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Hisar News: राखीगढ़ी में छात्र बनेंगे बाल पुरातत्वविद, मिट्टी से खुद निकालेंगे हड़प्पाकालीन धरोहरें
Sun, 18 Oct 2026 11:53 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
Updated Sun, 18 Oct 2026 11:53 PM IST
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नारनौंद। राखीगढ़ी में अब इतिहास सिर्फ किताबों के पन्नों और संग्रहालय की दीर्घाओं में नजर नहीं आएगा बल्कि छात्र खुद मिट्टी खोदकर हड़प्पाकालीन सभ्यता के रहस्यों को समझेंगे। विश्वविख्यात सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख केंद्र राखीगढ़ी में सोमवार से शुरू होने वाले सात दिवसीय महोत्सव में कृत्रिम उत्खनन (एक्सकैवेशन) यानी प्रायोगिक उत्खनन खास आकर्षण रहेगा।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी में इस गतिविधि का शुभारंभ होगा। इसके तहत सैकड़ों विद्यार्थियों को खुदाई की प्रक्रिया से रूबरू कराया जाएगा और वे कुछ समय के लिए बाल पुरातत्वविद की भूमिका निभाएंगे। इस पहल की खासियत यह है कि विद्यार्थी पुरातात्विक अवशेषों को देखकर उनके बारे में बताएंगे वह पेशेवर पुरातत्वविदों की तरह मिट्टी की परतों से वस्तुओं को सावधानीपूर्वक निकालने, उनकी पहचान करने और उन्हें संरक्षित रखने की प्रक्रिया भी सीखेंगे। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी प्राचीन विरासत से जोड़ना और पुरातत्व विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करना है।
कृत्रिम उत्खनन के नोडल अधिकारी डॉ. अप्पू सहारण के नेतृत्व में आयोजन स्थल पर तीन विशेष ट्रेंच तैयार किए गए हैं। इनमें दो ट्रेंच 5 गुणा 5 मीटर आकार के हैं। इनके भीतर हड़प्पाकालीन संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं के मॉडल मिट्टी में दबाए गए हैं। इनमें हड़प्पाकालीन मुहरें, मिट्टी के मनके, चूड़ियां और घरेलू उपयोग की वस्तुओं की प्रतिकृतियां शामिल हैं।
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विद्यार्थी इन वस्तुओं को निर्धारित औजारों की मदद से सावधानीपूर्वक बाहर निकालेंगे। इस दौरान उन्हें समझाया जाएगा कि पुरातत्व की खुदाई में जल्दबाजी के बजाय धैर्य, बारीकी और वैज्ञानिक पद्धति का कितना महत्व होता है। मिट्टी में दबी किसी वस्तु को निकालना ही नहीं, बल्कि उसकी स्थिति और आसपास की परतों को समझना भी पुरातात्विक अध्ययन का अहम हिस्सा है।
बॉक्स : मानव कंकाल की प्रतिकृति से समझेंगे दफनाने की परंपरा:
तीसरा ट्रेंच इस गतिविधि का विशेष आकर्षण रहेगा। इसमें राखीगढ़ी से मिले मानव कंकाल की प्रतिकृति को दफनाया गया है। ट्रेंच को वास्तविक खुदाई स्थल जैसा स्वरूप देने के लिए कच्ची मिट्टी की ईंटों से करीब चार इंच ऊंची दीवार बनाई गई है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को मानव अवशेषों की खोज और उन्हें वैज्ञानिक तरीके से बाहर निकालने की प्रक्रिया समझाई जाएगी। राखीगढ़ी के साइट नंबर तीन पर मिले प्राचीन कुएं का मॉडल भी तैयार किया गया है। इसके जरिये विद्यार्थी जान सकेंगे कि हजारों वर्ष पहले हड़प्पा सभ्यता के लोग जल प्रबंधन और निर्माण कला में कितने दक्ष थे।
