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'अगर कभी कोई खटपट न हो, तो रिश्ते उबाऊ लगते हैं', परिवार को समय देने के सवाल पर बोले मनोज बाजपेयी
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सार
Manoj Bajpayee Exclusive Interview: 'द फैमिली मैन' में नजर आ रहे मनोज बाजपेयी ने अपने करियर और जिंदगी को लेकर अमर उजाला से कई पहलुओं पर बात की है। मनोज ने क्या कुछ कहा, चलिए जानते हैं।
मनोज बाजपेयी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
'द फैमिली मैन' के तीसरे पार्ट में इन दिनों नजर आ रहे अभिनेता मनोज बाजपेयी ने हाल ही में अमर उजाला से बात करते हुए कई पहलुओं पर बात की है। खास बातचीत में मनोज ने किरदार, ओटीटी के दौर, परिवार और इंडस्ट्री की चुनौतियों पर खुलकर बात की। पढ़ें मनोज ने क्या कुछ कहा।
इतने साल बाद जयदीप अहलावत के साथ स्क्रीन शेयर करने का अनुभव बताएं
उसके साथ मैंने पहली बार जिस फिल्म में काम किया था, वो थी चिट्टागोंग। उस फिल्म में सिर्फ वही नहीं बल्कि कई और लोग भी थे जो मेरे एफटीआईआई के बैचमेट थे - राजकुमार राव, विजय वर्मा…ये सब। वहीं से मैंने जयदीप को जाना। दरअसल, उस समय जब अनुराग से मेरी बात होती थी, तो उसकी एक आदत मैंने नोटिस की थी। जब भी हम बात करते और अगर वो कोई नई फिल्म बना रहा होता, तो मुझसे हमेशा एक रेकमेंडेशन मांगता था। अगर उसे किसी तरह का एक्टर चाहिए होता है, तो पूछ लेता है कि कौन इस रोल के लिए ठीक रहेगा। तो उस दिन भी बात हो रही थी और मैंने जयदीप का नाम सुझाया था। राजकुमार और विजय के बारे में उसे पहले से पता था। उस समय से मैं इन लोगों को जानता हूं। इनके शुरुआती दौर से जानता हूं। इसलिए एक जान-पहचान भी है और ये लोग मुझे इज्जत भी बहुत देते हैं। एक अच्छा संबंध है- एक्टर वाला संबंध। सीनियर और जूनियर दोनों तरह का रिश्ता है।
जब सेट पर आप और जयदीप साथ होते थे, तो माहौल कैसा रहता था?
सेट पर माहौल काफी अच्छा रहता था। ऑफ कैमरा भी हल्की-फुल्की बातें होती थीं। सच कहूं तो मैं ज्यादातर जब बात करता हूं, तो खाने की ही बात करता हूं… नहीं तो मैं अपने काम में डूबा रहता हूं। जब अगला शॉट होना होता, तो मेरा फोकस पूरी तरह उसी पर होता था और बीच-बीच में थोड़ी हंसी-मजाक भी हो जाती थी। मैं खुद मटन बनाता हूं, तो सेट पर भी कभी-कभी मटन बना लेता था। लेकिन जयदीप को मटन से ज्यादा चिकन पसंद है। तो हम दोनों के बीच ऐसी ही बातचीत होती थी जैसी साथी कलाकारों के बीच सामान्य रूप से होती है।
कभी काम से पहले परिवार को चुनना पड़ा?
परिवार और मेरा काम कभी एक-दूसरे के आड़े नहीं आते। इसका पूरा श्रेय मेरी पत्नी को जाता है। अगर वह कुछ चाहती हैं और मैं खाली होता हूं, तो मैं समय देने की पूरी कोशिश करता हूं। सच यह है कि वर्क और फैमिली का बैलेंस हर आदमी के लिए एक चुनौती है। सबसे आसान स्थिति उन लोगों की होती है जो सुबह ऑफिस जाते हैं और शाम को लौट आते हैं। वो काम भी कर लेते हैं और परिवार के साथ समय भी बिता पाते हैं। लेकिन फ्रीलांस जॉब में यह बहुत मुश्किल हो जाता है। यह उसी तरह का काम होता है जैसे इंटेलिजेंस के लोग करते हैं - जिनकी जरूरत हमेशा रहती है और जिनका काम 24 घंटे का होता है। यही वजह है कि श्रीकांत (किरदार का नाम) के लिए चीजें कठिन होती हैं और एक्टर्स के लिए भी। जब काम होता है तो अचानक बहुत काम होता है और जब छुट्टी होती है तो पूरी छुट्टी होती है। जो लोग ऑफिस में काम करते हैं, उनके लिए यह शायद थोड़ा आसान होता है, क्योंकि उन्हें पता होता है कि शाम को घर लौटना है। वहीं, हम कई-कई दिनों तक घर नहीं जा पाते और बाहर रहते हैं। ऐसे में अगर फैमिली समझदार और अंडरस्टैंडिंग न हो, तो घर संभालना मुश्किल हो जाता है। इसलिए मैं सारा श्रेय अपनी पत्नी को देता हूं।
यह खबर भी पढ़ें: Dharmendra Death News Live: धर्मेंद्र पंचतत्व में विलीन; घर पहुंच रहे सितारे; संस्कार में पहुंचा पूरा बॉलीवुड
क्या कभी ऐसा हुआ कि आपकी पत्नी ने आपके काम को लेकर कहा हो कि समय नहीं मिल रहा?
