Operation Safed Sagar Review: कारगिल की हर कहानी जमीन पर लड़ी गई जंग सुनाती रही, इस बार लड़ाई आसमान में दिखी
Series Operation Safed Sagar Review: सीरीज 'ऑपरेशन सफेद सागर' काफी समय से चर्चा में बनी हुई थी, आज से यह ओटीटी पर स्ट्रीम हो रही है। जानिए, कैसी है सीरीज 'ऑपरेशन सफेद सागर'?
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कारगिल युद्ध पर हिंदी सिनेमा ने कई फिल्में बनाई हैं। कभी टाइगर हिल पर कब्जे की कहानी दिखाई गई तो कभी किसी शहीद की बहादुरी। लेकिन 1999 की उस जंग का एक बड़ा हिस्सा हमेशा पर्दे से गायब रहा। वह हिस्सा जहां भारतीय वायुसेना के फाइटर पायलट हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए दुश्मन के ठिकानों का पता लगा रहे थे। हर मिशन के साथ मौत सामने थी लेकिन लाइन ऑफ कंट्रोल पार करने की इजाजत नहीं थी।
वेब सीरीज 'ऑपरेशन सफेद सागर' उसी कहानी को सामने लाती है। बता दें यह सीरीज कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के ऑपरेशन सफेद सागर से प्रेरित है।
यही वजह है कि इस सीरीज से उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं। हालांकि, सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि मेकर्स कई बार उसी विषय को छोड़कर दूसरी गलियों में घूमने निकल पड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि जहां कहानी उड़ान भरनी चाहिए, वहां वह रनवे पर ही चक्कर काटती रहती है।
कहानी: कारगिल की जंग और गोल्डन एरोज की उड़ान
साल 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर बस यात्रा पर हैं। टीवी पर दोस्ती की तस्वीरें दिखाई जा रही हैं। उधर पाकिस्तान में कुछ और ही खेल चल रहा है। परवेज मुशर्रफ और सेना कारगिल की तैयारी में जुटे हैं, जबकि शुरुआत में नवाज शरीफ को इसकी पूरी भनक तक नहीं है।
दूसरी तरफ भारतीय वायुसेना की गोल्डन एरोज स्क्वाड्रन अपनी रूटीन ट्रेनिंग कर रही है। स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा (सिद्धार्थ) और विंग कमांडर बी.एस. धनोआ (जिमी शेरगिल) अपनी टीम के साथ आने वाले खतरे से पूरी तरह अनजान हैं। जैसे-जैसे कारगिल में घुसपैठ की तस्वीर साफ होती है, वैसे-वैसे भारतीय वायुसेना की जिम्मेदारी बढ़ती जाती है। दुश्मन के ठिकानों का पता लगाना, भारतीय सेना तक सही जानकारी पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर हवाई हमला करना, यही इस सीरीज की असली कहानी है।
एक्टिंग: सिद्धार्थ ने संभाली कमान, जिमी शेरगिल भी जमे
सिद्धार्थ इस सीरीज का सबसे मजबूत चेहरा हैं। अच्छी बात यह है कि उन्होंने अजय आहूजा को फिल्मी हीरो बनाने की कोशिश नहीं की। उनका अभिनय शांत है लेकिन असरदार है। कई जगह उनकी आंखें डायलॉग से ज्यादा बोलती हैं।जिमी शेरगिल ऐसे किरदारों में हमेशा भरोसा दिलाते हैं। एक कमांडिंग ऑफिसर का दबाव, फैसलों की जिम्मेदारी और चेहरे पर दिखने वाला संतुलन, सब कुछ उनके अभिनय में नजर आता है। युवा फाइटर पायलटों की टीम में अभय वर्मा, मिहिर आहूजा, तारुक रैना और अर्नव भसीन के बीच दोस्ती भी दिखती है। इन चारों के बीच की केमिस्ट्री स्वाभाविक लगती है।