बॉक्स : पहले देखेंगे असली उत्खनन स्थल, फिर खुद करेंगे प्रयोग:
प्रायोगिक खुदाई शुरू करने से पहले विद्यार्थियों को राखीगढ़ी के स्थल संख्या एक व तीन का भ्रमण कराया जाएगा। यहां वे पहले की खुदाई में सामने आईं दीवारों, कुओं और अन्य प्राचीन संरचनाओं को देखेंगे। इसके बाद कृत्रिम उत्खनन के माध्यम से वास्तविक पुरातात्विक कार्य और प्रशिक्षण के लिए तैयार किए गए उत्खनन स्थल के बीच का अंतर समझेंगे। छात्रों को खुदाई में इस्तेमाल होने वाले औजारों की जानकारी देने के साथ निकाली गई वस्तुओं की सफाई, पैकिंग और संरक्षण की वैज्ञानिक विधियां भी सिखाई जाएंगी। इससे उन्हें पता चलेगा कि पुरातत्वविदों का काम केवल प्राचीन वस्तुओं को खोजना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी ऐतिहासिक जानकारी को सुरक्षित रखना भी है।
बॉक्स : पर्यटकों को भी समझाएंगे हड़प्पा सभ्यता के रहस्य:
फिलहाल राखीगढ़ी में नियमित पुरातात्विक खुदाई शुरू नहीं हुई है। ऐसे में कृत्रिम उत्खनन महोत्सव में आने वाले पर्यटकों के लिए भी खास आकर्षण रहेगा। विद्यार्थी स्वयं इस गतिविधि के बारे में जानकारी साझा करेंगे और बताएंगे कि पुरातत्वविद जमीन के भीतर छिपे इतिहास को किस तरह सामने लाते हैं। कृत्रिम उत्खनन में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की ओर से बाल पुरातत्वविद का प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा। सात दिन तक चलने वाली यह गतिविधि राखीगढ़ी महोत्सव को केवल सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित रखने के बजाय विद्यार्थियों के लिए इतिहास की प्रयोगशाला में बदल देगी। यहां मिट्टी की परतों से निकलने वाली हर प्रतिकृति उन्हें उस सभ्यता के जीवन, कला, तकनीक और परंपराओं को करीब से समझने का अवसर देगी, जिसने हजारों वर्ष पहले इस क्षेत्र को एक विशिष्ट पहचान दी थी।
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मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी में इस गतिविधि का शुभारंभ होगा। इसके तहत सैकड़ों विद्यार्थियों को खुदाई की प्रक्रिया से रूबरू कराया जाएगा और वे कुछ समय के लिए बाल पुरातत्वविद की भूमिका निभाएंगे। इस पहल की खासियत यह है कि विद्यार्थी पुरातात्विक अवशेषों को देखकर उनके बारे में बताएंगे वह पेशेवर पुरातत्वविदों की तरह मिट्टी की परतों से वस्तुओं को सावधानीपूर्वक निकालने, उनकी पहचान करने और उन्हें संरक्षित रखने की प्रक्रिया भी सीखेंगे। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी प्राचीन विरासत से जोड़ना और पुरातत्व विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करना है।
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कृत्रिम उत्खनन के नोडल अधिकारी डॉ. अप्पू सहारण के नेतृत्व में आयोजन स्थल पर तीन विशेष ट्रेंच तैयार किए गए हैं। इनमें दो ट्रेंच 5 गुणा 5 मीटर आकार के हैं। इनके भीतर हड़प्पाकालीन संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं के मॉडल मिट्टी में दबाए गए हैं। इनमें हड़प्पाकालीन मुहरें, मिट्टी के मनके, चूड़ियां और घरेलू उपयोग की वस्तुओं की प्रतिकृतियां शामिल हैं।
