Explainer: -40°C में भी नहीं जमेगा यह डीजल, क्या है एक्सट्रीम वेदर ग्रेड फ्यूल और क्यों है खास?
सियाचिन और लद्दाख जैसी बर्फीली सीमाओं पर सेना की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ दुश्मन नहीं, बल्कि भीषण ठंड भी होती है। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत ने एक ऐसा विशेष डीजल विकसित किया है, जो अत्यधिक कम तापमान में भी प्रभावी रहता है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारतीय सेना को देश की सुरक्षा के लिए सियाचिन, लद्दाख, काराकोरम और पूर्वी लद्दाख जैसे ऐसे इलाकों में तैनात रहना पड़ता है, जहां सर्दियों में तापमान कई बार -40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इतनी भीषण ठंड में सिर्फ सैनिकों के सामने ही नहीं, बल्कि सैन्य वाहनों के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है। सामान्य डीजल जमने लगता है, जिससे टैंक, ट्रक, बख्तरबंद वाहन और रसद पहुंचाने वाले वाहन बंद पड़ सकते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने भारतीय सेना के सहयोग से एक्सट्रीम वेदर ग्रेड (XWG) डीजल विकसित किया है। इसके लॉन्च के बाद यह चर्चा में है।
ऐसे में आइए जानते हैं कि वेदर फ्यूल क्या होता है? सामान्य डीजल ठंड में क्यों जम जाता है? एक्सट्रीम वेदर ग्रेड डीजल क्या है? इसे कैसे बनाया गया है? ये दूसरे फ्यूल से कैसे अलग है? इसकी क्या विशेषता है?
आखिर वेदर फ्यूल क्या होता है?
वेदर फ्यूल ऐसा ईंधन होता है, जिसे किसी क्षेत्र के मौसम और तापमान के अनुसार तैयार किया जाता है। हर मौसम में एक जैसा ईंधन प्रभावी नहीं रहता। अत्यधिक गर्मी में ईंधन का वाष्पीकरण बढ़ सकता है, जबकि अत्यधिक ठंड में डीजल जमने लगता है। इसलिए तेल कंपनियां अलग-अलग जलवायु के लिए अलग प्रकार का ईंधन तैयार करती हैं। आमतौर पर वेदर फ्यूल तीन प्रकार के होते हैं;
- समर ग्रेड फ्यूल
- विंटर ग्रेड फ्यूल
- एक्सट्रीम वेदर ग्रेड फ्यूल
- यूरोप, कनाडा, रूस, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और अमेरिका जैसे ठंडे देशों में मौसम के अनुसार अलग-अलग ग्रेड का डीजल उपलब्ध कराया जाता है।
सामान्य डीजल ठंड में क्यों जम जाता है?
सामान्य डीजल में पैराफिन वैक्स (मोम) मौजूद होता है। सामान्य तापमान पर यह पूरी तरह घुला रहता है, लेकिन जैसे-जैसे तापमान गिरता है, यह छोटे-छोटे क्रिस्टल बनाने लगता है। धीरे-धीरे ये क्रिस्टल बड़े होकर;
- फ्यूल फिल्टर को जाम कर देते हैं।
- पाइपलाइन में ईंधन का प्रवाह रोक देते हैं।
- इंजेक्टर तक डीजल नहीं पहुंचने देते।
- इंजन स्टार्ट नहीं होता या बीच रास्ते में बंद हो जाता है।
- इसी समस्या के कारण अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों के लिए विशेष डीजल विकसित किया जाता है।
डीजल के चार महत्वपूर्ण तकनीकी मानक कौन-कौन से हैं?
