Delhi: मिलेनियल की सीख और जेन-जी की सोच...कचरे से फैशन की नई क्रांति, टेक्सटाइल कचरे को दे रही नई जिंदगी
मां ने दादी से बेकार कपड़ों का बिछावन बनाना सीखा। मेरी मां कभी पुरानी साड़ी से मेरा फ्रॉक सिल देती, तो कभी दुपट्टे से खुद के लिए ब्लाउज बना लेती। मेरी गुड़िया भी मां ने पुराने कतरन से बनाई थी।
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मां ने दादी से बेकार कपड़ों का बिछावन बनाना सीखा। मेरी मां कभी पुरानी साड़ी से मेरा फ्रॉक सिल देती, तो कभी दुपट्टे से खुद के लिए ब्लाउज बना लेती। मेरी गुड़िया भी मां ने पुराने कतरन से बनाई थी। इसी से हमने सीखा कि दुनिया की कोई भी चीज बेकार नहीं है। बस एक सोच की दूरी है। अगर उन्हीं अनुभवों में हम थोड़ी सी रचनात्मकता मिला दें, तो कुछ नया बनाया जा सकता है। ये बातें दिल्ली हाट में आयोजित ‘वीव द फ्यूचर 4.0’ में कपड़े का स्टॉल लगाए करिश्मा ने कहीं।
दादी-नानी के समय में पुरानी साड़ियों से रजाई, बच्चों के कपड़े और गुड़िया बनाना आम बात थी। उस दौर में इसे मजबूरी कहा जाता था, लेकिन आज की जेन-जी उसी सोच को रचनात्मकता के साथ जोड़कर फैशन और कारोबार का नया मॉडल बना रही है। कपड़ा उद्योग के बचे हुए टुकड़ों और पुराने वस्त्रों से जैकेट, बैग, सैंडल और सजावटी सामान तैयार कर युवा उद्यमी न सिर्फ पर्यावरण बचाने का संदेश दे रहे हैं, बल्कि सर्कुलर फैशन को भी नई पहचान दिला रहे हैं।
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