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उत्तर प्रदेश की बदलती तस्वीर: महिलाओं के लिए भय से भरोसे तक का नया युग

प्रोफेसर मंगला कपूर Published by: Sandhya Kumari Updated Mon, 13 Apr 2026 09:42 PM IST
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उत्तर प्रदेश की बदलती तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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एक नारी के जीवन में सबसे अधिक महत्व रखती है – स्वतंत्रता। यह स्वतंत्रता केवल आने-जाने की आज़ादी नहीं, बल्कि सोचने, निर्णय लेने, शिक्षा प्राप्त करने और अपने सपनों को बिना भय के जीने का अधिकार है। जब किसी समाज में नारी स्वतंत्र होती है, तो वह केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज की प्रगति का आधार बन जाती है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के संदर्भ में यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां एक समय पर सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा एक गंभीर चुनौती मानी जाती थी। लेकिन समय के साथ जिस प्रकार प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर परिवर्तन हुए हैं, उन्होंने नारी के जीवन में नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार किया है। आज उत्तर प्रदेश की नारी केवल घर तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही है। 
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स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तब और स्पष्ट होता है, जब एक बेटी बिना भय के विद्यालय जाती है, एक युवती देर रात अपने कार्यस्थल से सुरक्षित लौटती है और एक महिला अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम होती है। यही वह आधार है जिस पर किसी भी सभ्य और प्रगतिशील समाज की नींव रखी जाती है। जिस धरती पर नारी भयभीत है, वहां का विकास आधा, अधूरा है। 2017 में सत्ता में आने के बाद योगी सरकार ने कई स्तरों पर काम किया। एंटी-रोमियो स्क्वॉड का गठन, महिला हेल्पलाइन 1090 और 181 का सशक्तिकरण, मिशन शक्ति अभियान और फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की स्थापना जैसे कदमों ने एक मजबूत संदेश दिया कि महिलाओं की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। 
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एंटी रोमियो स्क्वॉड का गठन योगी सरकार के संकल्प का पहला और सबसे ठोस उदाहरण था। प्रदेश में नौ हजार से अधिक महिला बीटों का गठन किया गया। महिला पुलिस की संख्या भी बढ़ाकर दोगुनी से अधिक की गई। महिला पुलिसकर्मियों की उपस्थिति का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होता है। पीड़िता निःसंकोच अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है। इसके अतिरिक्त साइबर अपराध के मोर्चे पर भी सरकार सजग रही। 2017 में प्रदेश में केवल दो साइबर थाने थे, जो आज बढ़कर 75 जनपदों में स्थापित हो चुके हैं।  

पीडितों को न्याय न मिले तो यह भी उनके साथ अन्याय है। महिला संबंधी मामलों के निस्तारण में आज प्रदेश पूरे देश में शीर्ष स्थान पर है। यह उपलब्धि और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब हम यह जानते हैं कि 2018 में उत्तर प्रदेश इस रैंकिंग में सातवें स्थान पर था और निस्तारण की दर काफी धीमी थी। मिशन शक्ति अभियान ने इस पूरी कोशिश को एक सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। सुरक्षा का सीधा असर महिलाओं की आर्थिक भागीदारी पर भी पड़ा। 2017 के पहले उत्तर प्रदेश में महिला श्रम शक्ति का प्रतिशत मात्र 12 था, जो आज तीन गुना से अधिक हो चुकी है। उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 95 लाख से अधिक महिलाओं को लाभ मिला है और एक करोड़ से अधिक महिलाएं महिला स्वयं सेवी समूहों में योगदान देकर आर्थिक स्वावलंबन की ओर अग्रसर हो रही हैं।  

यह भी सच है कि इन उपलब्धियों के बीच चुनौतियां अभी भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरुकताा, दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं तक सुरक्षा का पहुंचना और सामाजिक मानसिकता में व्यापक बदलाव की दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना है। लेकिन जब दिशा सही हो तो लक्ष्य हासिल जरूर होता है। उत्तर प्रदेश की यह बदलती तस्वीर केवल एक राज्य की कहानी नहीं, यह उस नए भारत का संकेत है, जहां नारी की गरिमा केवल संविधान के पन्नों पर नहीं, बल्कि गली-कूचों और खेत-खलिहानों में भी जीवित है।  

नारी की स्वतंत्रता केवल एक आदर्श या नीतिगत घोषणा भर नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता होनी चाहिए। इस स्वतंत्रता को केवल सुरक्षा तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे सम्मान, समानता और आत्मनिर्भरता के व्यापक दायरे में देखा जाए। समाज और शासन—दोनों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसा वातावरण तैयार करें, जहां नारी को अपनी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें विकसित करने का पूरा अवसर मिले। यह प्रक्रिया सतत होनी चाहिए। जब किसी समाज में नारी निर्भय होकर आगे बढ़ती है, तो वह केवल अपने जीवन को नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी दिशा देती है। 

( पद्मश्री प्रोफेसर मंगला कपूर, संगीत विभाग, महिला महाविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी से सम्बद्ध हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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