- क्लाउड प्वाइंट: वह तापमान जहां पहली बार डीजल में वैक्स के कण दिखाई देने लगते हैं।
- कोल्ड फिल्टर प्लगिंग प्वाइंट (CFPP): वह तापमान जहां वैक्स के कारण फ्यूल फिल्टर जाम होने लगता है।
- पोर प्वाइंट: वह न्यूनतम तापमान जहां तक डीजल बह सकता है। इसके नीचे डीजल लगभग ठोस हो जाता है।
- फ्लैश प्वाइंट: वह न्यूनतम तापमान जिस पर ईंधन की वाष्प आग पकड़ सकती है। यह ईंधन की सुरक्षा का महत्वपूर्ण मानक माना जाता है।
विंटर फ्यूल क्या होता है?
विंटर फ्यूल या विंटर ग्रेड डीजल ऐसा विशेष ईंधन है जिसे कम तापमान वाले क्षेत्रों के लिए तैयार किया जाता है। इसका उद्देश्य डीजल को जमने से रोकना और अत्यधिक ठंड में भी इंजन तक ईंधन की आपूर्ति बनाए रखना होता है। इस ईंधन में विशेष रासायनिक योजक (एडिटिव्स) मिलाए जाते हैं, जो वैक्स के बड़े क्रिस्टल बनने से रोकते हैं और डीजल को कम तापमान पर भी तरल बनाए रखते हैं।
विंटर फ्यूल कैसे बनाया जाता है?
रिफाइनरी में इसकी तैयारी कई चरणों में होती है।
पहला चरण: कच्चे तेल का शोधन
कच्चे तेल को रिफाइनरी में आसवन (डिस्टिलेशन) प्रक्रिया से अलग-अलग उत्पादों में बदला जाता है। इनमें से एक हिस्सा डीजल होता है।
दूसरा चरण: वैक्स वाले अंशों को नियंत्रित करना
डीजल से उन हाइड्रोकार्बन अंशों को कम किया जाता है जो कम तापमान पर जल्दी जम जाते हैं। इसके लिए विशेष रिफाइनिंग प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।
तीसरा चरण: विशेष एडिटिव्स मिलाना
इसके बाद डीजल में कोल्ड फ्लो इम्प्रूवर, पोर प्वाइंट डिप्रेसेंट और अन्य एडिटिव्स मिलाए जाते हैं। ये वैक्स के क्रिस्टल को छोटा रखते हैं ताकि ईंधन आसानी से बहता रहे।
चौथा चरण: प्रयोगशाला परीक्षण
तैयार ईंधन की कई मानकों पर जांच की जाती है;
- क्लाउड प्वाइंट
- पोर प्वाइंट
- सीएफपीपी
- फ्लैश प्वाइंट
- श्यानता (विस्कोसिटी)
- घनत्व
- इंजन के साथ अनुकूलता
पांचवां चरण: वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण
अंतिम चरण में ईंधन को अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों में वाहनों पर चलाकर देखा जाता है। सफल परीक्षण के बाद ही इसे उपयोग के लिए मंजूरी दी जाती है।
भारत में विंटर ग्रेड डीजल की शुरुआत कब हुई?
भारत में पहली बार वर्ष 2019 में इंडियन ऑयल ने लद्दाख, कारगिल, काजा और कीलोंग जैसे अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों के लिए विंटर ग्रेड डीजल लॉन्च किया था। यह लगभग -33 डिग्री सेल्सियस तक तरल बना रहता था। इससे स्थानीय लोगों, सेना, परिवहन और पर्यटन को सर्दियों के दौरान बड़ी राहत मिली।
फिर एक्सट्रीम वेदर ग्रेड (XWG) डीजल की जरूरत क्यों पड़ी?
हालांकि विंटर ग्रेड डीजल प्रभावी था, लेकिन भारतीय सेना को ऐसे इलाकों में काम करना पड़ता है जहां तापमान कई बार -40 डिग्री सेल्सियस या उससे भी नीचे पहुंच जाता है। इसके अलावा सेना को ऐसा ईंधन चाहिए था;
- जो और कम तापमान में भी काम करे।
- मौजूदा बीएस-6 इंजनों में बिना किसी बदलाव के इस्तेमाल हो।
- इंजन और फ्यूल सिस्टम को नुकसान न पहुंचाए।
- लंबे समय तक भंडारण योग्य हो।
- अत्यधिक ऊंचाई पर भी समान प्रदर्शन करे।
इसी जरूरत को देखते हुए बीपीसीएल और भारतीय सेना ने मिलकर एक्सट्रीम वेदर ग्रेड (XWG) डीजल विकसित किया।
एक्सट्रीम वेदर ग्रेड (XWG) डीजल कैसे बनाया गया?
