Jab Khuli Kitaab Review: पंकज कपूर और डिंपल कपाड़िया दमदार, इमोशंस से भरी फिल्म; आधे में भटकती है कहानी
Movie Jab Khuli Kitaab Review: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता पंकज कपूर और अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया फिल्म ‘जब खुली किताब’ में एक अलग किस्म की कहानी लेकर आए हैं। पढ़िए, इस फिल्म का रिव्यू।
विस्तार
'जब खुली किताब' एक फैमिली कॉमेडी ड्रामा फिल्म है। उम्र के आखिरी पड़ाव पर खड़े एक कपल की कहानी इसमें दिखाई गई है। इसमें उम्रदराज कपल शादी बचाने नहीं बल्कि तलाक लेने के लिए लड़ रहा है। यह फिल्म निर्देशक सौरभ शुक्ल के उसी नाम वाले थिएटर प्ले का अडैप्टेशन है, जिसे उन्होंने खुद लिखा और निर्देशित किया था। रंगमंच पर लीड रोल उन्होंने खुद ही निभाया था। उस प्ले में लीड रोल्स में उनके साथ इरावती हर्षे महादेव थीं। जबकि फिल्म में लीड रोल में पंकज कपूर और डिंपल कापड़िया नजर आते हैं।
कहानी
कहानी का केंद्र गोपाल (पंकज कपूर) और अनुसूया (डिंपल कापडिया) हैं। अनुसूया दो साल कोमा में रहने के बाद अचानक होश में आती है। वह धीरे-धीरे जिंदगी में लौटने लगती है। शुरू में सब कुछ सामान्य लगता है, लेकिन एक दिन वह गोपाल को पचास साल पुराने एक सच के बारे में बताती है। यह बात उनके लंबे रिश्ते की नींव हिला देती है। यह खुलासा गोपाल को भीतर तक तोड़ देता है। उसे लगता है कि उसने उम्रभर एक झूठ पर रिश्ता निभाया है और इतने साल से वह धोखे में जी रहा था। इसी गुस्से और टूटन में वह बूढी उम्र में तलाक लेने का फैसला करता है।
इसके बाद घर में उथल-पुथल शुरू हो जाती है। बच्चे उलझ जाते हैं। तलाक की प्रक्रिया के दौरान गोपाल वकील आर. के. नेगी (अपारशक्ति खुराना) से मिलता है। उनके ऑफिस में बैठकर होने वाली बातचीत फिल्म के सबसे दिलचस्प हिस्सों में से एक है। यहां गोपाल के कई साल पुराने जख्म खुलते हैं और अनुसूया का सच भी धीरे-धीरे सामने आता है। तलाक से शुरू हुआ यह सफर आखिर में उन्हें एक नई समझ की ओर ले जाता है। यहां रिश्ता टूटने के बजाय एक अलग रूप में बदलने लगता है।
फिल्म का सबसे मजबूत पहलू इसका अभिनय है। पंकज कपूर हर सीन में अपने किरदार की टूटन, नाराजगी और भ्रम को बहुत ईमानदारी से जीते हैं। उनकी परफॉर्मेंस शांत भी है और अंदर तक चुभने वाली भी। दूसरी तरफ डिंपल कापड़िया अनुसूया के रूप में गरिमा, पछतावा, हिम्मत और नरमी इन चारों भावनाओं को बहुत खूबसूरती से दिखाती हैं। दोनों की केमिस्ट्री रोमांटिक नहीं है। यह बहुत पुरानी, थकी हुई लेकिन गहरी साझेदारी जैसी लगती है, जो इस फिल्म की आत्मा बन जाती है। सपोर्टिंग कास्ट में समीर सोनी, नौहीद साइरुसी और मानसी पारेख ने भी अपने-अपने हिस्से का काम ईमानदारी से किया है।
निर्देशन
निर्देशन की बात करें तो सौरभ शुक्ल फिल्म को उसी थिएटर वाली सच्चाई के साथ पेश करते हैं। कई सीन बातचीत पर टिके हैं जहां सिर्फ दो लोग बैठकर बात कर रहे हैं। कहानी इन्हीं संवादों पर आगे बढ़ती है। पहले हाफ में फिल्म हल्की और दिलचस्प बनी रहती है। लेकिन दूसरे हिस्से में इसकी रफ्तार साफ तौर पर धीमी पड़ जाती है। कुछ भावनात्मक सीन इतने लंबे हैं कि फिल्म स्टेज ड्रामा जैसी महसूस होने लगती है। कई जगह किरदारों की गहराई और उनकी आपसी टकराहट असली नहीं लगती। फिल्म बीच-बीच में बोर भी करती है।
फिल्म की रफ्तार पूरे समय बराबर नहीं रहती। कई जगह कहानी ढीली पड़ जाती है। कुछ सीन जरूरत से ज्यादा खिंच जाते हैं। थिएटर वाली फील हर किसी को आसानी से कनेक्ट नहीं करा पाती। स्क्रीनप्ले में भी उतनी पकड़ नहीं है। कई बार इमोशनल और कॉमिक सीन के बीच बदलाव थोड़ा अचानक लगने लगता है। फिर भी रिश्तों की सच्चाई और किरदारों की ईमानदारी फिल्म को एक बार देखने लायक बना देती है।
देखें या नहीं
'जब खुली किताब' एक ऐसी फिल्म है जो उम्रदराज रिश्तों की सच्चाइयों को बिना किसी दिखावे के दिखाती है। इसमें जरूरत से ज्यादा ड्रामा नहीं है और न ही किसी तरह की बनावटी मिठास। यह फिल्म हर किसी की पसंद नहीं बनेगी। लेकिन जिन्हें बातचीत पर चलने वाली, धीरे-धीरे खुलती कहानी और इंसानी गलतियों पर आधारित फिल्में पसंद हैं, उन्हें यह काफी ईमानदार लगेगी। एक्टर्स का बढ़िया काम और असली भावनाएं फिल्म को सहारा देती हैं। लेकिन इसकी धीमी रफ्तार और थोड़ा बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले इसे पूरी तरह असरदार नहीं बनने देते।
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