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सीट का समीकरण: तीन दशक, सात चुनाव से किशनी में सपा का दबदबा; BJP को पहली जीत का इंतजार; ऐसा है यहां का इतिहास
Tue, 08 Sep 2026 07:38 AM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Tue, 08 Sep 2026 07:38 AM IST
सार
मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट 1962 में अस्तित्व में आई।1993 के चुनाव से यहां सपा ने अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है। 2022 में सपा के बृजेश कठेरिया ने भाजपा को हराया था। आइए, इस सीट के बारे में विस्तार से जानते हैं...
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किशनी सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर चुनावी मोड में नजर आने लगी है। यहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव को लेकर सियासी दल जमीनी स्तर पर अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। आने वाले चुनाव में जहां भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेगी, वहीं विपक्ष सत्ता परिवर्तन की उम्मीदों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में हम आपको यूपी की सभी विधानसभा सीटों का इतिहास, राजनीतिक सफर और चुनावी गणित बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज चर्चा मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट की। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इसका अब तक का इतिहास क्या रहा है।
पहले जानते हैं किशनी विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला मैनपुरी है। मैनपुरी जिले में कुल चार विधानसभा सीटें हैं। इनमें- मैनपुरी, भोगांव, किशनी और करहल शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की आज की कड़ी में हम मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट की बात करेंगे। मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट पहली बार वर्ष 1961 के परिसीमन आदेश के बाद अस्तित्व में आई थी और यहां पहला विधानसभा चुनाव 1962 में हुआ था।
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पहले जानते हैं किशनी विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला मैनपुरी है। मैनपुरी जिले में कुल चार विधानसभा सीटें हैं। इनमें- मैनपुरी, भोगांव, किशनी और करहल शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की आज की कड़ी में हम मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट की बात करेंगे। मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट पहली बार वर्ष 1961 के परिसीमन आदेश के बाद अस्तित्व में आई थी और यहां पहला विधानसभा चुनाव 1962 में हुआ था।
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किशनी विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
किशनी विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में सबसे बड़ी आबादी अनुसूचित जाति और क्षत्रिय समुदाय की है, जिनकी हिस्सेदारी लगभग 14-14% है। इसके बाद यादव मतदाताओं की एक मजबूत आबादी लगभग 13% है, जो चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वहीं शाक्य (कुशवाहा) समाज की हिस्सेदारी करीब 10% और मुस्लिम मतदाता लगभग 6% हैं। इनके अलावा ब्राह्मण समाज के करीब 5%, लोधी समुदाय के लगभग 4% तथा वैश्य वर्ग के करीब 3% मतदाता मौजूद हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य अति पिछड़े और सवर्ण समुदायों से आते हैं।
किशनी विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
कांग्रेस के दबदबे से हुई शुरुआत
1962 के चुनाव में किशनी विधानसभा सीट के पहले चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गणेश चंद्र विजयी हुए। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के चिरोंजी लाल को 4,812 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में गणेश चंद्र को 11,363 वोट मिले, जबकि चिरोंजी लाल को 6,551 वोट मिले।
किशनी विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में सबसे बड़ी आबादी अनुसूचित जाति और क्षत्रिय समुदाय की है, जिनकी हिस्सेदारी लगभग 14-14% है। इसके बाद यादव मतदाताओं की एक मजबूत आबादी लगभग 13% है, जो चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वहीं शाक्य (कुशवाहा) समाज की हिस्सेदारी करीब 10% और मुस्लिम मतदाता लगभग 6% हैं। इनके अलावा ब्राह्मण समाज के करीब 5%, लोधी समुदाय के लगभग 4% तथा वैश्य वर्ग के करीब 3% मतदाता मौजूद हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य अति पिछड़े और सवर्ण समुदायों से आते हैं।
किशनी विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
कांग्रेस के दबदबे से हुई शुरुआत
1962 के चुनाव में किशनी विधानसभा सीट के पहले चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गणेश चंद्र विजयी हुए। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के चिरोंजी लाल को 4,812 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में गणेश चंद्र को 11,363 वोट मिले, जबकि चिरोंजी लाल को 6,551 वोट मिले।
इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने मारी बाजी
इस विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के सूरज राम सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गणेश चंद्र को 3,217 वोटों के अंतर से हराया।
1969: कांग्रेस की हुई वापसी