बीपीसीएल के वैज्ञानिकों और भारतीय सेना के विशेषज्ञों ने पहले अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों में आने वाली वास्तविक समस्याओं का अध्ययन किया। इसके बाद ऐसा विशेष मिश्रण तैयार किया गया जिसमें कम तापमान पर काम करने वाले एडिटिव्स का उपयोग किया गया। इसके बाद;
- प्रयोगशाला में कई चरणों में परीक्षण हुए।
- सेना के वाहनों में वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण किया गया।
- ऊंचाई वाले इलाकों में प्रदर्शन का मूल्यांकन किया गया।
- सफल परीक्षण के बाद इसे सेना के उपयोग के लिए मंजूरी दी गई।
एक्सट्रीम वेदर ग्रेड (XWG) डीजल की क्या विशेषताएं हैं?
- पोर प्वाइंट लगभग -42 डिग्री सेल्सियस, इसका मतलब है कि XWG डीजल -42°C तक भी नहीं जमेगा और पाइप, फ्यूल फिल्टर व इंजन तक पहुंचता रहेगा।
- फ्लैश प्वाइंट लगभग 50 डिग्री सेल्सियस, मतलब है कि सामान्य तापमान पर यह ईंधन आसानी से आग नहीं पकड़ता।
- लगभग -40 डिग्री सेल्सियस तक प्रभावी।
- इंजन में किसी बदलाव की जरूरत नहीं।
- फ्यूल फिल्टर जाम होने की संभावना बहुत कम।
- फ्यूल इंजेक्टर और पंप की बेहतर सुरक्षा।
- ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सफल परीक्षण।
XWG डीजल कैसे है अलग?
दुनिया के कई देशों में अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों के लिए तैयार किए जाने वाले विशेष ईंधनों में आमतौर पर केरोसीन (मिट्टी के तेल) की मात्रा अधिक रखी जाती है। केरोसीन कम तापमान पर आसानी से नहीं जमता, इसलिए इससे ईंधन का प्रवाह बना रहता है। हालांकि, केरोसीन की मात्रा बढ़ाने से ईंधन की ऊर्जा क्षमता और चिकनाई प्रभावित हो सकती है।
बीपीसीएल के अनुसार, एक्सट्रीम वेदर ग्रेड डीजल इस मामले में अलग है। यह बिना केरोसीन पर अधिक निर्भर हुए ही आर्कटिक ग्रेड प्रदर्शन देने में सक्षम है। साथ ही यह सामान्य डीजल के सभी मानकों और BS-VI इंजनों के अनुरूप भी बना रहता है।
इस ईंधन से किन्हें फायदा होगा?
भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ को उम्मीद है कि अत्यधिक ठंड वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में वाहनों की परिचालन क्षमता पहले से अधिक भरोसेमंद होगी और कठिन मौसम भी सैन्य अभियानों में बाधा नहीं बनेगा।
वहीं, बीपीसीएल के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक संजय खन्ना ने बताया कि यह केवल सेना के लिए विकसित ईंधन नहीं, बल्कि भारत की स्वदेशी ईंधन तकनीक में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कंपनी का लक्ष्य भविष्य में इस तकनीक का उपयोग लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों में नागरिक परिवहन और आपूर्ति व्यवस्था को भी अधिक सुरक्षित और सुचारु बनाने का है। इस तरह यह तकनीक रक्षा क्षेत्र के साथ-साथ दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों की आम जिंदगी को भी आसान बनाने की क्षमता रखती है।