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AIIMS Bilaspur: एम्स बिलासपुर में महंगे इम्प्लांट की किल्लत, जटिल ऑर्थोपेडिक सर्जरी प्रभावित

Wed, 05 Aug 2026 09:11 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर।
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 05 Aug 2026 09:11 AM IST
सार

अस्पताल में सामान्य ऑर्थोपेडिक ऑपरेशन तो फिलहाल नियमित रूप से हो रहे हैं, लेकिन जिन मरीजों को रिवीजन या जटिल सर्जरी की जरूरत पड़ती है, उनके लिए आवश्यक महंगे इम्प्लांट और विशेष उपकरण समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। 

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AIIMS Bilaspur faces shortage of expensive implants, hampering complex orthopedic surgeries
एम्स बिलासपुर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एम्स बिलासपुर में आयुष्मान और हिमकेयर योजना का पैसा नहीं मिलने से ऑर्थोपेडिक मरीजों के इलाज में गंभीर समस्या सामने आ रही है। अस्पताल में सामान्य ऑर्थोपेडिक ऑपरेशन तो फिलहाल नियमित रूप से हो रहे हैं, लेकिन जिन मरीजों को रिवीजन या जटिल सर्जरी की जरूरत पड़ती है, उनके लिए आवश्यक महंगे इम्प्लांट और विशेष उपकरण समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो ऐसे मरीजों को इलाज के लिए इंतजार करना पड़ सकता है। दोनों योजनाओं के अंतर्गत वेंडरों का करोड़ों रुपये पेंडिंग है। एम्स प्रशासन लगातार इस पैसे के लिए प्रदेश सरकार से पत्राचार कर रहा है,लेकिन इसका कोई असर नहीं दिख रहा है।

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अगर कुछ बजट आता भी है तो वो ऊंट के मुंह में जीरा जैसी बात है। इसी कारण जो वेंडर एम्स को उपकरणों और दवाई की सप्लाई देते हैं वो अब कीमती सामान की आपूर्ति से हाथ खींच रहे हैं। संस्थान में सामान्य फ्रैक्चर, प्लेट-रॉड लगाने और नियमित घुटना या कूल्हा प्रत्यारोपण जैसी सर्जरियों के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध है। इसलिए इन मरीजों के उपचार पर फिलहाल कोई विशेष असर नहीं पड़ा है। परेशानी उन मामलों में सामने आ रही है, जहां मरीज का पहले किसी बड़े अस्पताल में ऑपरेशन हो चुका है और अब संक्रमण, इम्प्लांट ढीला होने, टूटने या अन्य जटिलताओं के कारण दोबारा सर्जरी करनी पड़ रही है। जानकारी के अनुसार ऐसी रिवीजन सर्जरियों में सामान्य इम्प्लांट का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

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प्रत्येक मरीज की जरूरत के अनुसार विशेष डिजाइन वाले इम्प्लांट और हाई-एंड उपकरणों की आवश्यकता होती है। इनकी कीमत कई लाख रुपये तक होती है और इन्हें विशेष तौर पर उपलब्ध कराया जाता है। सूत्र बताते हैं कि वेंडरों को समय पर पूरा भुगतान नहीं मिलने के कारण महंगे इम्प्लांट और विशेष उपकरणों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। बकाया राशि करोड़ों रुपये में पहुंच चुकी है और समय-समय पर केवल सीमित भुगतान होने से वेंडर हाई-एंड सर्जरियों के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। इसका सीधा असर जटिल ऑर्थोपेडिक मामलों पर पड़ सकता है।

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मरीज को खुद उठाना पड़ता है रोबोटिक घुटना प्रत्यारोपण का खर्च
सबसे अधिक परेशानी उन मरीजों को हो सकती है, जिनकी पहले एम्स, पीजीआई या अन्य बड़े अस्पतालों में सर्जरी हो चुकी है। ऐसे मरीजों की दोबारा सर्जरी में विशेष इम्प्लांट की आवश्यकता होती है। यदि यह समय पर उपलब्ध नहीं होते हैं तो ऑपरेशन टालना पड़ सकता है या मरीजों को दूसरे चिकित्सा संस्थानों में रेफर करने की नौबत आ सकती है। एम्स में रोबोटिक तकनीक से घुटना प्रत्यारोपण (नी-रिप्लेसमेंट) की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन यह सुविधा आयुष्मान भारत और हिमकेयर योजना के तहत कवर नहीं है। ऐसे में मरीजों को इसका खर्च स्वयं वहन करना पड़ता है। संस्थान में एक घुटने की रोबोटिक सर्जरी पर करीब एक लाख रुपये तक खर्च आता है, जबकि निजी अस्पतालों में यही खर्च प्रति घुटना करीब दो लाख रुपये तक पहुंच जाता है।

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