दीया मिर्जा, प्राजक्ता कोली और अमृता बागची के जरिए कहानी में परिवारों का नजरिया भी जुड़ता है। हर मिशन के साथ घर पर बैठे लोगों का डर और इंतजार भी महसूस होता है। तीनों अभिनेत्रियां अपने हिस्से का काम अच्छे से करती हैं।विनय पाठक नवाज शरीफ के किरदार में अलग छाप छोड़ते हैं। वहीं आदिल हुसैन, महेश मांजरेकर और बरुण सोबती भी अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं।
निर्देशक: जब फाइटर जेट से ज्यादा दिखी उसकी तैयारी
ओनी सेन ने फाइटर पायलट की दुनिया को बारीकी से दिखाया है। मिशन की प्लानिंग हो, मौसम का असर, हवा की दिशा या टारगेट पर हमला, सीरीज बताती है कि फाइटर जेट उड़ाना सिर्फ हिम्मत का नहीं बल्कि सही समय पर सही फैसला लेने का भी खेल है। हवाई दृश्य और मिशन वाले हिस्से प्रभावित करते हैं। मेकर्स ने कुछ जगह असली फुटेज का इस्तेमाल किया है। इससे कई सीन और ज्यादा असर छोड़ते हैं।
हालांकि ऑपरेशन सफेद सागर जितना दमदार विषय है, उतना समय उसे नहीं मिला। कई बार कहानी पाकिस्तान की राजनीति और निजी रिश्तों में उलझ जाती है। अगर फोकस मिशन पर ज्यादा रहता तो यह सीरीज और बेहतर बन सकती थी।
टेक्निकल पक्ष: आसमान वाले सीन कितने असली लगे?
फाइटर जेट वाले कई सीन इतने असली लगते हैं कि नजर स्क्रीन पर टिक जाती है। हालांकि कुछ जगह ग्राफिक्स यह अहसास भी करा देते हैं कि आप एक वेब सीरीज देख रहे हैं, असली फुटेज नहीं।
सबसे ज्यादा क्या खटकता है?
सीरीज के पहले दो एपिसोड कहानी कम और तैयारी ज्यादा लगते हैं। करीब दो घंटे बीत जाते हैं, लेकिन लगता है कि असली कहानी अभी शुरू ही नहीं हुई। पाकिस्तान वाले हिस्से में कई लंबे सीन्स हैं। कई डायलॉग ऐसे हैं, जिन्हें आधे समय में भी कहा जा सकता था। कुछ जगह तो ऐसा लगता है कि सीरीज ऑपरेशन सफेद सागर से ज्यादा इस्लामाबाद की राजनीति में उलझ गई है।
फाइटर पायलटों की निजी जिंदगी दिखाना जरूरी था लेकिन कई बार वही ट्रैक फिलर जैसा महसूस होता है। दर्शक बार-बार कॉकपिट में लौटना चाहता है लेकिन कहानी घर, रिश्तों और लंबी बातचीत में अटक जाती है। देशभक्ति वाले कुछ डायलॉग भी तालियां बटोरने के इरादे से लिखे गए लगते हैं। सुनते वक्त रोमांच कम होता है, लिखावट ज्यादा नजर आती है।
हालांकि चौथे एपिसोड के बाद सीरीज फिर संभल जाती है। बमबारी की तैयारी, मौसम की चुनौती, हवा का दबाव, कहां हमला करना है और हर छोटी तकनीकी परेशानी कहानी में जान डाल देती है। यहीं जाकर समझ आता है कि आखिर इस सीरीज का असली हीरो ऑपरेशन सफेद सागर है ।
देखें या नहीं?
सीरीज ऑपरेशन सफेद सागर परफेक्ट नहीं है। कई जगह यह खुद अपनी रफ्तार की दुश्मन बन जाती है। लेकिन जब भी कैमरा फाइटर पायलटों के कॉकपिट में पहुंचता है, सीरीज याद दिलाती है कि कारगिल की जंग सिर्फ पहाड़ों पर नहीं आसमान में भी लड़ी गई थी। अगर कारगिल युद्ध के इस अनदेखे अध्याय को समझना चाहते हैं तो यह सीरीज आपके समय की हकदार है।