Exclusive: 'बस में छेड़छाड़, सड़क पर थप्पड़'; तिलोत्तमा ने सुनाए दर्दनाक अनुभव, बोलीं- 'मुंबई ने मुझे संभाला'
Tillotama Shome Interview: अभिनेत्री तिलोत्तमा शोम अपनी बेबाकी के लिए जानी जाती हैं। इन दिनों, वे अपनी फिल्म 'इक्का' को लेकर चर्चा में है। हाल ही में अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने न सिर्फ अपने अभिनय सफर पर खुलकर बात की, बल्कि उन अनुभवों को भी साझा किया, जिन्होंने उन्हें भीतर तक बदल दिया।
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तिलोत्तमा शोम ने बताया कि कैसे बचपन से लेकर युवावस्था तक सार्वजनिक जगहों पर हुई छेड़छाड़ ने उनके भीतर डर और अविश्वास भर दिया था। लेकिन समय, रिश्तों और मुंबई शहर ने धीरे-धीरे उन्हें फिर से भरोसा करना सिखाया।
'बस में कोई शरीर रगड़ता था, सड़क पर चलते हुए थप्पड़ मार देता था'
पुराने दिनों को याद करते हुए तिलोत्तमा बताती हैं कि छेड़छाड़ उनके लिए कोई एक-दो घटनाएं नहीं थीं, बल्कि लगभग रोजमर्रा की सच्चाई थी। 'यह कोई एक-दो बार की बात नहीं थी। यह तो लगभग रोज होने वाली बात थी।
बस में कोई पीछे से आकर अपना शरीर रगड़ने लगता था। कभी कोई चिकोटी काट देता था, तो कभी सड़क पर चलते-चलते कोई थप्पड़ मारकर निकल जाता था।'
उन्होंने आगे कहा, 'वैसे, यह सब सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं था। बेंगलुरु में भी मेरे साथ ऐसा हुआ। मुझे आज भी याद है, मैं बहुत छोटी थी और स्कूल से घर लौट रही थी। तभी साइकिल पर आए एक आदमी ने मुझे पीछे से जकड़ लिया और फिर तुरंत वहां से भाग गया।'
'मैंने मां से कहा था कि स्कूल नहीं जाना, लेकिन उन्होंने मुझे लड़ना सिखाया'
उस घटना के बाद तिलोत्तमा इतनी डर गई थीं कि उन्होंने स्कूल जाना छोड़ने का मन बना लिया था। 'उस दिन घर आकर मैंने मां से कहा था कि मैं अब स्कूल नहीं जाऊंगी। लेकिन मां ने कहा कि अब तुम्हें सिर्फ स्कूल ही नहीं जाना है...बल्कि कराटे की क्लास भी करनी है। तुम्हें खुद अपनी लड़ाई लड़ना सीखना होगा।' वह कहती हैं कि समय के साथ उन्हें एहसास हुआ कि 'लड़ना' का मतलब भी बदलता जाता है। 'जैसे-जैसे वक्त बदला और जिंदगी में कुछ सुविधाएं आईं, वैसे-वैसे मुझे समझ आया कि लड़ना सीखने का मतलब भी बदल गया।'
'धीरे-धीरे लोगों पर भरोसा करना ही भूल गई थी'
बार-बार हुई इन घटनाओं ने तिलोत्तमा के भीतर ऐसा डर और अविश्वास भर दिया, जिससे बाहर निकलने में उन्हें वर्षों लग गए। 'मुझे लगता है कि अब मुझे अपनी कई पुरानी सोच बदलनी पड़ रही है। मैंने दिल्ली में 17 साल बिताए। हमारे पास अपनी गाड़ी नहीं थी, इसलिए स्कूल, कॉलेज और काम पर जाने के लिए बस और दूसरे सार्वजनिक साधनों से सफर करती थी। लगभग हर दिन कोई न कोई ऐसी घटना हो जाती थी, जो मन में डर छोड़ जाती थी।' वह आगे कहती हैं, 'धीरे-धीरे लोगों पर भरोसा न करना, हर वक्त सतर्क रहना और पहले शक करना, फिर रिएक्शन देना... यह सब मेरे स्वभाव का हिस्सा बन गया था। उस सोच से बाहर निकलने में मुझे बहुत समय लगा।'
'यह सिर्फ मेरी नहीं, लाखों महिलाओं की कहानी है'
अभिनेत्री मानती हैं कि उनका अनुभव किसी एक लड़की या महिला का अनुभव नहीं है। 'यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है। यह उन न जाने कितनी महिलाओं की कहानी है, जो हर दिन सार्वजनिक परिवहन में सफर करती हैं... हर सफर में अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहना पड़ता है। दुर्भाग्य से वहां सुरक्षा की कमी है। यह एक सच्चाई है और इसका असर हमारी पूरी सोच और अनुभवों पर पड़ता है।'
'मुंबई ने मुझे फिर से लोगों पर भरोसा करना सिखाया'
