Glory Web Series Review: बॉक्सिंग, एक्शन और ड्रामा सब है; फिर क्यों असरदार नहीं लगती ‘ग्लोरी’ की कहानी?
Web Series Glory Review: पुलकित सम्राट और दिव्येंदु स्टारर सीरीज ‘ग्लोरी’ में मेकर्स ने एक्शन, ड्रामा की भरपूर डोज दर्शकों के लिए रखी। इसके बावजूद यह वेब सीरीज कहां पर कमजोर पड़ी? पढ़िए वेब सीरीज ‘ग्लोरी’ का रिव्यू।
विस्तार
ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई वेब सीरीज ‘ग्लोरी’ की कहानी कागज काफी दमदार लगती है, लेकिन स्क्रीन पर कई मामलों में यह सात एपिसोड की सीरीज पिछड़ती नजर आती है। बॉक्सिंग की राजनीति, ओलंपिक तक पहुंचने की होड़ और एक पिता की अति महत्वाकांक्षा, जैसी कई चीजें इस सीरीज में मौजूद हैं। लेकिन स्क्रीन पर आते ही इस कहानी का दम धीरे-धीरे निकलता हुआ नजर आता है। कई मजबूत विषय होने के बावजूद सीरीज उन्हें पकड़ नहीं पाती और कई बार सिर्फ दिखावे तक सिमट जाती है।
कहानी शक्तिगढ़ नाम के एक काल्पनिक शहर में सेट है, जहां बॉक्सिंग, परिवार और अपराध की दुनिया साथ-साथ चलती है। इस सीरीज में पुलकित सम्राट, दिव्येंदु, सुविंदर विक्की, जन्नत जुबैर, कश्मीरा परदेसी और आशुतोष राणा जैसे कलाकार मौजूद हैं। कहानी बहुत कुछ कहना चाहती है, लेकिन यही कोशिश इसे उलझा देती है।
कहानी
सीरीज की कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अंदर से पहले ही बिखरा हुआ है। रघुबीर सिंह (सुविंदर विक्की) एक सख्त बॉक्सिंग कोच हैं, जिनकी सोच और व्यवहार की वजह से उनके बेटे उनसे दूर हो चुके हैं। देव (दिव्येंदु) और रवि (पुलकित सम्राट) अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं।
बहन गुड़िया (जन्नत जुबैर) पर हमला दोनों भाइयों को वापस खींच लाता है। यहां से कहानी एक जांच में बदलती है और धीरे-धीरे इसमें राजनीति, अपराध और बॉक्सिंग की दुनिया जुड़ती जाती है। शुरुआत में यह सब दिलचस्प लगता है और पहला एपिसोड ध्यान खींचता है। लेकिन इसके बाद कहानी अपने ही बनाए जाल में फंसने लगती है। ट्विस्ट आते हैं, लेकिन कई बार वे कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसे और उलझा देते हैं। ऐसा लगता है कि सीरीज हर एपिसोड में कुछ नया दिखाने के चक्कर में अपनी पकड़ खो देती है।
सबसे बड़ी कमी यह है कि जिस भावनात्मक आधार पर कहानी टिकनी चाहिए थी, वही कमजोर है। रिश्ते दिखते हैं, लेकिन महसूस नहीं होते।
अभिनय
दिव्येंदु इस सीरीज की सबसे मजबूत कड़ी हैं। देव के किरदार में उनका अभिनय सधा हुआ है और वह अपने किरदार की बेचैनी को अच्छे से दिखाते हैं। कई जगह वही सीरीज को संभालते नजर आते हैं। पुलकित सम्राट ने भी ठीक काम किया है, लेकिन उनका किरदार उतना गहरा नहीं बन पाता। जन्नत जुबैर का रोल अहम होने के बावजूद सीमित रह जाता है। सुविंदर विक्की जैसे कलाकार को भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया गया। उनका किरदार जितना असरदार हो सकता था, उतना बन नहीं पाता।
सपोर्टिंग कास्ट यहां सबसे बड़ी कमजोरी बनती है। सिकंदर खेर का कूकी वाला किरदार कहानी से बाहर का लगता है। आशुतोष राणा और यशपाल शर्मा जैसे कलाकार भी कई जगह जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाते हैं। कश्मीरा परदेसी का किरदार बनावटी लगता है और सयानी गुप्ता का रोल सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया बनकर रह जाता है।
निर्देशन
निर्देशन में स्टाइल तो है, लेकिन कंट्रोल की कमी साफ दिखती है। सीरीज को तेज और आकर्षक बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन कई जगह यह सिर्फ दिखावा लगती है। एक्शन और बॉक्सिंग सीन ठीक हैं, लेकिन कई हिंसा वाले दृश्य ऐसे लगते हैं जो सिर्फ चौंकाने के लिए डाले गए हैं। इससे कहानी का असर कम हो जाता है।
नकारात्मक पक्ष
सीरीज की सबसे बड़ी समस्या इसका बिखराव है। यह तय नहीं कर पाती कि इसे किस पर ज्यादा ध्यान देना है। रिश्तों को गहराई से नहीं दिखाया गया। पिता और बेटों के बीच का टकराव कहानी का केंद्र होना चाहिए था, लेकिन वह असरदार नहीं बनता। कई किरदार और ट्रैक ऐसे हैं जो सीरीज में आते हैं, लेकिन कोई खास असर छोड़कर नहीं पाते हैं। बॉक्सिंग जैसा अहम विषय भी कई जगह सिर्फ बैकग्राउंड बनकर रह जाता है।
देखें या नहीं
अगर आपको सिर्फ इतना चाहिए कि हर एपिसोड में कुछ होता रहे, तो ‘ग्लोरी’ सीरीज आपको समय काटने का विकल्प दे सकती है। लेकिन अगर आप ऐसी कहानी देखना चाहते हैं जो खत्म होने के बाद भी याद रहे, तो यह सीरीज आपको निराश कर सकती है। यह सीरीज आपको देखते वक्त व्यस्त रखती है, लेकिन खत्म होते ही दिमाग से निकल जाती है।
कुल मिलाकर, ‘ग्लोरी' में दम तो था, लेकिन यह अपने ही बोझ के नीचे दब जाती है। अच्छी कास्ट और मजबूत विषय होने के बावजूद यह सीरीज औसत से ऊपर नहीं उठ पाती।
