'सपने बहुत थे, पैसे नहीं'; इंडस्ट्री में 30 साल पूरे होने पर भावुक हुईं रानी मुखर्जी, किए कई खुलासे
Rani Mukerji Exclusive Interview: एक्ट्रेस रानी मुखर्जी ने फिल्म इंडस्ट्री में अपने 30 साल पूरे कर लिए हैं। बहुत कम उम्र में फिल्मों की दुनिया में कदम रखने वाली रानी आज भी अपने सफर को उसी ईमानदारी से देखती हैं।
विस्तार
रानी मुखर्जी इन दिनों अपनी आगामी फिल्म 'मर्दानी 3' को लेकर सुर्खियों में हैं। यह फिल्म 30 जनवरी को दस्तक देगी। इसकी रिलीज से पहले अभिनेत्री ने हाल ही में उजाला से खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपने करियर, फैसलों और सीखों को लेकर खुलकर बात की। पढ़िए बातचीत के कुछ प्रमुख अंश:
‘16 साल की उम्र में फिल्म का ऑफर मिला और मैं डर गई थी’
30 साल बाद आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं, तो मुझे खुद हैरानी होती है कि मेरी जर्नी कितनी अलग रही है। पहली बार जब मुझे फिल्म जुगल हंसराज के अपोजिट 'आ गले लग जा' का ऑफर मिला, तब मेरी उम्र सिर्फ 16 साल थी। उस वक्त मैं दसवीं क्लास में पढ़ती थी और सच कहूं तो मुझे यह सुनकर झटका लगा था। मैंने सलीम अंकल से कहा भी था कि आप ये क्या कह रहे हैं।
‘उस दौर में फिल्मों में आना कोई सुरक्षित या सम्मानजनक करियर नहीं था’
उस समय फिल्म इंडस्ट्री का माहौल आज जैसा बिल्कुल नहीं था। फिल्मों में आना कोई सम्मानजनक करियर नहीं माना जाता था। यह ऐसा पेशा नहीं था, जिसे कोई परिवार खुशी-खुशी अपनाए। आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। आज हर कोई अभिनेता बनना चाहता है और परिवार भी पूरा साथ देता है, लेकिन तब ऐसा नहीं था।
‘मम्मी ने कहा था, मौका मिले तो कभी मना मत करना’
जब मैं बारहवीं में आई, तब मुझे 'राजा की आएगी बारात' का ऑफर मिला। मैंने यह फिल्म सिर्फ इसलिए स्वीकार की, क्योंकि मेरी मम्मी ने कहा था कि मौका कभी छोड़ना नहीं चाहिए। लेकिन मजेदार बात यह है कि जब मैंने स्क्रीन टेस्ट दिया, तो मेरी मम्मी खुद निर्माता सलीम अंकल के पास जाकर कह आई थीं कि मेरी बेटी बहुत खराब है, इसे मत लीजिए, इसे कुछ नहीं आता। लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। डायरेक्टर को पर्दे पर मेरा काम अच्छा लगा और सलीम अंकल को भी। मेरा चेहरा फोटोजेनिक है। वहीं से मेरी जर्नी शुरू हुई। उन्होंने मुझ पर जो भरोसा दिखाया, उसी भरोसे की वजह से आज मैं यहां तक पहुंची हूं।
'मैंने माता-पिता की जिंदगी का स्ट्रगल देखा था, चाह थी कि उन्हें एक बेहतर जिंदगी दे सकूं'
मैं शुरू से ही थोड़ी अलग रही हूं। लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं, इसका असर मुझ पर ज्यादा नहीं पड़ता था। मेरी मम्मी ने साफ कहा था कि अगर कुछ करना है, तो पूरे विश्वास के साथ करो। उस वक्त मेरा सबसे बड़ा फोकस मेरे माता-पिता थे। मैंने उनकी जिंदगी का स्ट्रगल देखा था, इसलिए बस यही चाह थी कि उन्हें एक बेहतर जिंदगी दे सकूं। उसी सोच में मेरे करियर के शुरुआती साल निकल गए।
‘जब एहसास हुआ कि लोग मुझसे बेहतर काम की उम्मीद कर रहे हैं’