बैलेंस की बात करें तो शुरुआती दिनों में सचमुच मुश्किल थी। लेकिन क्योंकि निशा खुद भी एक्ट्रेस हैं, इसलिए वो इस प्रोफेशन की चुनौतियों को समझती हैं। उनकी समझ की वजह से बहुत सी बातें आसानी से संभल जाती हैं। मैं जब उनके साथ होता हूं, तो पूरी तरह उनके साथ रहता हूं। अभी दिसंबर में हम एक लंबी छुट्टी पर जाने वाले हैं। परिवार में बीच-बीच में हल्की तकरार तो होती ही है, और यह बिल्कुल नैचुरल है। अगर कभी कोई खटपट न हो, तो रिश्ते उबाऊ भी लग सकते हैं। जो लोग सुबह ऑफिस जाते हैं और शाम को लौट आते हैं, उनके घरों में भी ऐसा होता है। यह हर परिवार का हिस्सा है और इसी से रिश्ते जीवंत बने रहते हैं।
क्या ओटीटी अब कमर्शियल और ए-लिस्टर्स की ओर झुक रहा है?
मेरा मानना है कि मौका आज भी सबको मिल रहा है। ओटीटी में सिर्फ एक ही रास्ता नहीं बचा है। बस अब उनकी कोशिश है कि वे परिवारों तक पहुंचें, क्योंकि उनकी प्रायोरिटीज बदल गई हैं। लेकिन हर कहानी परिवार की नहीं हो सकती। एक कलाकार या फिल्ममेकर के तौर पर हमें अपना रास्ता खुद बनाना पड़ता है और यही सिलसिला हमेशा चलता रहेगा। वक्त बदलता है तो रास्ते भी बदलते हैं और फिल्ममेकर हमेशा अपनी दिशा खुद तलाशते रहते हैं। ये लड़ाई जारी रहती है और जारी रहनी भी चाहिए। हम भी लड़ते रहेंगे, क्योंकि किसी न किसी स्तर पर हर कलाकार अपने परिवार या समाज से थोड़ा विद्रोह करके ही इस दुनिया में आता है। यही विद्रोह उसकी प्रवृत्ति बन जाता है और इसी वजह से कलाकार हमेशा नए रास्ते खोजते रहते हैं।
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उसके साथ मैंने पहली बार जिस फिल्म में काम किया था, वो थी चिट्टागोंग। उस फिल्म में सिर्फ वही नहीं बल्कि कई और लोग भी थे जो मेरे एफटीआईआई के बैचमेट थे - राजकुमार राव, विजय वर्मा…ये सब। वहीं से मैंने जयदीप को जाना। दरअसल, उस समय जब अनुराग से मेरी बात होती थी, तो उसकी एक आदत मैंने नोटिस की थी। जब भी हम बात करते और अगर वो कोई नई फिल्म बना रहा होता, तो मुझसे हमेशा एक रेकमेंडेशन मांगता था। अगर उसे किसी तरह का एक्टर चाहिए होता है, तो पूछ लेता है कि कौन इस रोल के लिए ठीक रहेगा। तो उस दिन भी बात हो रही थी और मैंने जयदीप का नाम सुझाया था। राजकुमार और विजय के बारे में उसे पहले से पता था। उस समय से मैं इन लोगों को जानता हूं। इनके शुरुआती दौर से जानता हूं। इसलिए एक जान-पहचान भी है और ये लोग मुझे इज्जत भी बहुत देते हैं। एक अच्छा संबंध है- एक्टर वाला संबंध। सीनियर और जूनियर दोनों तरह का रिश्ता है।
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जब सेट पर आप और जयदीप साथ होते थे, तो माहौल कैसा रहता था?
