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CWG 2026: ग्लासगो में चमके हरियाणा के होनहार, मुक्केबाज सचिन फाइनल में; नरेंद्र ने भी पक्का किया पदक
Sat, 01 Aug 2026 03:58 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, भिवानी/हांसी
अमर उजाला नेटवर्क, भिवानी/हांसी
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 01 Aug 2026 03:58 AM IST
सार
ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंड खेलों में हरियाणा के होनहार भी चमके हैं। इसी के साथ भारत की झोली में पदकों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है।
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मिताथल में सचिन सिवाच के घर पर मुकाबला देखते परिजन।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंड खेलों में हरियाणा के होनहार भी चमके हैं। इसी के साथ भारत की झोली में पदकों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है।
सचिन ने फाइनल में प्रवेश कर रजत पदक पक्का किया
उन्होंने बताया कि रात के एक बजे तक पूरा परिवार मुकाबले के इंतजार में बैठा रहा और आखिर भाई ने भी इंतजार को सफल बनाते हुए शानदार जीत दर्ज की। नेहा ने कहा कि अब भाई से फाइनल में स्वर्ण पदक की उम्मीद है। जिस तरह से सावन माह चल रहा है और रक्षाबंधन नजदीक है तो भाई का पदक मेरे लिए राखी का सबसे यादगार गिफ्ट होगा।
नरेंद्र बेरवाल ने सेमीफाइनल में पंच का दम दिखाया, रजत पदक पक्का
हांसी उपमंडल के गांव सोरखी निवासी मुक्केबाज़ नरेंद्र बेरवाल ने ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों के पुरुष 90+ किलोग्राम वर्ग के सेमीफाइनल में त्रिनिदाद एवं टोबैगो के नाइजल पॉल को 5-0 के सर्वसम्मत फैसले से हराकर फाइनल में प्रवेश कर लिया। इस जीत के साथ उन्होंने कम से कम रजत पदक पक्का कर लिया है। अब स्वर्ण पदक के मुकाबले में उनका सामना इंग्लैंड के डामर थॉमस से होगा।
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कभी स्कूल में अपनी शरारतों के लिए पहचाने जाने वाले गांव सोरखी के नरेंद्र बेरवाल आज अपनी मेहनत, अनुशासन और जुनून के दम पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं। जिस बेटे की शिकायतें कभी स्कूल से रोज घर पहुंचती थीं, उसी की ऊर्जा और मजबूत कद-काठी में पिता जगदीश बेरवाल ने एक मुक्केबाज़ की प्रतिभा देखी। करीब 16 वर्ष पहले उन्होंने नरेंद्र को बॉक्सिंग का प्रशिक्षण दिलाने के लिए भिवानी भेज दिया। पिता का यह फैसला आज देश के लिए गौरव का कारण बन गया है।
नरेंद्र का परिवार खेती-बाड़ी से जुड़ा है और परिवार का पहले खेलों से कोई संबंध नहीं रहा। पिता जगदीश बेरवाल बताते हैं कि बचपन में नरेंद्र बेहद शरारती था। स्कूल में क्लास मॉनिटर होने के बावजूद अक्सर बच्चों से झगड़ पड़ता था और शिकायतें घर तक पहुंचती थीं। दसवीं कक्षा में उसकी लंबाई करीब छह फीट और वजन लगभग 80 किलोग्राम था। बेटे की शारीरिक क्षमता और आक्रामक स्वभाव को सही दिशा देने के उद्देश्य से वर्ष 2010 में उसे भिवानी की एक निजी बॉक्सिंग अकादमी में भेजा गया।
