Undekhi-The Final Battle Review: फैलाव में उलझी कहानी, मगर कुछ हिस्से अब भी असर छोड़ते हैं
Undekhi The Final Battle Review: वेब सीरीज 'अनदेखी- द फाइनल बैटल' रिलीज हो चुकी है। यह कैसी है? यहां पढ़िए पूरा रिव्यू
विस्तार
'अनदेखी' जब 2020 में आई थी, तब इसने बिना किसी लागलपेट के एक ऐसी दुनिया दिखाई थी जहां पावर का मतलब था खुलेआम गलत करना और बच निकलना। पापाजी (हर्ष छाया) का वह शुरुआती सीन आज भी याद है, जहां एक इंसान की जान लेना उनके लिए बस एक पल का फैसला था। वही बेधड़क अंदाज इस शो की पहचान बना। दूसरे और तीसरे सीजन में कहानी ने अपने पैर फैलाए, लेकिन कंट्रोल नहीं खोया। रिंकू (सूरज शर्मा) जैसे किरदार धीरे धीरे खेल के असली खिलाड़ी बनते गए और बरुण घोष (दिब्येंदु भट्टाचार्य) उस सिस्टम के खिलाफ खड़े रहने वाले जिद्दी चेहरे बने रहे। अब ‘द फाइनल बैटल’ में आकर लगता है कि मेकर्स ने सोचा, जितना हो सके उतना डाल दो। नतीजा यह है कि कहानी बड़ी तो हो जाती है, लेकिन कसाव खो देती है।
कहानी
इस बार कहानी पांच साल आगे बढ़ती है और शुरुआत से ही ऐसा लगता है कि सब कुछ एक साथ चल रहा है। अतवाल परिवार की सफाई चल रही है, अंदरूनी लड़ाई जारी है, बाहर नया धंधा शुरू हो गया है और ऊपर से मानव तस्करी का ट्रैक भी जोड़ दिया गया है। समस्या यह है कि कहानी एक दिशा पकड़ने के बजाय हर तरफ भागती है। हर एपिसोड में कुछ बड़ा होता है, लेकिन वह मिलकर बड़ा नहीं बनता। ऐसा लगता है जैसे किसी ने कई कहानियां एक ही थाली में परोस दी हों, और आप समझ ही नहीं पाते कि असली स्वाद किसका है। रिंकू (सूरज शर्मा) का ट्रैक सबसे साफ और दिलचस्प रहता है। बाकी चीजें या तो अधूरी लगती हैं या फिर बस शोर पैदा करती हैं।
अभिनय
हर्ष छाया इस बार अपने ही किरदार का रीमिक्स लगते हैं। वही गुस्सा, वही गालियां, लेकिन अब उसमें नया कुछ नहीं है। डराने के बजाय कई बार यह ओवरडोज जैसा लगने लगता है। दिब्येंदु भट्टाचार्य का हाल और खराब है। जो किरदार पहले इस कहानी का संतुलन था, वह यहां आकर साइड रोल बन जाता है। कई बार लगता है कि वह खुद मान चुके हैं कि अब कुछ नहीं बदलने वाला। सूरज शर्मा इस पूरे सीजन का अकेला ठोस पिलर है। शांत, ठंडा और हिसाबी। उनका अभिनय इतना कंट्रोल्ड है कि बाकी का शोर और ज्यादा साफ सुनाई देता है। नए किरदारों में विक्रम (गौतम रोडे), नताशा (शिवज्योति राजपूत) और डीजे (साकिब अयूब) आते हैं। लेकिन सच यह है कि इनमें से आधे किरदार आते ही इसलिए हैं कि कहानी और उलझे, सुलझे नहीं।
निर्देशन
निर्देशक आशीष आर शुक्ला ने स्केल बढ़ाया है, इसमें कोई शक नहीं। लोकेशन बढ़िया हैं, कैमरा काम करता है, माहौल बनता है। लेकिन यह सब तभी काम आता है जब कहानी साथ दे। यहां कई सीन ऐसे हैं जो अलग से देखो तो बढ़िया लगते हैं, लेकिन पूरी सीरीज में जोड़ो तो वह असर नहीं बनता। कुछ एपिसोड तो ऐसे लगते हैं जैसे कहानी रुकी हुई है और बस किरदार इधर उधर घूम रहे हैं।
पॉजिटिव पॉइंट
सीरीज पूरी तरह अपनी पहचान नहीं खोती। इसका डार्क टोन अब भी बना रहता है और रिंकू का किरदार इसे संभालता है। कुछ सीन ऐसे हैं जो आपको पुराने सीजन की याद दिलाते हैं और थोड़ी देर के लिए कहानी फिर से पकड़ में आती है।
नेगेटिव पॉइंट
सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि कहानी जरूरत से ज्यादा भर दी गई है। इतने किरदार और सबप्लॉट जोड़ दिए गए हैं कि कुछ भी पूरी तरह असर नहीं छोड़ पाता। पापाजी का किरदार दोहराव में फंस जाता है और बरुण घोष की भूमिका अपनी धार खो देती है। लगातार होती हिंसा का असर भी कम हो जाता है, क्योंकि दर्शक उससे जुड़ ही नहीं पाता। हिंसा इतनी बार होती है कि उसका असर ही खत्म हो जाता है।
देखें या नहीं
अगर आपने पहले के सीजन देखे हैं, तो आप इसे छोड़ नहीं पाएंगे। जानना चाहेंगे कि आखिर होता क्या है। लेकिन अगर आप उम्मीद कर रहे हैं कि यह सीजन आपको सीट से चिपका देगा, तो थोड़ा संभलकर बैठिए। ‘अनदेखी: द फाइनल बैटल’ वह सीजन है जहां कहानी खत्म होनी चाहिए थी, लेकिन उसे और घुमा दिया गया। यह खराब नहीं है, लेकिन उतना टाइट भी नहीं है जितना होना चाहिए था। सीधी बात, यह सीजन चलता है क्योंकि इसके किरदार अभी भी दम रखते हैं, न कि इसलिए कि इसकी कहानी पूरी तरह सही बैठती है।