फिर एक वक्त ऐसा आया जब मुझे एहसास हुआ कि मेरे फैंस मुझे बहुत प्यार करते हैं और मुझसे बेहतर काम की उम्मीद रखते हैं। तभी मुझे समझ आया कि मेरी जिम्मेदारी सिर्फ बेटी बनने की नहीं, बल्कि एक अभिनेता बनने की भी है। उसी मोड़ के बाद मैंने तय किया कि अब मुझे अच्छी कहानियां और मजबूत किरदार चुनने हैं। 'साथिया' के बाद मेरी फिल्मों की दिशा पूरी तरह बदल गई। तभी मुझे लगा कि मैं सिर्फ काम नहीं कर रही, बल्कि अपने किरदारों के जरिए खुद को भी तलाश रही हूं।
‘17 साल की उम्र में सिर्फ शूटिंग होती थी, जिंदगी नहीं’
मैंने 17 साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। उस वक्त जब मैं शूटिंग के लिए जाती थी, तो पूरा ध्यान सिर्फ काम पर होता था। हम कई जगहों पर जाते थे, लेकिन वहां घूमना नहीं होता था, बस शूटिंग होती थी। सुबह से शाम तक काम, फिर वापस आकर खाना और सो जाना। मन में अक्सर आता था कि काश कभी ऐसा मौका मिले कि इन जगहों को ठीक से देख सकूं, महसूस कर सकूं, एन्जॉय कर सकूं। आज वो मौका मुझे मिलता है। अब जब मैं यात्रा करती हूं, तो वहां का खाना खा पाती हूं, वहां की संस्कृति को जी पाती हूं।
‘पैसे भी नहीं होते थे, लेकिन सपने बहुत होते थे’
पहले हालात ऐसे नहीं थे कि हम किसी अच्छे रेस्तरां में जाकर खाना खा सकें। आज वो आजादी है। कई बार ऐसा भी हुआ कि पैसे होने के बावजूद हम पहले अपने अपनों के लिए लेते हैं, अपने लिए नहीं। लेकिन आज जब पीछे देखती हूं, तो लगता है कि जिंदगी ने धीरे-धीरे मेरी वो सारी छोटी अधूरी इच्छाएं पूरी की हैं।
'पहले मेरे माता पिता जो कहते वहीं करती .. लेकिन फिर नहीं'
'साथिया' से करीब आठ महीने पहले तक मेरी कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली थीं। उस वक्त सोशल मीडिया नहीं था। लोग चिट्ठियां लिखते थे। मुझे बहुत सारी चिट्ठियां आती थीं। मेरे डैडी कहते थे कि इन्हें पढ़ो और समझो कि लोग क्या कहना चाहते हैं। उन चिट्ठियों में सिर्फ प्यार नहीं होता था, बल्कि ईमानदार राय भी होती थी। लोग बताते थे कि कौन-सी फिल्म क्यों पसंद नहीं आई और क्या बेहतर हो सकता था। तभी मुझे पहली बार एहसास हुआ कि एक एक्टर के तौर पर मेरी कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। तब तक मैं अपने फैसले खुद नहीं ले रही थी। जो मेरे माता-पिता कहते थे, वही करती थी। लेकिन उसी वक्त मैंने तय किया कि अब मुझे खुद सोचकर फैसले लेने होंगे। मैंने मम्मी-पापा से कहा कि कुछ समय तक मैं कोई फिल्म साइन नहीं करना चाहती।
‘पहली बार पूरी स्क्रिप्ट हाथ में आई और सब कुछ बदल गया’
उसी दौरान मुझे 'मुझसे दोस्ती करोगे' का ऑफर मिला। पहली बार मेरे हाथ में पूरी बाउंड स्क्रिप्ट आई। उसे कहानी की तरह पढ़ना मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था। तभी मुझे समझ आया कि मुझे ऐसी ही फिल्में करनी हैं, जहां शुरुआत से अंत तक कहानी और किरदार की जर्नी साफ हो। वहीं से मेरी असली जर्नी शुरू हुई, जहां मैं सिर्फ फिल्में नहीं कर रही थी, बल्कि किरदारों को सच में जीने लगी थी।
'अय्या' फिल्म दिल बहुत करीब थी, लेकिन वक्त से पहले आ गई'
एक फिल्म है जिससे मुझे बहुत उम्मीदें थीं और जो मेरे दिल के बेहद करीब है। वो है 'अय्या'। यह एक बहुत प्यारी फिल्म थी। मुझे लगता है कि अगर आज की ऑडियंस के सामने वो फिल्म आए, तो लोग उसे ज्यादा खुले दिल से स्वीकार करेंगे।