पिता का यह निर्णय सही साबित हुआ। महज एक वर्ष के भीतर नरेंद्र का चयन भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में हो गया। वर्ष 2012 में उन्होंने यूथ विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया और 2013 में भारतीय सेना में जूनियर कमीशंड अधिकारी (जेसीओ) के रूप में भर्ती हुए। वर्तमान में वह सेना में सूबेदार के पद पर कार्यरत हैं। उनके बड़े भाई योगेंद्र हरियाणा पुलिस में हेड कांस्टेबल हैं और गुरुग्राम में तैनात हैं, जबकि परिवार आज भी गांव में रहकर खेती-बाड़ी करता है।
नरेंद्र अब 30 वर्ष का हो गया है। परिवार ने तय किया है कि इस वर्ष उसका विवाह करेंगे। हमें पूरा विश्वास है कि वह राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर लौटेगा। पूरे गांव में खुशी का माहौल है और सभी फाइनल मुकाबले का इंतजार कर रहे हैं।
- जगदीश, पिता
नरेंद्र की उपलब्धि पूरे गांव के लिए गर्व का विषय है। बचपन से ही वह खेल के प्रति समर्पित रहा है। हमें विश्वास है कि वह स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम और ऊंचा करेगा।
- राहुल सोरखी, जिलाध्यक्ष आप
जिस बच्चे को कभी लोग उसकी शरारतों से पहचानते थे, आज वही गांव और देश की पहचान बन गया है। बीच में वह कुछ समय बीमार भी रहा, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। उसकी सफलता हर युवा के लिए प्रेरणा है।
- रामचन्द्र, सरपंच सोरखी
आज का मुकाबला काफी कठिन था क्योंकि मेरा सामना विश्व चैंपियनशिप के पदक विजेता मुक्केबाज़ से था। मुझे पहले से अंदाजा था कि वह बेहद ताकतवर पंच लगाने वाला और अनुभवी खिलाड़ी है। इसलिए मैंने शुरुआत से ही अपनी जगह पर डटे रहकर आक्रामक अंदाज में मुकाबला करने की योजना बनाई, जैसा मैंने अपने पिछले मुकाबले में भी किया था। फाइनल के लिए मेरी तैयारियां बहुत अच्छी चल रही हैं।
- नरेंद्र बेरवाल, बॉक्सर
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सचिन ने फाइनल में प्रवेश कर रजत पदक पक्का किया
ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में पूरा दिन इंतजार के बाद देर रात मिताथल के सचिन सिवाच ने सेमीफाइनल मुकाबले में जीत दर्ज करते हुए फाइनल में प्रवेश कर लिया। सचिन ने मुकाबले में प्रतिद्वंदी ओवेन हैरिस-एलन को 60 किलोग्राम भारवर्ग में 5-0 से हरा कर जीत दर्ज की। सचिन की छोटी बहन नेहा ने बताया कि भाई के मैच का पूरा दिन से इंतजार कर रहे थे। पूरा परिवार व रिश्तेदारों को बेसब्री से उस पल का इंतजार था की जब भाई सेमीफाइनल मुकाबले में जीत दर्ज कर फाइनल में प्रवेश करें।
उन्होंने बताया कि रात के एक बजे तक पूरा परिवार मुकाबले के इंतजार में बैठा रहा और आखिर भाई ने भी इंतजार को सफल बनाते हुए शानदार जीत दर्ज की। नेहा ने कहा कि अब भाई से फाइनल में स्वर्ण पदक की उम्मीद है। जिस तरह से सावन माह चल रहा है और रक्षाबंधन नजदीक है तो भाई का पदक मेरे लिए राखी का सबसे यादगार गिफ्ट होगा।
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नरेंद्र बेरवाल ने सेमीफाइनल में पंच का दम दिखाया, रजत पदक पक्का
हांसी उपमंडल के गांव सोरखी निवासी मुक्केबाज़ नरेंद्र बेरवाल ने ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों के पुरुष 90+ किलोग्राम वर्ग के सेमीफाइनल में त्रिनिदाद एवं टोबैगो के नाइजल पॉल को 5-0 के सर्वसम्मत फैसले से हराकर फाइनल में प्रवेश कर लिया। इस जीत के साथ उन्होंने कम से कम रजत पदक पक्का कर लिया है। अब स्वर्ण पदक के मुकाबले में उनका सामना इंग्लैंड के डामर थॉमस से होगा।
