Matka King Review: बड़ा कैनवास, विजय वर्मा और 1960 का दौर; जानें ‘मटका किंग’ ने खेली कैसी बाजी? पढ़ें रिव्यू
Matka King Web Series Review: विजय वर्मा की मच अवेटेड वेब सीरीज ‘मटका किंग’ आज रिलीज हो गई है। सीरीज देखने से पहले यहां पढ़ें रिव्यू और जानिए कैसी है यह सीरीज?
विस्तार
हर दौर की अपनी एक कहानी होती है। मटका किंग 1960 के दशक के बॉम्बे को दिखाने की कोशिश करती है। उस समय पैसा, किस्मत और सिस्टम एक अलग ही खेल खेल रहे थे। इसी दौर में सेट यह वेब सीरीज जुए के एक नेटवर्क को दिखाती है। इस खेल ने लोगों की किस्मत भी बदली और पूरे देश पर असर भी डाला।
विजय वर्मा स्टारर यह शो बड़े कैनवास पर कहानी कहने की कोशिश करता है। इसमें महत्वाकांक्षा, सत्ता, रिश्ते और सिस्टम सब कुछ शामिल है। शुरुआत मजबूत है और आपको अपनी दुनिया में खींच लेती है लेकिन जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसकी पकड़ कमजोर पड़ने लगती है।
कहानी
कहानी बृज भट्ट (विजय वर्मा) की है। वह लालजीभाई (गुलशन ग्रोवर) के यहां एक साधारण कर्मचारी होता है। लेकिन बृज सिर्फ आदेश मानने वाला आदमी नहीं है। वह खेल को समझता है, सिस्टम को पढ़ता है और मौके पहचानना जानता है। सीरीज में मटका को पत्तों के खेल के रूप में दिखाया गया है, जहां नंबर, दांव और किस्मत का पूरा खेल चलता है। बृज धीरे धीरे इस सिस्टम को समझता है और अपनी अलग पहचान बनाता है। आगे चलकर वही इस दुनिया का बड़ा खिलाड़ी बन जाता है।
सीरीज की खास बात यह है कि यह सिर्फ जुए तक सीमित नहीं रहती। यह दिखाती है कि कैसे यह खेल क्रिकेट, पॉलिटिक्स, एंटरटेनमेंट, मिल वर्कर्स और अंडरवर्ल्ड की दुनिया तक फैलता है। साथ ही एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट का ट्रैक भी चलता है, जो इस पूरे नेटवर्क को सामने लाना चाहता है। इमरजेंसी के दौर की झलक भी कहानी में दिखाई देती है। यह हिस्सा कहानी को थोड़ा बड़ा बनाने की कोशिश करता है। हालांकि, इसे ज्यादा गहराई से नहीं दिखाया गया है।
शुरुआत के एपिसोड्स में मटके का खेल और बृज का ऊपर उठना काफी दिलचस्प लगता है। लेकिन कुछ एपिसोड के बाद कहानी प्रेडिक्टेबल हो जाती है। आपको पहले से अंदाजा होने लगता है कि आगे क्या होगा। ट्विस्ट और सरप्राइज की कमी साफ महसूस होती है। कई जगह वही पुराने क्राइम ड्रामा वाले मोड़ देखने को मिलते हैं। जैसे धोखा, दुश्मनी और गिरावट। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सीरीज बहुत कुछ दिखाना चाहती है, लेकिन किसी एक चीज को पूरी गहराई से नहीं पकड़ पाती।
एक्टिंग
