NCERT: नई इतिहास के किताबों में बदलाव, बंटवारे पर कांग्रेस के रुख में संशोधन; हिटलर का जिक्र भी हटा
NCERT Textbook: एनसीईआरटी की नई सामाजिक विज्ञान के पुस्तकों में कई अहम बदलाव किए गए हैं। संशोधित संस्करण में 1947 के बंटवारे पर कांग्रेस के रुख को नए तरीके से प्रस्तुत किया गया है, जबकि एडोल्फ हिटलर और नाजी विचारधारा से जुड़े संदर्भों को हटा दिया गया है।
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History Textbook Changes: एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सोशल साइंस की किताब, जिसमें न्यायपालिका की कथित तौर पर बदनामी करने को लेकर विवाद के बाद बदलाव किए गए थे, उसमें और भी सुधार किए गए हैं। इसमें 1947 के बंटवारे पर कांग्रेस के रुख के बारे में एक बदला हुआ वर्शन शामिल है, जिसमें कहा गया है कि इसे आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका मानना अभी भी बहस का विषय है।
नई किताब में VD सावरकर की स्वराज की मांग को तो शामिल किया गया है, लेकिन एडोल्फ हिटलर और नाजी विचारधारा के जिक्र को हटा दिया गया है।
न्यायपालिका की कथित बदनामी को लेकर विवाद खड़ा होने के कुछ महीनों बाद, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने इस हHdls कक्षा 8 की सोशल साइंस की संशोधित किताब - "एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड" - जारी की, जिसमें विवादित हिस्सों को हटा दिया गया है।
बंटवारे और न्यायपालिका से जुड़े अध्यायों में हुए अहम बदलाव
एनसीईआरटी की संशोधित पाठ्यपुस्तक में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। नई किताब से कुछ विवादित हिस्सों, अदालतों में लंबित मामलों और दो प्रमुख न्यायिक फैसलों के संदर्भ हटा दिए गए हैं। वहीं, जनहित याचिका (PIL), ट्रिब्यूनल और विवादों के वैकल्पिक समाधान तंत्र से जुड़ी नई जानकारी को शामिल किया गया है, ताकि छात्रों को न्यायिक व्यवस्था की व्यापक समझ मिल सके।
इतिहास के अध्याय "India's Long Road to Independence" में भी बदलाव किए गए हैं। संशोधित संस्करण में कहा गया है कि देश के विभाजन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी व्यापक रूप से विरोध किया था और यह सवाल कि क्या विभाजन आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता था, आज भी बहस का विषय बना हुआ है। इसके साथ ही, पुरानी पाठ्यपुस्तक का वह वाक्य हटा दिया गया है जिसमें कहा गया था कि विभाजन के दौरान उपमहाद्वीप में हुए सांप्रदायिक नरसंहार के समय कांग्रेस नेता असहाय थे।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद क्या बदला?
- नए संस्करण में वह वाक्य हटा दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि विभाजन के दौरान सांप्रदायिक हिंसा पर कांग्रेस नेता असहाय थे।
- पहले की किताब में लिखा था कि अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम मतभेदों का फायदा उठाकर भारत का विभाजन किया और कांग्रेस ने अंततः इसे स्वीकार किया।
- संशोधित पाठ्यपुस्तक में जोड़ा गया है कि वी.डी. सावरकर ने भी 1925 में स्वराज की मांग उठाई थी।
- पुराने संस्करण में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा सेना खड़ी करने के लिए हिटलर से समर्थन मांगने का उल्लेख था।
- हिटलर को "नस्लवादी नाजी विचारधारा वाला तानाशाह" बताने वाला हिस्सा भी हटाया गया है।
- नई किताब में केवल यह कहा गया है कि बोस ने "ब्रिटिश विरोधी ताकतों" से समर्थन मांगा था।
- संशोधित संस्करण से हिटलर और नाजी विचारधारा के सभी संदर्भ हटा दिए गए हैं।
- फरवरी में न्यायपालिका से जुड़े अध्याय पर विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया था।
- अदालत ने पुस्तक की भौतिक और डिजिटल प्रतियां वापस लेने तथा आगे के प्रकाशन पर रोक लगाने का आदेश दिया था।
- नई पाठ्यपुस्तक की भूमिका में कहा गया है कि इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और समीक्षा प्रक्रिया के बाद प्रकाशित किया गया है।
इसमें यह भी बताया गया है कि 16 मार्च के आदेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा बनाई गई विशेषज्ञों की एक समिति ने चौथे अध्याय, "समाज में न्यायपालिका की भूमिका" (The Role of the Judiciary in Society), को "फिर से लिखा" था।
वापस ली गई पाठ्यपुस्तक की विकास टीम में 51 सदस्य शामिल थे। संशोधित संस्करण में 48 सदस्य हैं, जिनमें से तीन लोगों - मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार - के नाम हटा दिए गए हैं, जिन्हें शुरू में इस अध्याय के लिए जिम्मेदार माना गया था।