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West Bengal Election: बहुत पुराना है नाथ संप्रदाय और बंगाल का रिश्ता, चुनाव पर कितना असर डालेगा योगी फैक्टर?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Mon, 13 Apr 2026 05:48 PM IST
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सार

वर्ष 1914-15 में योगिराज बाबा गंभीरनाथ के कोलकाता प्रवास के दौरान बहुत से लोगों ने दीक्षा ली थी। समय के साथ कम नाथ संप्रदाय का यह प्रभाव व्यापक होता गया। उनके शिष्य स्वामी प्रणवानंद ने 1917 में कोलकाता में भारत सेवाश्रम संघ की स्थापना कर इस परंपरा को सामाजिक विस्तार दिया। 

West Bengal Assembly Election 2026 Nath Sect and Bengal connect Yogi Adityanath Gorakhpur Factor Gorakhnath
नाथ संप्रदाय से जुड़े योगी आदित्यनाथ की बंगाल में रैली। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

पश्चिम बंगाल चुनाव केवल सत्ता संघर्ष की कहानियों का केंद्र नहीं, बल्कि समृद्ध सांस्कृतिक स्मृतियों, आध्यात्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक निरंतरताओं की प्रेरणा स्थली भी है। इस चुनाव में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बंगाल के चुनावी दौरे चर्चा में हैं। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण नाथ संप्रदाय और बंगाल का रिश्ता है।   
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वर्ष 1914-15 में योगिराज बाबा गंभीरनाथ के कोलकाता प्रवास के दौरान बहुत से लोगों ने दीक्षा ली थी। समय के साथ कम नाथ संप्रदाय का यह प्रभाव व्यापक होता गया। उनके शिष्य स्वामी प्रणवानंद ने 1917 में कोलकाता में भारत सेवाश्रम संघ की स्थापना कर इस परंपरा को सामाजिक विस्तार दिया। इस संस्था ने नाथ पंथ को केवल आध्यात्मिक धारा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज सेवा और संगठन के माध्यम से जनजीवन से जोड़ा।
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गोरक्षपीठ: परंपरा का केंद्रीय आधार, प्रभाव का स्रोत
महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ ने नाथ परंपरा को न केवल संरक्षित किया, बल्कि इसे सामाजिक और राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। योगी आदित्यनाथ भी इसी परंपरा का नेतृत्व करते हैं। बंगाल में नाथ संप्रदाय समाज की संरचना और पहचान में गहराई तक समाया हुआ है। नाथ, देबनाथ, मजूमदार, रॉय जैसे 126 से अधिक उपनाम इस परंपरा की व्यापकता को दर्शाते हैं। इसके साथ ही, प्रदेश में लाखों लोग नाथ संप्रदाय की गृहस्थ शाखा से जुड़े हैं, जिनका इतिहास सदियों पुराना है। नाथ संप्रदाय के 12 प्रमुख पंथों में से कई का प्रभाव बंगाल में मौजूद है।

आस्था का विस्तृत आधार
कोलकाता का कपिलानी योगेश्वर पीठ नाथ परंपरा के उस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पक्ष को सामने लाता है, जो गुरु गोरखनाथ और कपिल मुनि से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसी परंपरा से गंगासागर तीर्थ की स्थापना का सूत्र भी जोड़ा जाता है। पश्चिम बंगाल के कोलकाता, मेदनीपुर और हुगली में स्थित नाथ संप्रदाय के मंदिर इस परंपरा के जीवंत केंद्र हैं। यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति बंगाल में एक स्वाभाविक स्वीकार्यता पैदा करती है। यही वह बिंदु है, जो इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि बंगाल में योगी की गूंज यूं ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे नाथ परंपरा का गहरा, स्थायी और व्यापक प्रभाव है।
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