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कभी स्कूल में अपनी शरारतों के लिए पहचाने जाने वाले गांव सोरखी के नरेंद्र बेरवाल आज अपनी मेहनत, अनुशासन और जुनून के दम पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं। जिस बेटे की शिकायतें कभी स्कूल से रोज घर पहुंचती थीं, उसी की ऊर्जा और मजबूत कद-काठी में पिता जगदीश बेरवाल ने एक मुक्केबाज़ की प्रतिभा देखी। करीब 16 वर्ष पहले उन्होंने नरेंद्र को बॉक्सिंग का प्रशिक्षण दिलाने के लिए भिवानी भेज दिया। पिता का यह फैसला आज देश के लिए गौरव का कारण बन गया है।
नरेंद्र का परिवार खेती-बाड़ी से जुड़ा है और परिवार का पहले खेलों से कोई संबंध नहीं रहा। पिता जगदीश बेरवाल बताते हैं कि बचपन में नरेंद्र बेहद शरारती था। स्कूल में क्लास मॉनिटर होने के बावजूद अक्सर बच्चों से झगड़ पड़ता था और शिकायतें घर तक पहुंचती थीं। दसवीं कक्षा में उसकी लंबाई करीब छह फीट और वजन लगभग 80 किलोग्राम था। बेटे की शारीरिक क्षमता और आक्रामक स्वभाव को सही दिशा देने के उद्देश्य से वर्ष 2010 में उसे भिवानी की एक निजी बॉक्सिंग अकादमी में भेजा गया।
पिता का यह निर्णय सही साबित हुआ। महज एक वर्ष के भीतर नरेंद्र का चयन भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में हो गया। वर्ष 2012 में उन्होंने यूथ विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया और 2013 में भारतीय सेना में जूनियर कमीशंड अधिकारी (जेसीओ) के रूप में भर्ती हुए। वर्तमान में वह सेना में सूबेदार के पद पर कार्यरत हैं। उनके बड़े भाई योगेंद्र हरियाणा पुलिस में हेड कांस्टेबल हैं और गुरुग्राम में तैनात हैं, जबकि परिवार आज भी गांव में रहकर खेती-बाड़ी करता है।
नरेंद्र अब 30 वर्ष का हो गया है। परिवार ने तय किया है कि इस वर्ष उसका विवाह करेंगे। हमें पूरा विश्वास है कि वह राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर लौटेगा। पूरे गांव में खुशी का माहौल है और सभी फाइनल मुकाबले का इंतजार कर रहे हैं।
- जगदीश, पिता
नरेंद्र की उपलब्धि पूरे गांव के लिए गर्व का विषय है। बचपन से ही वह खेल के प्रति समर्पित रहा है। हमें विश्वास है कि वह स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम और ऊंचा करेगा।
- राहुल सोरखी, जिलाध्यक्ष आप
जिस बच्चे को कभी लोग उसकी शरारतों से पहचानते थे, आज वही गांव और देश की पहचान बन गया है। बीच में वह कुछ समय बीमार भी रहा, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। उसकी सफलता हर युवा के लिए प्रेरणा है।
- रामचन्द्र, सरपंच सोरखी
आज का मुकाबला काफी कठिन था क्योंकि मेरा सामना विश्व चैंपियनशिप के पदक विजेता मुक्केबाज़ से था। मुझे पहले से अंदाजा था कि वह बेहद ताकतवर पंच लगाने वाला और अनुभवी खिलाड़ी है। इसलिए मैंने शुरुआत से ही अपनी जगह पर डटे रहकर आक्रामक अंदाज में मुकाबला करने की योजना बनाई, जैसा मैंने अपने पिछले मुकाबले में भी किया था। फाइनल के लिए मेरी तैयारियां बहुत अच्छी चल रही हैं।
- नरेंद्र बेरवाल, बॉक्सर