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10 प्रतिशत दिव्यांगता प्रमाणपत्र से भविष्य की कमाई का मुआवजा नहीं दे सकते : हाईकोर्ट
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- शारीरिक दिव्यांगता और कमाई की क्षमता प्रभावित होने का प्रतिशत अलग-अलग हो सकता है
- घुटने के नीचे चोट के मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की अपील खारिज की
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल 10 प्रतिशत शारीरिक दिव्यांगता का प्रमाणपत्र होने के आधार पर भविष्य में कमाई की क्षमता प्रभावित होने का मुआवजा नहीं दिया जा सकता। घायल व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि दिव्यांगता स्थायी है और उसका असर उसके काम करने और आय अर्जित करने की क्षमता पर पड़ा है।
जस्टिस दीपक गुप्ता ने दिव्यांगता के आधार पर मुआवजा बढ़ाने की मांग वाली गुरुग्राम निवासी अनिल कुमार की अपील खारिज करते हुए कहा कि शारीरिक दिव्यांगता का प्रतिशत और कार्यात्मक दिव्यांगता एक ही बात नहीं हैं। किसी व्यक्ति की शारीरिक परेशानी कितनी है और उससे उसकी कमाई की क्षमता कितनी प्रभावित हुई दोनों का अलग-अलग आकलन करना जरूरी है। मामले में अपीलकर्ता सड़क दुर्घटना में घायल हुआ था। उसके दाहिने घुटने के ठीक नीचे चोट लगी थी। इसके बाद घुटने में हल्की जकड़न की समस्या सामने आई। चिकित्सकीय प्रमाणपत्र में उसकी शारीरिक दिव्यांगता 10 प्रतिशत बताई गई थी।
अपीलकर्ता ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष मुआवजे की मांग की थी। उसका कहना था कि दिव्यांगता के कारण उसकी भविष्य की कमाई की क्षमता प्रभावित हुई है इसलिए उसे इसके लिए अलग से मुआवजा दिया जाना चाहिए। हालांकि अधिकरण ने स्थायी कमाई क्षमता के नुकसान का मुआवजा देने के बजाय चोट और अस्थायी दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए 18 हजार रुपये दिए थे। इसके बाद अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दिव्यांगता स्थायी भी हो, तब भी केवल उसके प्रतिशत को व्यक्ति की आय पर लागू करके भविष्य की कमाई में नुकसान तय नहीं किया जा सकता।
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अदालत को यह देखना होगा कि दिव्यांगता से संबंधित व्यक्ति का काम वास्तव में कितना प्रभावित हुआ। किसी व्यक्ति को 10 प्रतिशत शारीरिक दिव्यांगता होने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी कमाई की क्षमता भी 10 प्रतिशत कम हो गई। अपीलकर्ता की दिव्यांगता 10 प्रतिशत आंकी गई थी, लेकिन ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि यह स्थायी दिव्यांगता थी। यह भी प्रमाणित नहीं किया गया कि घुटने में आई जकड़न के कारण वह दुर्घटना से पहले वाला काम करने में असमर्थ हो गया या उसकी भविष्य की आय अर्जित करने की क्षमता कम हो गई। अदालत ने कहा कि अधिकरण ने दिव्यांगता को नजरअंदाज नहीं किया था। चोट और उससे हुई परेशानी को ध्यान में रखते हुए अधिकरण पहले ही 18 हजार रुपये अस्थायी दिव्यांगता के लिए दे चुका था।
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- घुटने के नीचे चोट के मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की अपील खारिज की
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल 10 प्रतिशत शारीरिक दिव्यांगता का प्रमाणपत्र होने के आधार पर भविष्य में कमाई की क्षमता प्रभावित होने का मुआवजा नहीं दिया जा सकता। घायल व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि दिव्यांगता स्थायी है और उसका असर उसके काम करने और आय अर्जित करने की क्षमता पर पड़ा है।
जस्टिस दीपक गुप्ता ने दिव्यांगता के आधार पर मुआवजा बढ़ाने की मांग वाली गुरुग्राम निवासी अनिल कुमार की अपील खारिज करते हुए कहा कि शारीरिक दिव्यांगता का प्रतिशत और कार्यात्मक दिव्यांगता एक ही बात नहीं हैं। किसी व्यक्ति की शारीरिक परेशानी कितनी है और उससे उसकी कमाई की क्षमता कितनी प्रभावित हुई दोनों का अलग-अलग आकलन करना जरूरी है। मामले में अपीलकर्ता सड़क दुर्घटना में घायल हुआ था। उसके दाहिने घुटने के ठीक नीचे चोट लगी थी। इसके बाद घुटने में हल्की जकड़न की समस्या सामने आई। चिकित्सकीय प्रमाणपत्र में उसकी शारीरिक दिव्यांगता 10 प्रतिशत बताई गई थी।
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अपीलकर्ता ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष मुआवजे की मांग की थी। उसका कहना था कि दिव्यांगता के कारण उसकी भविष्य की कमाई की क्षमता प्रभावित हुई है इसलिए उसे इसके लिए अलग से मुआवजा दिया जाना चाहिए। हालांकि अधिकरण ने स्थायी कमाई क्षमता के नुकसान का मुआवजा देने के बजाय चोट और अस्थायी दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए 18 हजार रुपये दिए थे। इसके बाद अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दिव्यांगता स्थायी भी हो, तब भी केवल उसके प्रतिशत को व्यक्ति की आय पर लागू करके भविष्य की कमाई में नुकसान तय नहीं किया जा सकता।
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अदालत को यह देखना होगा कि दिव्यांगता से संबंधित व्यक्ति का काम वास्तव में कितना प्रभावित हुआ। किसी व्यक्ति को 10 प्रतिशत शारीरिक दिव्यांगता होने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी कमाई की क्षमता भी 10 प्रतिशत कम हो गई। अपीलकर्ता की दिव्यांगता 10 प्रतिशत आंकी गई थी, लेकिन ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि यह स्थायी दिव्यांगता थी। यह भी प्रमाणित नहीं किया गया कि घुटने में आई जकड़न के कारण वह दुर्घटना से पहले वाला काम करने में असमर्थ हो गया या उसकी भविष्य की आय अर्जित करने की क्षमता कम हो गई। अदालत ने कहा कि अधिकरण ने दिव्यांगता को नजरअंदाज नहीं किया था। चोट और उससे हुई परेशानी को ध्यान में रखते हुए अधिकरण पहले ही 18 हजार रुपये अस्थायी दिव्यांगता के लिए दे चुका था।