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Subedaar Review: क्या देखने लायक है ‘सूबेदार’? कैसा है अनिल कपूर का एक्शन; पढ़ें फिल्म रिव्यू

Akash Khare Akash Khare
Updated Thu, 05 Mar 2026 03:34 PM IST
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सार

Subedaar Movie Review: प्राइम वीडियो पर अनिल कपूर की नई फिल्म सूबेदार रिलीज हुई है। 69 साल की उम्र में अनिल इस फिल्म में एक्शन करते दिख रहे है पर क्या यह फिल्म देखने लायक है भी ? यहां जानिए…
 

Subedaar Movie Review in Hindi movie rating anil kapoor aditya rawal saurabh shukla faisal malik mona singh su
फिल्म 'सूबेदार' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
सूबेदार
कलाकार
अनिल कपूर , राधिका मदान , सौरभ शुक्ला , आदित्य रावल , मोना सिंह , फैसल मलिक और खुशबू सुंदर
लेखक
सुरेश त्रिवेणी और प्रज्जवल चंद्रशेखर
निर्देशक
सुरेश त्रिवेणी
निर्माता
विक्रम मल्होत्रा , अनिल कपूर और सुरेश त्रिवेणी
रिलीज:
5 मार्च 2026
रेटिंग
2/5

विस्तार

‘दलदल’ और फिर ‘द ब्लफ’ के बाद एक बार फिर प्राइम वीडियो ने अपने दर्शकों को निराश किया है। इस दफा अनिल कपूर की फिल्म ‘सूबेदार’ के जरिए। फिल्म पूरी तरह से अनिल कपूर के कंधों पर टिकी हुई है। किरदार भी सिर्फ उनका ही लिखा गया है बाकी सब जबरन के ठूंसे गए हैं। विलेन दिखाए बेहद खूंखार जा रहे हैं पर वो कुछ भी खूंखार करते नहीं, सिर्फ हवा बाजी करते हैं और फिल्म की लंबाई बढ़ाते हैं। किरदार कई हैं, कास्टिंग भी अच्छी है पर निर्देशक न जाने क्या ही दिखाना चाहते हैं। खैर, यहां पढ़िए कैसी है फिल्म…
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Subedaar Movie Review in Hindi movie rating anil kapoor aditya rawal saurabh shukla faisal malik mona singh su
फिल्म 'सूबेदार' रिव्यू - फोटो : एक्स (ट्विटर)
कहानी
इस ढ़ाई घंटे लंबी फिल्म की कहानी एक सूबेदार अर्जुन मौर्य (अनिल कपूर) के इर्द-गिर्द बुनी गई है। अर्जुन अपनी बेटी श्यामा (राधिका मदान) के साथ रहते हैं और उनकी पत्नी (खुशबू सुंदर) की एक एक्सीडेंट में मौत हो चुकी है। बेटी को पिता से शिकायत है कि पिता उस वक्त घर पर नहीं थे जब उसकी मां का निधन हुआ। 
जिस शहर में अर्जुन रहता है वहां बबली दीदी (मोना सिंह) का राज है। बबली के पास कई घाट हैं जिनपर वो रेत खनन करती है। कोई भी उसके अवैध काम के बारे में बोलता है तो उसे मार दिया जाता है। बबली खुद जेल में बंद हैं पर उनके छोटे भाई प्रिंस (आदित्य रावल) बाहर खूब गुंडई मचा रहे हैं। प्रिंस और बबली का काम साफ्टी भैया संभालते हैं। 
अपने आधा जीवन सरहद पर बिता चुके अर्जुन जब रिटायर होकर घर लौटते हैं तो उनके दोस्त प्रभाकर (सौरभ शुक्ला) उनकी नौकरी प्रिंस के ड्राइवर के तौर पर लगा देते हैं। इसके बाद शुरू होता है असली खेल। अर्जुन को चुपचाप जीवन बिताने के लिए भी कभी भ्रष्ट्राचार तो कभी बबली और प्रिंस के गुंडों से लड़ना पड़ता है। एक रिटायर्ड सूबेदार इनसे लड़ते हुए अपने सम्मान और अपनी बेटी की रक्षा कैसे करता है, बस यही कहानी है। 
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फिल्म 'सूबेदार' रिव्यू - फोटो : एक्स (ट्विटर)
क्या अच्छा
पूरी फिल्म में अगर कुछ अच्छा है तो वो हैं अनिल कपूर और सौरभ शुक्ला। अनिल को इस उम्र एक्शन करते देख वाकई मजा आता है। उनके एक्शन सीन डिजाइन भी बड़े अच्छे से किए गए हैं क्योंकि यही फिल्म की यूएसपी भी हैं। 
बाकी सौरभ शुक्ला का रोल छोटा है पर उन्होंने फिल्म को आत्मा दी है। लोकल बुंदेलखंडी अच्छी उन्होंने ही बोली है और वो किरदार में पूरे जमे हैं। उन्हें और स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था।