दिल्ली से बाहर निकलने और देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने के बाद अभिनेत्री को मुंबई में एक अलग तरह का सुकून मिला। वह कहती हैं, 'फिर मैं दिल्ली से बाहर निकली। देश और दुनिया के कई हिस्सों में गई। मुंबई आकर पहली बार लगा कि मैं पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हूं। अब मैं बेझिझक घर से निकल सकती हूं, देर रात लौट सकती हूं। यहां मेरे साथ कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। इस शहर ने मेरे भीतर का डर धीरे-धीरे कम किया। मुझे फिर से लोगों पर भरोसा करना सिखाया। क्योंकि मैं अपनी पूरी जिंदगी लोगों पर भरोसा करते हुए जीना पसंद करूंगी... न कि हर किसी पर शक करते हुए।'
'हर करीब आने वाला इंसान नुकसान नहीं पहुंचाता'
उनका मानना है कि जब इंसान खुद को डर से बाहर आने का मौका देता है, तभी भरोसा लौटना शुरू होता है। 'एक समय ऐसा भी आता है, जब आप उस डर और सोच से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। आप यह भरोसा करना शुरू करते हैं कि जो व्यक्ति आपके पास से गुजर रहा है या आपके करीब आ रहा है, वह आपको नुकसान नहीं पहुंचाएगा। जब आप भरोसा करना सीखते हैं, तो आपकी सोच भी बदलने लगती है। कई बार आपका भरोसा सही साबित होता है और वही इंसान आपका अच्छा दोस्त बन जाता है। वह आपको न नुकसान पहुंचाता है, न डराता है और न ही आपको परेशान करता है। ऐसे में इंसानियत पर आपका भरोसा फिर से लौटने लगता है।'
'मैं यह नहीं कह रही कि सब कुछ भूलकर आगे बढ़ जाओ'
तिलोत्तमा साफ करती हैं कि उनका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि दर्द को भुला दिया जाए। 'मुझे नहीं लगता कि इंसान को पूरी जिंदगी डर में जीना चाहिए, चाहे उसके साथ कितने भी बुरे अनुभव क्यों न हुए हों। लेकिन मैं यह भी नहीं कह रही कि बस सब कुछ भूलकर आगे बढ़ जाओ।' वह स्वीकार करती हैं कि उन्होंने भी लंबे समय तक कड़वाहट और अविश्वास के साथ जिंदगी बिताई। 'मैं खुद लंबे समय तक कड़वाहट और लोगों पर अविश्वास के साथ जीती रही हूं। लेकिन अब मैं पहले से ज्यादा हिम्मत, ज्यादा भरोसे और थोड़ा ज्यादा साहस लेकर जी रही हूं। अब मैं उन जगहों पर भी जा सकती हूं, जहां पहले जाने से डरती थी।'
'डर के आगे अब किरदार नहीं छोड़ती'
यही बदलाव उनके अभिनय में भी दिखाई देता है। 'चाहे वह कोई सड़क हो या फिर ऐसा किरदार, जिसके बारे में मुझे पता हो कि लोग उसे गलत समझ सकते हैं या उसे जज कर सकते हैं, फिर भी अब मैं ऐसे किरदार निभाने से नहीं डरती।'
'मैं एक खुरदरे पत्थर जैसी हो गई थी... अब जिंदगी ने मुझे मुलायम बना दिया'
मुंबई का जिक्र आते ही तिलोत्तमा के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। 'मुंबई ने मुझे इतना संभाला और मुझे इतना सुकून दिया कि अब जब मैं दिल्ली जाती हूं, तो वहां भी खुलकर आनंद ले पाती हूं। वहां की खूबसूरत इमारतें, लाजवाब खाना और ऐसे लोग, जिनकी दुनिया फिल्मों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, यह सब मुझे बहुत अच्छा लगता है'। फिर वह अपनी मां की कही एक बात साझा करती हैं। 'मेरी मां कहती थीं कि मैं एक खुरदरे पत्थर जैसी हो गई हूं, जैसे बहुत सख्त और लड़ाकू इंसान। और यह बात सच भी थी। लेकिन अब इस शहर ने मेरी जिंदगी के नुकीले किनारों को मुलायम कर दिया है। मुझे लगता है कि मेरे कंधों का बोझ हल्का हो गया है। मेरे चेहरे की सख्ती भी कम हो गई है।'
'मैं अपनी बाकी जिंदगी अविश्वास के साथ नहीं बिताना चाहती'
बातचीत खत्म होने तक तिलोत्तमा कई बार मुस्कुराईं, कई बार उनकी आवाज़ भर आई। लेकिन आखिर में उन्होंने जो कहा, शायद वही इस पूरी बातचीत का सबसे खूबसूरत सार था। 'आज मुझे लगता है कि दोस्त, जीवनसाथी और जिंदगी के अनुभव उस नदी की तरह हैं, जो बहते-बहते पत्थर को भी मुलायम बना देती है। मैं अपनी बाकी जिंदगी अविश्वास के साथ नहीं बिताना चाहती।'