Gangubai Kathiawadi Review: फोटोशॉप में तराशी तस्वीर सी ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’, बस आलिया रहीं अव्वल नंबर
संजय लीला भंसाली महिला सशक्तीकरण के विषय पर बनी एक और फिल्म लेकर अपने प्रशंसकों के सामने हैं। विवादों और भंसाली का नाता उनकी फ्लॉप के सिलसिले के बाद आई ‘गोलियों की रासलीला रामलीला’ से जो शुरू हुआ, अब तक चला आ रहा है। रिलीज के एक दिन पहले तक देश की सबसे बड़ी अदालत में इसे लेकर सुनवाई चलती रही। हीरोइन बनने का ख्वाब लेकर अपने वकील पिता का घर छोड़कर निकली किशोरी के बड़े होकर बंबई (अब मुंबई) में वेश्यावृत्ति के सबसे बड़े इलाके कमाठीपुरा की महारानी बनने की कहानी है फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’। ओपनिंग क्रेडिट्स में फिल्म का नाम हिंदी में ‘गंगुबाई काठियावाड़ी’ लिखकर आता है। ये हिंदी सिनेमा में हिंदी की दशा भी है और भ्रमित होती दिशा भी। फिल्म की कहानी रोचक है। किरदार दिलचस्प हैं। रंग रोगन भी बढ़िया है। लेकिन, इसकी अंतर्धारा दर्शकों को अपने साथ जोड़ पाने में विफल है। वजह, फिल्म की आत्मा मिसिंग है।
फिल्म की कहानी में काठियावाड़ की गंगा की तकदीर उसकी अपनी तदबीर से तय होती है। संजय लीला भंसाली को 25 साल हो गए हैं फिल्में निर्देशित करते। फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ की शुरुआत में उन्होंने बिरजू महाराज और लता मंगेशकर के अलावा अपनी पालतू की फोटो भी लगाई है। उनके सिनेमा का अपना एक मैदान रहा है। महाराष्ट्र, गुजरात या उनकी सीमाओं से सटे भारत को ही वह फिल्मों में दिखाते रहे हैं। उनके सिनेमा का एक टैम्पलेट सा बन गया है उनकी पिछली चार फिल्मों में और यही उनके सिनेमा की अब कमजोरी बनने लगा है। ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ की कहानी का चरम बिंदु है उसका वेश्यावृत्ति के व्यवसाय को वैधानिक दर्जा दिलाने की कोशिश के लिए तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मिलना। उसके व्यक्तित्व का उजला पक्ष ये है कि वह कमाठीपुरा की चार हजार महिलाओं को बेघर होने से बचाने में सफल रहती है और उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाने में भी उसकी जीत होती है। काले सफेद के बीच के रास्ते पर चलती इस फिल्म में यही गंगूबाई वाला ‘सफेद’ है। और, क्लाइमेक्स में जब भंसाली उसे देवी की तरह पेश करने की कोशिश करते हैं तो वहीं फिल्म के नमक का आयोडीन उड़ जाता है।
संजय लीला भंसाली इस फिल्म में माफिया क्वीन कहलाई एक महिला के महिमा मंडन की कोशिश करते दिखते हैं। वह अवैध तरीके से शराब बेचती है। पुलिस को रिश्वत देती है। और, उसके इन कृत्यों की वजह बनाने के लिए भंसाली उसकी एक बदमाश से बेइंतेहा पिटाई दिखाते हैं। ये पिटाई ही गंगूबाई को रहीम लाला तक पहुंचाती है। करीब ढाई घंटे की फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ टुकड़ों में प्रभावित करती है। अजय देवगन जब भी परदे पर आते हैं लोगों को कुछ बड़ा होने की उम्मीद बंधती है लेकिन उनका किरदार धूमकेतु जैसा है। कहानी के आसमान पर बस पल भर को चमकता है और चला जाता है। ये हिस्सा इसकी बरकत है। हुमा कुरैशी का कव्वाली पर थिरकरना इसकी राहत है। शांतनु माहेश्वरी संग कार के अंदर बना गाना ‘मेरी जां’ इसकी फितरत है। पहली नजर में गंगूबाई पर फिदा लेडीज टेलर के किरदार में शांतनु परफेक्ट दिखे। विजय राज को अरसे बाद कुछ ऐसा मिला, जिसमें उन्हें अपने अभिनय का अलग अंदाज दिखाने का मौका मिला और वह अपना असर छोड़ने में कामयाब रहे। जिम सरभ जैसे दमदार अभिनेता को फिल्म में ज्यादा कुछ करतब दिखाने का मौका नहीं मिला। हां, सीमा पाहवा और इंदिरा तिवारी ने अपना जलवा खूब दिखाया।