इस चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शिव बक्स सिंह विजयी हुए। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के शिवराज सिंह को 9,896 वोटों के अंतर से हराया।
कांग्रेस ने दोहराई जीत
1974 के चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंशीलाल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ (BJS) के हकीम लाल को 1,547 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मुंशीलाल को 22,008 वोट मिले, जबकि हकीम लाल को 20,461 वोट मिले।
इस विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के सूरज राम सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गणेश चंद्र को 3,217 वोटों के अंतर से हराया।
1969: कांग्रेस की हुई वापसी
इस चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शिव बक्स सिंह विजयी हुए। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के शिवराज सिंह को 9,896 वोटों के अंतर से हराया।
कांग्रेस ने दोहराई जीत
1974 के चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंशीलाल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ (BJS) के हकीम लाल को 1,547 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मुंशीलाल को 22,008 वोट मिले, जबकि हकीम लाल को 20,461 वोट मिले।
आपातकाल का समय
1974 के चुनावों के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। इसके बाद जनता पार्टी की नई केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि कांग्रेस पार्टी देश की जनता का विश्वास खो चुकी है। इस आधार पर केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित कांग्रेस शासित 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर दिया और राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद राज्य में 1977 में दोबारा चुनाव हुए, जिसमें जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और राम नरेश यादव उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक सत्ता में नहीं रह सकी।
1977: पहली बार जनता पार्टी ने मारी बाजी
इस विधानसभा चुनाव में मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी (JNP) के हकीम लाल विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के मुंशीलाल को 34,494 वोटों के भारी अंतर से हराया। चुनाव में हकीम लाल को 43,291 वोट मिले, जबकि मुंशीलाल को 8,797 वोट मिले।
1974 के चुनावों के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। इसके बाद जनता पार्टी की नई केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि कांग्रेस पार्टी देश की जनता का विश्वास खो चुकी है। इस आधार पर केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित कांग्रेस शासित 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर दिया और राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद राज्य में 1977 में दोबारा चुनाव हुए, जिसमें जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और राम नरेश यादव उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक सत्ता में नहीं रह सकी।
1977: पहली बार जनता पार्टी ने मारी बाजी
इस विधानसभा चुनाव में मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी (JNP) के हकीम लाल विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के मुंशीलाल को 34,494 वोटों के भारी अंतर से हराया। चुनाव में हकीम लाल को 43,291 वोट मिले, जबकि मुंशीलाल को 8,797 वोट मिले।
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1980 का चुनाव
1980 के विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर इंडियन नेशनल कांग्रेस (इंदिरा) [कांग्रेस (आई)] के मुंशीलाल विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) के राम दीन को 14,771 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मुंशीलाल को 24,022 वोट मिले, जबकि राम दीन को 9,251 वोट मिले।
1985 में कांग्रेस ने फिर जीत किशनी सीट
वहीं 1985 के विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर कांग्रेस के राम सिंह विजयी हुए। उन्होंने लोकदल (LKD) के रामेश्वर दयाल को 1,387 वोटों के अंतर से हराया।
1989: किशनी सीट पर पहली बाज जीत जनता दल
इस विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर जनता दल (JD) के रामेश्वर दयाल बाल्मीकि विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के मुंशीलाल को 31,754 वोटों के भारी अंतर से हराया। चुनाव में रामेश्वर दयाल बाल्मीकि को 53,706 वोट मिले, जबकि मुंशीलाल को 21,952 वोट मिले।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में किशनी विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1980 के विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर इंडियन नेशनल कांग्रेस (इंदिरा) [कांग्रेस (आई)] के मुंशीलाल विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) के राम दीन को 14,771 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मुंशीलाल को 24,022 वोट मिले, जबकि राम दीन को 9,251 वोट मिले।
1985 में कांग्रेस ने फिर जीत किशनी सीट
वहीं 1985 के विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर कांग्रेस के राम सिंह विजयी हुए। उन्होंने लोकदल (LKD) के रामेश्वर दयाल को 1,387 वोटों के अंतर से हराया।
1989: किशनी सीट पर पहली बाज जीत जनता दल
