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जम्मू-कश्मीर विलय दिवस: 26 अक्तूबर 1947 को क्या हुआ था, दशकों बाद भी क्यों याद किया जाता है यह दिन?
Mon, 26 Oct 2026 07:15 AM IST
शिवम तिवारी
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम तिवारी
Updated Mon, 26 Oct 2026 07:15 AM IST
सार
Jammu and Kashmir Accession Day: जम्मू-कश्मीर विलय दिवस हर साल 26 अक्तूबर को मनाया जाता है। साल 1947 में इसी दिन महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। अगले दिन लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे स्वीकार किया और भारतीय सेना श्रीनगर पहुंची। जानें कबायली हमले, ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह के संघर्ष, डोगरा इतिहास और महाराजा हरि सिंह की जयंती से जुड़ी जरूरी बातें।
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जम्मू-कश्मीर विलय दिवस
- फोटो : AI Generated
विस्तार
भारत के इतिहास में 26 अक्तूबर की तारीख का खास महत्व है। साल 1947 में आज के ही दिन जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय से जुड़े दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अगले दिन भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे स्वीकार किया और भारतीय सेना श्रीनगर पहुंची। उस समय जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा पर संकट मंडरा रहा था और कबायली हमलावर रियासत के कई इलाकों में दाखिल हो चुके थे। ऐसे मुश्किल हालात में हुए इस घटनाक्रम ने जम्मू-कश्मीर के इतिहास की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। आज हर साल 26 अक्तूबर को विलय दिवस के रूप में याद किया जाता है। इस दिन के साथ महाराजा हरि सिंह, ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और डोगरा इतिहास की चर्चा भी जुड़ी है। आइए, जानते हैं कि 1947 में आखिर क्या हुआ था और यह दिन आज भी क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है।
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जम्मू-कश्मीर में डोगरा इतिहास को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है। इस मांग के समर्थकों का कहना है कि विद्यार्थियों को डोगरा शासन के दौरान क्षेत्र की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के बारे में जानकारी मिलनी चाहिए। इतिहास को पढ़ाते समय अलग-अलग समुदायों, शासकों और आम लोगों के अनुभवों को तथ्यात्मक तरीके से समझना उपयोगी होता है। इससे विद्यार्थियों को किसी घटना की पृष्ठभूमि और उसके प्रभावों को समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, पाठ्यक्रम में किसी विषय को शामिल करने का फैसला संबंधित शैक्षणिक संस्थाओं और शिक्षा विभागों की प्रक्रिया के अनुसार होता है।
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1947 में जम्मू-कश्मीर में क्या हुआ था?
15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के समय जम्मू-कश्मीर एक रियासत थी, जिस पर महाराजा हरि सिंह का शासन था। ब्रिटिश शासन समाप्त होने के बाद रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ अपने संबंध तय करने थे। जम्मू-कश्मीर के भविष्य पर फैसला होने से पहले ही क्षेत्र में तनाव बढ़ने लगा। 24 अक्तूबर 1947 को कबायली हमलावरों ने रियासत के कई इलाकों में हमला किया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, हमलावर तेजी से आगे बढ़ रहे थे और श्रीनगर की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया था। इस संकट ने महाराजा हरि सिंह के सामने रियासत की सुरक्षा और उसके भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
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ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने कैसे मुकाबला किया?
कबायली हमले की खबर मिलने पर ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ उड़ी क्षेत्र की ओर बढ़े। उनका उद्देश्य हमलावरों की बढ़त रोकना और श्रीनगर की तरफ जाने वाले रास्तों की सुरक्षा करना था। उस समय रियासत की सेना को सीमित संसाधनों के साथ बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। ऐतिहासिक विवरणों में बताया गया है कि ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और उनके सैनिकों ने कई दिनों तक हमलावरों का मुकाबला किया। इस संघर्ष में कई सैनिकों की जान गई। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने मोर्चा नहीं छोड़ा और अंततः उनकी मृत्यु हो गई। जम्मू-कश्मीर के इतिहास में उन्हें रियासत की रक्षा के लिए किए गए संघर्ष के कारण याद किया जाता है।
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