण के दो गवाह यह तक नहीं बता सके कि पार्क किस खसरा नंबर में स्थित है और उन्होंने मौके पर कोई पैमाइश भी नहीं की थी। वहीं वादी पक्ष ने वसीयत के अनुप्रमाणक साक्षी के जरिए वसीयत का विधिपूर्ण निष्पादन साबित किया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने हंसराज को स्थायी निषेधाज्ञा का अधिकारी माना और प्राधिकरण की अपील को निरस्त कर दिया।
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(अदालत से)
-सत्र न्यायाधीश ने निचली अदालत के 2010 के फैसले की पुष्टि की
-अदालत ने कहा- वादी का कब्जा साबित, प्राधिकरण खसरा नंबर तक साबित नहीं कर सका
मोहम्मद बिलाल
ग्रेटर नोएडा। जिले की अदालत ने करीब 26 साल पुराने भूमि विवाद में नोएडा प्राधिकरण की अपील खारिज कर दिया। अदालत ने निचली अदालत के 17 सितंबर 2010 के उस निर्णय व डिक्री की पुष्टि की, जिसमें हंसराज के पक्ष में प्राधिकरण के विरुद्ध स्थायी निषेधाज्ञा जारी की गई थी।
हंसराज ने वर्ष 2000 में वाद दाखिल कर दावा किया था कि गांव हरौला स्थित 1558.33 वर्गगज भूमि व उस पर बने भवन का वह मालिक व काबिज है। यह संपत्ति उसे अपने बाबा रनुआ की 19 दिसंबर 1972 की वसीयत के माध्यम से प्राप्त हुई थी, जो पैतृक रूप से प्राप्त हुई थी और जमींदारी उन्मूलन अधिनियम की धारा-9 के तहत रनुआ में निहित हो गई थी। प्राधिकरण द्वारा उसे बेदखल करने की धमकी दिए जाने पर उसने निषेधाज्ञा का वाद दाखिल किया था। नोएडा प्राधिकरण ने अपील में दलील दी कि विवादित भूमि तालाब का हिस्सा है. जिसे उसने ग्राम समुदाय के उपयोग हेतु पार्क व बारात घर के रूप में विकसित किया है। प्राधिकरण ने वसीयत की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसका प्रोबेट नहीं कराया गया और वसीयतकर्ता बीमार अवस्था में इसे लिखा था।
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अदालत ने पाया कि प्राधिकरण के दो गवाह यह तक नहीं बता सके कि पार्क किस खसरा नंबर में स्थित है और उन्होंने मौके पर कोई पैमाइश भी नहीं की थी। वहीं वादी पक्ष ने वसीयत के अनुप्रमाणक साक्षी के जरिए वसीयत का विधिपूर्ण निष्पादन साबित किया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने हंसराज को स्थायी निषेधाज्ञा का अधिकारी माना और प्राधिकरण की अपील को निरस्त कर दिया।
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