इस विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर जनता दल (JD) के रामेश्वर दयाल बाल्मीकि विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के मुंशीलाल को 31,754 वोटों के भारी अंतर से हराया। चुनाव में रामेश्वर दयाल बाल्मीकि को 53,706 वोट मिले, जबकि मुंशीलाल को 21,952 वोट मिले।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में किशनी विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991 का चुनाव
इस विधानसभा चुनाव में मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट पर जनता पार्टी (एससी) के रामेश्वर दयाल बाल्मीकि विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सावित्री को 13,034 वोटों के अंतर से हराया।
1993: पहली बार जीती समाजवादी पार्टी
इस चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के रामेश्वर दयाल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के हकीम लाल वर्मा को 4,171 वोटों के अंतर से हराया।
सपा ने दोहराई जीत
1996 के विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के रामेश्वर दयाल बाल्मीकि विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के श्यामा शरण को 20,197 वोटों के भारी अंतर से हराया।
इसके बाद अगले चुनाव में सपा ने अपना चेहरा बदला और 2002 में संध्या कठेरिया को मैदान में उतारा।
संध्या कठेरिया ने 2002 में भाजपा के रामेश्वर दयाल वाल्मीकि को 14,559 वोटों से हराकर किशनी में सपा का कब्जा बरकरार रखा। 2007 में भी उन्होंने अपनी जीत दोहराई। इस बार बसपा के सुनील कुमार उनके सामने थे, जिन्हें संध्या ने 5,603 वोटों से मात दी। लगातार दो चुनाव जीतने के साथ सपा ने किशनी को अपने मजबूत राजनीतिक आधार में बदलना शुरू कर दिया।
इस विधानसभा चुनाव में मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट पर जनता पार्टी (एससी) के रामेश्वर दयाल बाल्मीकि विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सावित्री को 13,034 वोटों के अंतर से हराया।
1993: पहली बार जीती समाजवादी पार्टी
इस चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के रामेश्वर दयाल विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के हकीम लाल वर्मा को 4,171 वोटों के अंतर से हराया।
सपा ने दोहराई जीत
1996 के विधानसभा चुनाव में किशनी विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के रामेश्वर दयाल बाल्मीकि विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के श्यामा शरण को 20,197 वोटों के भारी अंतर से हराया।
इसके बाद अगले चुनाव में सपा ने अपना चेहरा बदला और 2002 में संध्या कठेरिया को मैदान में उतारा।
संध्या कठेरिया ने 2002 में भाजपा के रामेश्वर दयाल वाल्मीकि को 14,559 वोटों से हराकर किशनी में सपा का कब्जा बरकरार रखा। 2007 में भी उन्होंने अपनी जीत दोहराई। इस बार बसपा के सुनील कुमार उनके सामने थे, जिन्हें संध्या ने 5,603 वोटों से मात दी। लगातार दो चुनाव जीतने के साथ सपा ने किशनी को अपने मजबूत राजनीतिक आधार में बदलना शुरू कर दिया।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
चेहरा बदला, लेकिन सपा का कब्जा कायम रहा
2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने किशनी में एक बार फिर अपना चेहरा बदला। इस बार इंजी. बृजेश कठेरिया को मैदान में उतारा गया। उन्होंने बसपा की संध्या को 35,050 वोटों के बड़े अंतर से हराकर सीट अपने नाम कर ली। चुनाव में बृजेश कठेरिया को 77,113 वोट मिले, जबकि संध्या को 42,063 वोट मिले।
2012 के बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में किशनी विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के बृजेश कुमार विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के सुनील कुमार को 16,529 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बृजेश कुमार को 80,475 वोट मिले, जबकि सुनील कुमार को 63,946 वोट मिले।
2022 में फिर बृजेश कठेरिया की बड़ी जीत
2022 के विधानसभा चुनाव में किशनी की लड़ाई और दिलचस्प हो गई। सपा ने एक बार फिर इंजी. बृजेश कठेरिया पर भरोसा जताया, जबकि भाजपा ने डॉ. प्रिया रंजन आशु दिवाकर को मैदान में उतारा। बृजेश कठेरिया ने भाजपा की चुनौती को पीछे छोड़ते हुए 19,151 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। चुनाव में उन्हें 97,070 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 77,919 वोट मिले।
2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने किशनी में एक बार फिर अपना चेहरा बदला। इस बार इंजी. बृजेश कठेरिया को मैदान में उतारा गया। उन्होंने बसपा की संध्या को 35,050 वोटों के बड़े अंतर से हराकर सीट अपने नाम कर ली। चुनाव में बृजेश कठेरिया को 77,113 वोट मिले, जबकि संध्या को 42,063 वोट मिले।
2012 के बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में किशनी विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के बृजेश कुमार विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के सुनील कुमार को 16,529 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बृजेश कुमार को 80,475 वोट मिले, जबकि सुनील कुमार को 63,946 वोट मिले।
2022 में फिर बृजेश कठेरिया की बड़ी जीत
2022 के विधानसभा चुनाव में किशनी की लड़ाई और दिलचस्प हो गई। सपा ने एक बार फिर इंजी. बृजेश कठेरिया पर भरोसा जताया, जबकि भाजपा ने डॉ. प्रिया रंजन आशु दिवाकर को मैदान में उतारा। बृजेश कठेरिया ने भाजपा की चुनौती को पीछे छोड़ते हुए 19,151 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। चुनाव में उन्हें 97,070 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 77,919 वोट मिले।