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विद्यार्थी इन वस्तुओं को निर्धारित औजारों की मदद से सावधानीपूर्वक बाहर निकालेंगे। इस दौरान उन्हें समझाया जाएगा कि पुरातत्व की खुदाई में जल्दबाजी के बजाय धैर्य, बारीकी और वैज्ञानिक पद्धति का कितना महत्व होता है। मिट्टी में दबी किसी वस्तु को निकालना ही नहीं, बल्कि उसकी स्थिति और आसपास की परतों को समझना भी पुरातात्विक अध्ययन का अहम हिस्सा है।
बॉक्स : मानव कंकाल की प्रतिकृति से समझेंगे दफनाने की परंपरा:
तीसरा ट्रेंच इस गतिविधि का विशेष आकर्षण रहेगा। इसमें राखीगढ़ी से मिले मानव कंकाल की प्रतिकृति को दफनाया गया है। ट्रेंच को वास्तविक खुदाई स्थल जैसा स्वरूप देने के लिए कच्ची मिट्टी की ईंटों से करीब चार इंच ऊंची दीवार बनाई गई है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को मानव अवशेषों की खोज और उन्हें वैज्ञानिक तरीके से बाहर निकालने की प्रक्रिया समझाई जाएगी। राखीगढ़ी के साइट नंबर तीन पर मिले प्राचीन कुएं का मॉडल भी तैयार किया गया है। इसके जरिये विद्यार्थी जान सकेंगे कि हजारों वर्ष पहले हड़प्पा सभ्यता के लोग जल प्रबंधन और निर्माण कला में कितने दक्ष थे।
बॉक्स : पहले देखेंगे असली उत्खनन स्थल, फिर खुद करेंगे प्रयोग:
प्रायोगिक खुदाई शुरू करने से पहले विद्यार्थियों को राखीगढ़ी के स्थल संख्या एक व तीन का भ्रमण कराया जाएगा। यहां वे पहले की खुदाई में सामने आईं दीवारों, कुओं और अन्य प्राचीन संरचनाओं को देखेंगे। इसके बाद कृत्रिम उत्खनन के माध्यम से वास्तविक पुरातात्विक कार्य और प्रशिक्षण के लिए तैयार किए गए उत्खनन स्थल के बीच का अंतर समझेंगे। छात्रों को खुदाई में इस्तेमाल होने वाले औजारों की जानकारी देने के साथ निकाली गई वस्तुओं की सफाई, पैकिंग और संरक्षण की वैज्ञानिक विधियां भी सिखाई जाएंगी। इससे उन्हें पता चलेगा कि पुरातत्वविदों का काम केवल प्राचीन वस्तुओं को खोजना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी ऐतिहासिक जानकारी को सुरक्षित रखना भी है।
बॉक्स : पर्यटकों को भी समझाएंगे हड़प्पा सभ्यता के रहस्य:
फिलहाल राखीगढ़ी में नियमित पुरातात्विक खुदाई शुरू नहीं हुई है। ऐसे में कृत्रिम उत्खनन महोत्सव में आने वाले पर्यटकों के लिए भी खास आकर्षण रहेगा। विद्यार्थी स्वयं इस गतिविधि के बारे में जानकारी साझा करेंगे और बताएंगे कि पुरातत्वविद जमीन के भीतर छिपे इतिहास को किस तरह सामने लाते हैं। कृत्रिम उत्खनन में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की ओर से बाल पुरातत्वविद का प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा। सात दिन तक चलने वाली यह गतिविधि राखीगढ़ी महोत्सव को केवल सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित रखने के बजाय विद्यार्थियों के लिए इतिहास की प्रयोगशाला में बदल देगी। यहां मिट्टी की परतों से निकलने वाली हर प्रतिकृति उन्हें उस सभ्यता के जीवन, कला, तकनीक और परंपराओं को करीब से समझने का अवसर देगी, जिसने हजारों वर्ष पहले इस क्षेत्र को एक विशिष्ट पहचान दी थी।
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