Toaster Movie Review: कैसी है राजकुमार राव अभिनीत ‘टोस्टर’? मजेदार शुरुआत पर भटकती कहानी, पढ़ें मूवी रिव्यू
Toaster Movie Review in Hindi: राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा अभिनीत फिल्म 'टोस्टर' ओटीटी पर रिलीज हो चुकी है। यहां जानिए कैसी है यह फिल्म?
विस्तार
कभी कभी फिल्म बड़ी नहीं होती, बस मजेदार होती है और 'टोस्टर' उसी तरह की फिल्म है। निर्देशक विवेक दास चौधरी ने एक बहुत छोटे से आइडिया और एक टोस्टर को लेकर एक कहानी गढ़ी है, जो आपको हंसाती है और ज्यादा सोचने पर मजबूर नहीं करती।
फिल्म हल्के अंदाज में आगे बढ़ती है और आप उसके साथ सहज रूप से जुड़ जाते हैं। यह परफेक्ट बनने की कोशिश नहीं करती, लेकिन एंटरटेन जरूर करती है।
कहानी
कहानी रामाकांत (राजकुमार राव) की है जो बहुत ही ज्यादा कंजूस है। वह हर खर्च को नुकसान समझता है और हर रुपये का हिसाब रखता है। उसकी शादी शिल्पा (सान्या मल्होत्रा) से हुई है। शिल्पा का स्वभाव रामाकांत से अलग है, लेकिन उसकी अपनी अजीब आदतें भी हैं।
दोनों एक शादी में जाते हैं। वहां गिफ्ट देने को लेकर दोनों की सोच नहीं मिलती। रामाकांत सस्ता गिफ्ट देना चाहता है पर आखिर में उसे मजबूरी में लगभग पांच हजार रुपये का महंगा टोस्टर खरीदना पड़ता है। यह खर्च उसके मन में चुभता रहता है।
कहानी में असल मोड़ तब आता है जब शादी अगले ही दिन टूट जाती है। अब रामाकांत को लगता है कि उसका दिया हुआ टोस्टर वापस मिलना चाहिए। वह इसे हर हाल में वापस पाने की ठान लेता है। यहीं से उसकी अजीब और उलझी हुई यात्रा शुरू होती है।
टोस्टर ढूंढते हुए वह अलग-अलग लोगों और हालातों में फंसता जाता है। इसी दौरान वह एक हत्या के मामले में भी उलझ जाता है। कहानी धीरे धीरे साधारण कॉमेडी से निकलकर रहस्य और अपराध की तरफ बढ़ने लगती है। आगे चलकर यह एक ऐसे जाल में बदल जाती है, जहां हर किरदार कुछ छुपा रहा होता है। हर घटना के पीछे कोई नया मोड़ आता है।
यह एक ऐसी कॉमेडी है जो कई बार पागलपन की हद तक चली जाती है। जैसे ही लगता है कि अब कहानी थमेगी, तभी कोई नया और अजीब मोड़ सामने आ जाता है। फिल्म मोलभाव करने की हमारी आदत पर हल्का तंज भी कसती है और दिखाती है कि हम छोटी बातों को कितना बड़ा बना देते हैं।
हालांकि, यही अति कई जगह फिल्म के खिलाफ भी जाती है। यह अजीबपन शुरुआत में तो मजेदार लगता है पर आगे चलकर यही चीज कहानी को बिखरा हुआ और जरूरत से ज्यादा खिंचा हुआ बना देती है।
अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अभिनय है, जो इस अजीब दुनिया को भी असली बना देता है। राजकुमार राव पूरी फिल्म को अपने कंधों पर संभालते हैं। उन्होंने रामाकांत के किरदार में कंजूसी, डर, चालाकी और बेचारेपन को बहुत सटीक तरीके से पेश किया है। उनकी एक्टिंग कहीं भी बनावटी नहीं लगता। उनके चेहरे के हाव भाव, शरीर की भाषा और तेज संवाद कॉमेडी को और असरदार बनाते हैं।
सान्या मल्होत्रा बैलेंस्ड एक्टिंग करती हैं और छोटे-छोटे एक्सप्रेशन से असर छोड़ती हैं। भले ही उनके किरदार को ज्यादा गहराई नहीं मिलती, फिर भी वह अपनी मौजूदगी महसूस कराती हैं। जब वह खुद को जासूस समझकर चीजों में दिलचस्पी लेने लगती हैं, तब उनका रोल और मजेदार हो जाता है।
अर्चना पूरन सिंह फिल्म का सरप्राइज हैं। वह अपने किरदार में पूरी तरह खुलकर सामने आती हैं और कई सीन में एनर्जीभर देती हैं। अभिषेक बनर्जी छोटे रोल में भी अलग असर छोड़ते हैं। उनका अजीब सा किरदार फिल्म के टोन को और मजेदार बनाता है। उपेंद्र लिमये सधे हुए एक्टिंग से कहानी को मजबूती देते हैं। सीमा पाहवा, जितेंद्र जोशी और फराह खान भी अपनी छाप छोड़ते हैं। हालांकि कुछ किरदार और गहराई मांगते हैं।
निर्देशन, स्क्रीनप्ले और लेखन
विवेक दास चौधरी का आइडिया दिलचस्प और अलग है लेकिन उसे पूरी तरह कसी हुई फिल्म में बदलने में कमी रह जाती है। शुरुआत में फिल्म का निर्देशन मजबूत है लेकिन आगे चलकर कहानी पर पकड़ ढीली पड़ती दिखती है।
स्क्रीनप्ले का पहला हिस्सा तेज और दिलचस्प है लेकिन दूसरा हिस्सा खिंच जाता है। कई घटनाएं बिना मजबूत वजह के घटती हैं, जिससे फिल्म थोड़ी बिखरी हुई लगने लगती है। लेखन में अच्छा कॉन्सेप्ट है लेकिन उसे उतनी मजबूती से विकसित नहीं किया गया। अगर कहानी को थोड़ा और कसकर लिखा जाता, तो असर और बेहतर हो सकता था।
देखें या नहीं
‘टोस्टर’ ऐसी फिल्म है जो आपको शुरुआत में अपने साथ जोड़ लेती है। लेकिन अंत तक वही पकड़ बनाए नहीं रख पाती। इसमें एक अच्छा आइडिया है, कुछ वाकई मजेदार पल हैं और राजकुमार राव की एक्टिंग बार बार मुस्कुराने की वजह देता है। लेकिन जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, कहानी भटकने लगती है और वही मजा धीरे-धीरे कम हो जाता है।
अगर आपको अजीब, थोड़ी हटकर और किरदारों पर टिकी फिल्में पसंद हैं, तो इसे एक बार मौका दिया जा सकता है। लेकिन अगर आप ऐसी फिल्म ढूंढ रहे हैं जो शुरुआत से अंत तक मजबूती से बांधे रखे.. तो यह फिल्म उस कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।

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