आलिया भट्ट ने बतौर कलाकार फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में अपना सब कुछ झोंक दिया है। ये फिल्म उनकी मेहनत के लिए ही देखी जा सकती है। हालांकि, तमाम दृश्यों में उनके अभिनय पर उनकी खराश भरी आवाज भारी पड़ती है। आजाद मैदान पर गंगूबाई के भाषण वाला सीन फिल्म के प्री क्लाइमेक्स में दर्शकों को बांध भी लेता है लेकिन फिल्म में कम से कम दो जगहों पर आलिया भट्ट को अपनी अदाकारी दिखाने का मौका मिलना चाहिए था, पर भंसाली वहां ये मौका उनको देते नहीं हैं। हर कलाकार की ख्वाहिश होती है कि वह एक शराबी का अभिनय दमदार तरीके से परदे पर करके दिखाए। दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान तक इसमें अव्वल नंबर रहे। लेकिन, आलिया भट्ट को जब ऐसा सीन मिलता है तो भंसाली कैमरे की तरफ उनकी पीठ दिखाते हैं और फेड आउट करके आगे बढ़ जाते हैं। यही नहीं नंदिनी को जो मौका समीर के घर छोड़कर जाने पर ‘हम दिल दे चुके सनम’ में विरह वेदना दिखाने का मिलता है, वैसा मौका आने पर वह गंगूबाई का चेहरा साड़ी के पल्लू से ढक देते हैं। आलिया भट्ट के अभिनय का इस फिल्म में चरमोत्कर्ष वह दृश्य है जिसमें वह बरसों बाद अपनी मां को ट्रंक कॉल करती है और कॉल ऑपरेटर बार बार बीत चुका समय बताती रहती है।
‘चौदहवीं का चांद’ और ‘मुगले आजम’ की रिलीज वाले साल के आसपास का बंबई दिखाती फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसका जरूरत से ज्यादा सम्मोहक होने की कोशिश करना है। यही संजय लीला भंसाली के निर्देशन के कमजोर होने की निशानी भी है। उनका कौशल छीज रहा है। कोठे की हर लड़की खूबसूरत है। एक जैसी सजावट में है। यूं लगता है कि जैसे पूरी फिल्म को पोस्ट प्रोडक्शन में एक ही ब्रश स्ट्रोक से एक जैसा रंग दिया गया है। संजय लीला भंसाली की बतौर निर्देशक ये पहली फिल्म होगी जिसमें कला निर्देशन प्रभाव नहीं छोड़ पाया है। कमाठीपुरा शुरू से आखिर तक नकली लगता रहता है। एक ही बग्घी का बार बार तयशुदा कैमरा एंगल के सामने से निकलना भी फिल्म के असर को कम करता है। सिनेमैटोग्राफर सुदीप चटर्जी और भंसाली की जुगलबंदी ‘गुजारिश’ के समय से चली आ रही है और ये पहली बार है जब दोनों की जुगलबंदी जादू जगाने में नाकाम रही है।
संजय लीला भंसाली का संगीत भी इस बार उतना दमदार नहीं हो पाया है जिसके लिए उन्होंने फिल्म ‘गुजारिश’ से लेकर ‘पद्मावत’ तक खूब तारीफें पाईं हैं। फिल्म के वीडियो एडीटर भी वह खुद ही हैं लिहाजा फिल्म के बीच बीच में सुस्त पड़ने का इल्जाम भी उन पर ही है। हुसैन जैदी और जेन बोर्जेस की कहानी पर उत्कर्षणी के साथ भंसाली की लिखी पटकथा में झोल हैं हां, प्रकाश कपाड़िया के साथ भंसाली के लिखे संवाद बार बार दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींचते रहते हैं। फिल्म के ठेठ गुजराती और मुंबइया अंदाज की फिल्म होने का फायदा इसे महाराष्ट्र और गुजरात में तो मिल सकता है लेकिन उत्तर भारत में फिल्म की अग्निपरीक्षा पहले दिन से ही होनी है।