एक्टिंग की बात करें तो विजय वर्मा इस सीरीज की जान हैं। वह बृज भट्ट के किरदार में कंट्रोल्ड और सधा हुआ प्रदर्शन देते हैं। उनका ट्रांसफॉर्मेशन एक छोटे खिलाड़ी से बड़े नाम तक रियल लगता है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उनके एक्सप्रेशन्स दोहराव वाले लगने लगते हैं। उनकी इमोशनल रेंज भी सीमित महसूस होती है। ऐसा लगता है कि किरदार में और गहराई आ सकती थी।
साई ताम्हणकर, जो बृज की पत्नी बरखा के किरदार में हैं, उन्हें स्क्रीन टाइम तो अच्छा मिला है। लेकिन उनका किरदार कहानी में खास असर नहीं डालता। वह पूरी सीरीज में एक सपोर्टिंग पत्नी तक सीमित रह जाती हैं।
कृतिका कामरा का गुलरुख का किरदार अच्छा लग सकता था। वह एक अमीर, स्टाइलिश और महत्वाकांक्षी पारसी विधवा हैं। शुरुआत में उनका रोल ध्यान खींचता है, लेकिन आगे चलकर उसे उतनी गहराई नहीं मिलती। उनकी और बृज की केमिस्ट्री भी कोई खास छाप नहीं छोड़ती।
सिद्धार्थ जाधव जरूर सरप्राइज देते हैं। जहां भी आते हैं, ध्यान खींचते हैं। गुलशन ग्रोवर की शुरुआत काफी दमदार है। लेकिन बाद में उनका किरदार कमजोर पड़ जाता है। साइरस सहुकार और जेमी लीवर भी सीरीज में नजर आते हैं। हालांकि, उन्हें यादगार बनाने का मौका नहीं मिलता।
डायरेक्शन, लेखन और स्क्रीनप्ले
डायरेक्शन की बात करें तो नागराज मंजुले से उम्मीदें ज्यादा थीं। कुछ सीन अच्छे बने हैं, खासकर मटका के खेल वाले। उन सीन में तनाव महसूस होता है। लेकिन पूरी सीरीज में एक जैसी पकड़ नहीं बन पाती।
असल समस्या लेखन और स्क्रीनप्ले में है। कहानी कई लेयर्स को छूती है। इसमें एक आदमी का सफर है, सिस्टम का फैलाव है और समाज पर असर भी है। लेकिन किसी भी लेयर को पूरी तरह विकसित नहीं किया गया। स्क्रीनप्ले भी असंतुलित है। शुरुआत तेज है लेकिन बीच के एपिसोड्स खिंचते हैं। कई सबप्लॉट्स कहानी की गति को धीमा कर देते हैं।
म्यूजिक
म्यूजिक की बात करें तो इसका संगीत अमित त्रिवेदी, पराग छाबड़ा, बी प्रसन्ना और अजय जयंती ने मिलकर तैयार किया है। बैकग्राउंड स्कोर केतन सोधा का है। होगा सवेरा, भागा रे, रास्ता, धागा धागा और टाइटल ट्रैक जैसे गाने माहौल बनाने में मदद करते हैं। ये 60 के दशक की फील देते हैं। लेकिन कोई भी गाना लंबे समय तक याद नहीं रहता।
देखें या नहीं?
कुल मिलाकर मटका किंग एक ऐसी सीरीज है जो आपको अपनी दुनिया दिखाती तो है, लेकिन उससे पूरी तरह जोड़ नहीं पाती। कई जगह लगता है कि कहानी और बेहतर हो सकती थी। लेकिन वह वहीं रुक जाती है। कुछ सीन अच्छे लगते हैं। कुछ किरदार ध्यान खींचते हैं।
अगर आप हल्की-फुल्की क्राइम ड्रामा सीरीज देखना चाहते हैं और 60 के दशक की मुंबई की दुनिया आपको दिलचस्प लगती है। तो मटका किंग एक बार देख सकते हैं। यह आपको पूरी तरह निराश नहीं करेगी।
लेकिन अगर आप ऐसी सीरीज ढूंढ रहे हैं जिसमें हर एपिसोड में ट्विस्ट हो। कहानी कसकर लिखी हो। तो यह सीरीज आपकी उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरेगी।