सेट पर माहौल काफी अच्छा रहता था। ऑफ कैमरा भी हल्की-फुल्की बातें होती थीं। सच कहूं तो मैं ज्यादातर जब बात करता हूं, तो खाने की ही बात करता हूं… नहीं तो मैं अपने काम में डूबा रहता हूं। जब अगला शॉट होना होता, तो मेरा फोकस पूरी तरह उसी पर होता था और बीच-बीच में थोड़ी हंसी-मजाक भी हो जाती थी। मैं खुद मटन बनाता हूं, तो सेट पर भी कभी-कभी मटन बना लेता था। लेकिन जयदीप को मटन से ज्यादा चिकन पसंद है। तो हम दोनों के बीच ऐसी ही बातचीत होती थी जैसी साथी कलाकारों के बीच सामान्य रूप से होती है।
कभी काम से पहले परिवार को चुनना पड़ा?
परिवार और मेरा काम कभी एक-दूसरे के आड़े नहीं आते। इसका पूरा श्रेय मेरी पत्नी को जाता है। अगर वह कुछ चाहती हैं और मैं खाली होता हूं, तो मैं समय देने की पूरी कोशिश करता हूं। सच यह है कि वर्क और फैमिली का बैलेंस हर आदमी के लिए एक चुनौती है। सबसे आसान स्थिति उन लोगों की होती है जो सुबह ऑफिस जाते हैं और शाम को लौट आते हैं। वो काम भी कर लेते हैं और परिवार के साथ समय भी बिता पाते हैं। लेकिन फ्रीलांस जॉब में यह बहुत मुश्किल हो जाता है। यह उसी तरह का काम होता है जैसे इंटेलिजेंस के लोग करते हैं - जिनकी जरूरत हमेशा रहती है और जिनका काम 24 घंटे का होता है। यही वजह है कि श्रीकांत (किरदार का नाम) के लिए चीजें कठिन होती हैं और एक्टर्स के लिए भी। जब काम होता है तो अचानक बहुत काम होता है और जब छुट्टी होती है तो पूरी छुट्टी होती है। जो लोग ऑफिस में काम करते हैं, उनके लिए यह शायद थोड़ा आसान होता है, क्योंकि उन्हें पता होता है कि शाम को घर लौटना है। वहीं, हम कई-कई दिनों तक घर नहीं जा पाते और बाहर रहते हैं। ऐसे में अगर फैमिली समझदार और अंडरस्टैंडिंग न हो, तो घर संभालना मुश्किल हो जाता है। इसलिए मैं सारा श्रेय अपनी पत्नी को देता हूं।
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क्या कभी ऐसा हुआ कि आपकी पत्नी ने आपके काम को लेकर कहा हो कि समय नहीं मिल रहा?
बैलेंस की बात करें तो शुरुआती दिनों में सचमुच मुश्किल थी। लेकिन क्योंकि निशा खुद भी एक्ट्रेस हैं, इसलिए वो इस प्रोफेशन की चुनौतियों को समझती हैं। उनकी समझ की वजह से बहुत सी बातें आसानी से संभल जाती हैं। मैं जब उनके साथ होता हूं, तो पूरी तरह उनके साथ रहता हूं। अभी दिसंबर में हम एक लंबी छुट्टी पर जाने वाले हैं। परिवार में बीच-बीच में हल्की तकरार तो होती ही है, और यह बिल्कुल नैचुरल है। अगर कभी कोई खटपट न हो, तो रिश्ते उबाऊ भी लग सकते हैं। जो लोग सुबह ऑफिस जाते हैं और शाम को लौट आते हैं, उनके घरों में भी ऐसा होता है। यह हर परिवार का हिस्सा है और इसी से रिश्ते जीवंत बने रहते हैं।
क्या ओटीटी अब कमर्शियल और ए-लिस्टर्स की ओर झुक रहा है?
मेरा मानना है कि मौका आज भी सबको मिल रहा है। ओटीटी में सिर्फ एक ही रास्ता नहीं बचा है। बस अब उनकी कोशिश है कि वे परिवारों तक पहुंचें, क्योंकि उनकी प्रायोरिटीज बदल गई हैं। लेकिन हर कहानी परिवार की नहीं हो सकती। एक कलाकार या फिल्ममेकर के तौर पर हमें अपना रास्ता खुद बनाना पड़ता है और यही सिलसिला हमेशा चलता रहेगा। वक्त बदलता है तो रास्ते भी बदलते हैं और फिल्ममेकर हमेशा अपनी दिशा खुद तलाशते रहते हैं। ये लड़ाई जारी रहती है और जारी रहनी भी चाहिए। हम भी लड़ते रहेंगे, क्योंकि किसी न किसी स्तर पर हर कलाकार अपने परिवार या समाज से थोड़ा विद्रोह करके ही इस दुनिया में आता है। यही विद्रोह उसकी प्रवृत्ति बन जाता है और इसी वजह से कलाकार हमेशा नए रास्ते खोजते रहते हैं।

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