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फिल्म 'सूबेदार' रिव्यू - फोटो : एक्स (ट्विटर)
क्या बुरा
फिल्म बहुत धीमी है। शुरू के 40 मिनट तो सिर्फ कहानी को डेवलप किया गया है। जिन्हें बाहुबली दिखाया गया वो सब वही हरकतें कर रहे हैं जो इससे पहले कई वेब सीरीज और फिल्मों में देख चुके हैं। 
भौकाल बनाने के लिए दो चार वेबजह के मर्डर और फिर मर्डर करके बोलना कि गाना बजाओ और नाचो। ऐसी हरकतें करवाकर निर्देशक आपको बताना चाहते हैं कि विलेन बहुत ही क्रूर है। पर मजेदार बात यह है कि जिसे इतना बड़ा माफिया और क्रूर दिखाया गया है वो ही आगे जाकर बीच चौराहे पर अपने ही आदमियों के सामने पिट भी जाता है। 
फिर चार बार उसे बदला लेने का मौका मिलता है पर वो बंदूक हाथ में लेकर बस बकवास करता है, किसी को मारता नहीं है। एक विलेन जेल में बैठे बैठे पर सब पर गुस्सा उतारती रहती है। हीरो का गुस्सा इतना देर से खौलता है कि आधी फिल्म निकल चुकी हाेती है और ये सब देखकर आप ऊब जाते हैं। 
बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर आधारित इस कहानी में बस एक गाना ‘लल्ला को मना करी थी..’ ही दमदार है। बाकी फिल्म में गलती से ही किसी ने एक पूरा बुंदेलखंडी डायलॉग बोला हाेगा। का, काए और तुमाए को हिंदी में जोड़ देना बुंदेलखंडी नहीं कहलाती। और सबसे दुखद यह है कि बड़े से बड़े कलाकारों का भी निर्देशक ने कोई फायदा नहीं उठाया। 
कुल मिलाकर इस फिल्म की राइटिंग ही कमजोर है। बाकी इसे देखते वक्त कई दफा आपको यह महसूस होगा कि ये वेब सीरीज के तौर पर तैयार की गई होगी और शायद बाद में फिल्म की तरह रिलीज की गई है। क्लाइमैक्स भी बकवास है और अगले पार्ट के लिए जो हिंट दी है वो तो पता नहीं कैसे ही झेली जाएगी।

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सूबेदार - फोटो : यूट्यूब
अभिनय
अनिल कपूर ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। उनके एक्शन, इमोशन और एटीट्यूड सबकुछ दिल में उतरता है। बेटी के किरदार में राधिका मदान ठीक ही हैं। गुंडों से जूझने वाले सीन में उन्होंने भी तगड़ा एक्शन किया है। सौरभ शुक्ला तो कमाल करते ही हैं। 
आदित्य रावल एक बार फिर दुखी करते है। उनके पास यहां बहुत बड़ा मौका था, वो अनिल कपूर के सामने पूरी फिल्म में एकल विलेन बने हैं पर वो इसे भुना नहीं पाए। भले ही उन्होंने बुंदेलखंडी सीखने में मेहनत की होगी पर एक्सप्रेशन पर मेहनत करना बाकी है। वो ‘मिर्जापुर’ के मुन्ना भैया से कुछ ज्यादा ही प्रेरित हो गए पर ये भूल गए कि उनके किरदार में इमोशंस की लेयर थी। यहां किरदार वैसा नहीं है। बाकी वो शक्ल से भी इतने खूंखार नहीं लगते कि उनसे डरा जाए। ‘हैप्पी पटेल’ के बाद माेन सिंह एक बार विलेन और माफिया के रोल में हैं और यहां भी वो कमजोर ही है। गिने चुने पांच से छह सीन में वो बस निराश ही बनी रहती हैं। उनका गुस्सा भी फर्जी ही लगता है। फैसल मलिक का टैलेंट यहां बुरी तरह वेस्ट हुआ है। अगर निर्देशक आदित्य वाला किरदार फैसल से करवा देते तो शायद यह फिल्म कुछ और बेहतर हाेती। खुशबू सुंदर फिल्म में सिर्फ एक सीन के लिए हैं।

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सूबेदार - फोटो : यूट्यूब
निर्देशन
स्क्रिप्ट के बाद फिल्म की दूसरी कमजोर कडी इसके निर्देशक ही हैं। पता नहीं उन्होंने क्या सोचकर आज के दौर में इतनी स्लाे फिल्म बनाई है। फिल्म लंबी भी बहुत ज्यादा है। म्यूजिक में भी कुछ खास नहीं है। इतने बड़े माफिया और उसकी फौज का सामना एक अकेला सूबेदार कर लेता है और पूरी फिल्म में एक भी ऐसा सीन नहीं है जहां आपको खौफ महसूस हो। इतना वक्त लेकर भी ऐसा माहौल न बना पाना इस फिल्म की सबसे बडी कमजोरी है।

देखें या नहीं
अनिल के बड़े फैन हैं और क्राइम वाली फिल्में पसंद करते हैं तो एक बार देखना शुरू कर सकते हैं। बोर न हुए तो क्या पता आप भी पूरी फिल्म देख डालें। स्किप करना पड़े तो समझिएगा कि यह रिव्यू बढ़िया था।
 
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